
(- निरंजन परिहार)
मुंबई,दिव्यराष्ट्र:/ जैन समाज सफल है, सबल हैं और समृद्ध भी। इसीलिए उसके अपने समाचार पत्र भी हैं और वर्षों से समाज की धड़कनों से जुड़े हुए। ‘हलकारा’, ‘शताब्दी गौरव’, ‘मुंबई राजस्थान’, ‘मरुधर का तहलका’, ‘मारवाड़ चेतना’, ‘आगम निगम’, ‘जैन स्टार’, ‘शांति वल्लभ टाइम्स’, ‘गोड़वाड़ का गौरव’, ‘गोड़वाड़ टाइम्स’, ‘गोड़वाड़ ज्योति’, ‘संकल्प बल’, ‘मरुधर संदेश’ और ‘विगतवार’ सहित ‘मारवाड़ मीडिया’ जैसे अखबारों ने अपनी ऑनलाइन व प्रकाशित उपस्थिति से समस्त समाज को सदा से जोड़ा है। इन सबने अपने समाचारों में जैन धर्म के आयोजनों, सामाजिक गतिविधियों और सेवाभावी व्यक्तित्वों को लगातार प्रमुखता दी है।
अखबार केवल समाचार नहीं छापते। समाज की गतिविधियों का दस्तावेज भी बनाते हैं। फिर सवाल यह है कि इनके योगदान को नजरअंदाज करके, किसी एक विचार की विवेचना के आधार पर किसी एक व्यक्ति द्वारा पूरी पत्रकारिता को कठघरे में क्यों खड़ा किया जा रहा है? जैन धर्म के विराट और विशाल आयोजन la सदियों से होते रहे हैं। इसलिए क्या किसी भव्य आयोजन की खबर प्रकाशित करना गलत है? क्या समाज के प्रतिष्ठित लोगों को अपने समाचारों में जगह देने को पत्रकारिता का बिक जाना कहा जा सकता है?
‘शताब्दी गौरव’,’ मुंबई राजस्थान’, ‘आगम निगम’, ‘मरुधर का तहलका’, ‘शांति वल्लभ टाइम्स’ और ‘गोड़वाड़ का गौरव’ सहित ‘मारवाड़ मीडिया’ जैसे ऑनलाइन अखबार वर्तमान में जैन समाज की मुख्यधारा का मीडिया हैं। अखबारों का काम समाचार देना है। विचारों को जगह देना है। सवाल उठाना है। और सवाल उठाने वालों के विचारों की पड़ताल करना भी है। लेकिन किसी विचार से असहमति होते ही मीडिया को ‘अच्छा’ और ‘बिका हुआ’ बताने लग जाना स्वस्थ संवाद की परंपरा नहीं मानी जाती।
जैन समाज अपने धार्मिक और सामाजिक आयोजनों को भव्य बनाने में विश्वास रखता है। हर अखबार अपनी शैली और क्षमता के अनुसार उन्हें समुचित स्थान देता है। और उस मिले हुए स्थान व स्तर के मुताबिक समाज उस समाचार पत्र को सिर पर बिठाता है। आज शताब्दी गौरव’,’ मुंबई राजस्थान’, ‘आगम निगम’, ‘मरुधर का तहलका’ और ‘गोड़वाड़ का गौरव’ ‘मारवाड़ मीडिया’ जैसे ऑनलाइन सामाजिक समाचार पत्र दूसरों के मुकाबले ज्यादा आगे निकल रहे हैं, तो यह उनकी मेहनत और सामाजिक समर्पण का कमाल है।
कोई अखबार पुराना अखबार बड़ा हो सकता है, और कोई बहुत पुराना उससे भी ज्यादा पीछे छूट सकता है। किसी को ज्यादा विज्ञापन मिल सकते हैं और किसी को कम। किसी की प्रस्तुति बेहतर हो सकती है, किसी की पहुंच अधिक। यह बाजार की प्रतिस्पर्धा का विषय है, किसी व्यक्ति द्वारा अखबारों को चरित्र प्रमाणपत्र बांटने का विषय नहीं।
याद रखिए, कोई भी केवल एक अखबार तो समाज की आवाज को मजबूती दे सकता है, लेकिन कोई एक व्यक्ति पूरे समाज की आवाज नहीं बन सकता। अखबारों में खबरें छपती हैं, तो खबरों से जुड़े विज्ञापन भी छपते हैं। लेकिन विज्ञापन का अर्थ कोई यह लगाए कि उनको प्रकाशित करने वाले अखबार की पत्रकारिता ही खरीद ली गई हो, तो यह सोचने वाले की मानसिकता का दोष है। इसलिए, पत्रकारिता को छोटा – बड़ा बताने की कोशिश करके बांटा भी नहीं जा सकता। आईना दिखाने वाले से असहमति हो सकती है, लेकिन आईने पर पत्थर फैंक कर उसे ही तोड़ देने से तस्वीर नहीं बदलती। उल्टे, आईना तो टूट कर भी अपने हर टुकड़े से आपका चेहरा वही दिखाएगा जो असल में आपका है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)






