(दिव्यराष्ट्र के लिए प्रो. अखिलेश मिश्र अध्यक्ष, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान)
भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति, परंपरा और आत्मसम्मान का आधार भी है। इसी सच्चाई को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने बहुभाषिकता को शिक्षा का केंद्रीय तत्व बनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में बनी इस नीति में मातृभाषा, स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। नीति यह भी स्पष्ट करती है कि किसी विद्यार्थी या राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। यह दृष्टि भारतीय शिक्षा को अधिक संवेदनशील, अधिक समावेशी और अधिक जीवनोपयोगी बनाती है।
त्रिभाषा नीति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह बच्चे को उसकी जड़ों से जोड़ती है। जब विद्यार्थी अपनी परिचित भाषा में सीखता है, तो वह केवल पाठ याद नहीं करता, बल्कि अवधारणा को समझता है। समझ पर आधारित शिक्षा स्मरण-शक्ति, विचार-क्षमता और अभिव्यक्ति को मजबूत बनाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा या स्थानीय भाषा के उपयोग पर बल देकर इसी वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया है। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन बच्चों के लिए लाभकारी है जो घर में एक भाषा बोलते हैं और विद्यालय में दूसरी भाषा का सामना करते हैं। ऐसे में भाषा सीखने की बाधा कम होती है और सीखने में आत्मविश्वास बढ़ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के लिए न्याय और अवसर का प्रश्न है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय शिक्षा को केवल परीक्षा-केंद्रित नहीं, बल्कि जीवन-केंद्रित बनाता है। जब किसी बच्चे को उसकी भाषा में पढ़ने का अवसर मिलता है, तो वह अपने विचार अधिक सहजता से व्यक्त कर पाता है और अपनी क्षमता को बेहतर ढंग से विकसित कर सकता है। यह केवल शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाषा को बाधा नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखने की जो सोच विकसित हुई है, वह देश के दूरस्थ और वंचित वर्गों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो रही है।
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी बहुभाषिकता को भारत की पहचान और भविष्य की शक्ति बताया है। उन्होंने कहा है कि बहुभाषिकता हमारी विविधता का मूल है और भाषा तथा पुस्तकें विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने की संपदा हैं। यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाषा को केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय निर्माण का साधन मानता है। जिस देश की भाषाएँ मजबूत होती हैं, उसकी बौद्धिक परंपरा भी मजबूत होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं में पाठ्य-सामग्री, बाल साहित्य, पाठ्य-पुस्तकें और शिक्षण-संसाधन तैयार करना समय की आवश्यकता है। यह कार्य बच्चों को अपनी भाषा में सीखने का अवसर देता है और उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाता है।
त्रिभाषा नीति राष्ट्रीय एकता को भी सशक्त करती है। विभिन्न भारतीय भाषाओं के अध्ययन से विद्यार्थी देश के अलग-अलग अंचलों, साहित्य, लोकजीवन और परंपराओं को समझते हैं। इससे पारस्परिक सम्मान बढ़ता है और सांस्कृतिक दूरी कम होती है। भाषा सीखना यहाँ केवल व्याकरण का अभ्यास नहीं, बल्कि भारत को भीतर से समझने का माध्यम बन जाता है। यही कारण है कि यह नीति विविधता में एकता की भारतीय भावना को नया बल देती है। जब एक बच्चा अपनी मातृभाषा के साथ दूसरी और तीसरी भाषा भी सीखता है, तो वह अधिक व्यापक दृष्टि वाला, अधिक संवेदनशील और अधिक सक्षम नागरिक बनता है।
आज जब देश विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब त्रिभाषा नीति का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह नीति विद्यार्थियों को केवल भाषाई दक्षता नहीं देती, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना भी प्रदान करती है। यह शिक्षा को अधिक मानवीय, अधिक भारतीय और अधिक भविष्योन्मुख बनाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सतत प्रयासों से बहुभाषिकता को जो सम्मान मिला है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार कर रहा है। यह आधार ही ऐसे भारत का निर्माण करेगा जो अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ा हुआ, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और ज्ञान के क्षेत्र में विश्वसनीय नेतृत्व देने में सक्षम होगा।