(डॉ. सीमा दाधीच)
“ना गुरोर अधिकं तत्वं ना गुरोर अधिकं तपः तत्व ज्ञानात् परम नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः
अर्थात गुरु से बढ़कर कोई सिद्धांत नहीं, गुरु से बढ़कर कोई तपस्या नहीं, ऐसे गुरु के ध्यान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं। मैं ऐसे गुरु को प्रणाम करता हूँ।
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला एक पवित्र पर्व है जो गुरु शिष्य परंपरा, शिक्षकों के प्रति सम्मान,श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए समर्पित है।
इस दिन महाभारत और वेदों के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था, इसलिए इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहते हैं।जैन धर्म के अनुसार, यह वह दिन है जब भगवान महावीर ने अपने पहले शिष्य ‘गौतम स्वामी’ को स्वीकार किया था। बौद्ध धर्म में इस दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था। गुरु पूर्णिमा का दिन सभी व्यक्तियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘गुरु’ अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश देने वाला होता है। गुरु ही वह मार्गदर्शक है जो हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान और सत्य के प्रकाश की ओर ले जाता है। उनके बिना जीवन में सही दिशा और लक्ष्य पाना असंभव है। गुरु की भूमिका हमारे देश में माता ने भी निभाई है जीजाबाई भी इसका उदाहरण है जिनसे प्रेरणा लेनी चाहिए आज आधुनिक युग में माता बेटियों को ढाल बनकर शिक्षित कर रही है ये भी हौसला बढ़ाकर वास्तविक गुरु की भूमिका निभा रही है। गुरु केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि वे हमारे व्यक्तित्व और चरित्र का उत्तम निर्माण करते हैं। गुरु अपने शिष्य की कमियों को दूर करके उसे एक निपुण और सफल व्यक्ति बनाते हैं। एक अच्छा गुरु हमेशा अपने शिष्य के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उसे आत्मनिर्भर बनाता है।
सही मार्गदर्शन से हमें जीवन की हर परिस्थिति में सही और गलत का भेद करना सिखाते है। आज आधुनिकता के युग में तनाव मुक्त जीवन तकनीकी युग में तनाव भरे जीवन में गुरु का मानसिक मार्गदर्शन शांति और स्थिरता प्रदान करता है। आज का युवा आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक और मानवीय मूल्य सीखने में भी गुरु की अहम भूमिका है आधुनिक युग में कहीं संस्थान और आश्रम ऑनलाइन सत्संग ज्ञान और वेबिनार आयोजित करते हैं जिससे वैश्विक स्तर पर लोगों को मानसिक शांति मिलती है और तनाव मुक्त जीवन जीते है।
भगवान श्री कृष्ण को जगतगुरु माना गया है क्योंकि उन्होंने भागवत गीता के माध्यम से संपूर्ण मानव को जीवन जीने का सच्चा मार्ग, कर्म और ज्ञान का उपदेश दिया उन्हें गुरु मानने का मुख्य कारण उनके द्वारा दिया गया दिव्य ज्ञान मोह भ्रम का नाश और उनका सर्वज्ञ होना है। जिन्होंने किसी को अपना गुरु नहीं बनाया उन्हें कृष्ण को गुरु मानकर उनके दिए गए ज्ञान को जीवन में ढालना चाहिए। हमारे देश में महर्षि संदीप, गुरु द्रोणाचार्य, गुरु कृपाचार्य, आदि शंकराचार्य, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र,चाणक्य, रामानुजाचार्य, कबीर दासजी,गुरु नानक देवजी, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा बुद्ध जैसे अनेक गुरुवर ने अपने शिष्यों को ज्ञान देकर विश्व में अच्छे शिल्पकार साबित हुए और उनके शिष्यों के नाम का संसार में लोहा मनवाया। आज विश्व में चरित्र निर्माण को श्रेष्ठ माना गया है यह श्री राम के जीवन से संपूर्ण मानव जाति को देखने को मिलता है कि उनके पास बल शक्ति, साम्राज्य होने के बावजूद उन्होंने अपने चरित्र को उत्तम रखा और इसीलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। जीवन में गुरु की भूमिका सर्वांगीण विकास में सहायक है क्योंकि अनुशासनात्मक जीवन ही व्यक्ति को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। आधुनिक युग में आज जगह-जगह संतो के माध्यम से लोगों को मानसिक शांति के लिए ज्ञान दिया जाता है, भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति सुकून की तलाश में भटकता है वह श्रेष्ठ गुरु तलाश में लग जाता है उसे आज की जिंदगी में प्रत्येक प्रश्न का उत्तर गुरु के माध्यम से चाहिए लेकिन वह अपने भीतर माया,लोभ, छल,कपट उनका जब तक त्याग नहीं करेगा तब तक व्यक्ति शांति और सुकून की जिंदगी नहीं जी पाएगा।