– (दिव्यराष्ट्र के लिए निरंजन परिहार)
राजस्थान में कांग्रेसी राजनीति की उड़ान उलझन भरी है। बरसों सत्ता में रहने वाली ताकतवर कांग्रेस राजनीतिक धरातल पर कमजोर लगती है, तो कभी कभार फिर से प्रदेश में सरकार बनाने की हुंकार भरती हुई भी दिखती है। इसीलिए अपने नेताओं में ताल मेल और मोलजोल भरी मुलाकातों की तस्वीरें उत्साह जगाती हैं, और होठों पर हंसी और चेहरों पर मुस्कान भरी हाथ मिलाते हुए तस्वीरें देखते ही कांग्रेसी चिहुंच उठते हैं। लेकिन राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति के सारे सच समझने के लिए तस्वीरों के पार का सच समझने की जरूरत है। राजनीति में तस्वीरें अक्सर वही दिखाई जाती हैं, जिसे दिखाना जरूरी होता है। लेकिन राजनीति की असली कहानी उन तस्वीरों के पार होती है, जहां कैमरे की रोशनी नहीं पहुंचती। राजस्थान कांग्रेस में इन दिनों अशोक गहलोत और सचिन पायलट की मुस्कुराती तस्वीरें चर्चा में हैं। राहुल गांधी की कोटा यात्रा के दौरान दोनों नेताओं का आत्मीयता से हाथ मिलाना और चेहरे पर सहज मुस्कान लिए हंसते हुए दिखाई देना कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए राहत और उत्साह का कारण बना। लेकिन राजनीति की तस्वीरों में दिखने वाली निकटता और राजनीतिक वास्तविकताओं की दूरी के बीच अक्सर लंबा फासला होता है, और उसी सच को समझने की जरूरत है।
पिछले एक दशक से राजस्थान कांग्रेस दो समानांतर राजनीतिक धाराओं के बीच बह रही है। एक धारा अनुभव, संगठनात्मक कौशल और सत्ता संचालन की कला का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका चेहरा अशोक गहलोत हैं। दूसरी धारा महत्वाकांक्षा, नई पीढ़ी की राजनीति और भविष्य के नेतृत्व की आकांक्षा का प्रतीक है, जिसका नेतृत्व सचिन पायलट करते हैं। दोनों कांग्रेस के बड़े नेता हैं, दोनों की अपनी ताकत है, दोनों का अपना जनाधार है और दोनों की राजनीतिक यात्रा का अंतिम पड़ाव सत्ता के शिखर तक पहुंचना ही है। राजनीति में महत्वाकांक्षा कोई दोष नहीं होती। बल्कि यही वह ईंधन है, जिससे राजनीतिक यात्राएं आगे बढ़ती हैं। फर्क केवल इतना होता है कि कोई नेता अपनी महत्वाकांक्षा को कितनी कुशलता से राजनीतिक रणनीति में बदल पाता है। अशोक गहलोत ने अपने 50 साल के लंबे अनुभव से राजनीति की यह ललित कला सिद्ध कर रखी है। और सचिन पायलट अभी अपने राजनीतिक भविष्य को उस मुकाम तक पहुंचाने के संघर्ष में हैं, जहां नेतृत्व केवल संभावना नहीं, बल्कि निर्विवाद स्वीकार्यता बन जाए।
राजस्थान कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत भी यही है और विडंबना भी। विडंबना इसलिए कि पार्टी का बड़ा हिस्सा दो खेमों में बंटा दिखाई देता है। ताकत इसलिए कि दोनों नेताओं की सक्रियता ने कांग्रेस को राजनीतिक रूप से जीवंत, जीवित और प्रासंगिक बनाए रखा है। बीजेपी के मजबूत संगठन और सत्ता की निरंतरता के बीच कांग्रेस यदि आज भी मुकाबले की स्थिति में दिखाई देती है, तो उसके पीछे इन दोनों नेताओं की निरंतर राजनीतिक सक्रियता की बड़ी भूमिका है। समस्या वहीं पैदा होती है, जहां व्यक्तिगत राजनीतिक आकांक्षाएं सामूहिक संगठनात्मक लक्ष्यों से बड़ी दिखने लगती हैं। कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ता की पीड़ा भी यही है। वह चाहता है कि गहलोत और पायलट साथ दिखें ही नहीं, साथ चलें भी। क्योंकि उसे मालूम है कि राजस्थान में कांग्रेस का पुनरुत्थान किसी एक नेता की ताकत से संभव नहीं है। इसके लिए दोनों धाराओं का संगम आवश्यक है।
यही कारण है कि जब-जब गहलोत और पायलट की मुलाकात होती है, तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीद का वातावरण बनता है। लेकिन उम्मीद और विश्वास में अंतर होता है। उम्मीद तस्वीरों से पैदा हो जाती है, विश्वास व्यवहार से बनता है। और राजस्थान कांग्रेस अभी उस विश्वास की तलाश में है, जो केवल मंच साझा करने से नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं को साझा करने से पैदा होगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और अपने अपने गुट भी बनाने की फिराक में हैं। लेकिन यह भी एक राजनीतिक यथार्थ है कि राजस्थान कांग्रेस की असली धुरी अभी भी गहलोत और पायलट ही हैं। संगठन की कमान किसी के हाथ हो सकती है, लेकिन जनभावनाओं और राजनीतिक विमर्श का केंद्र वही नेता बनते हैं, जिनकी स्वीकार्यता प्रदेशव्यापी होती है। डोटासरा और जूली चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, मगर स्वीकार्यता की प्रदेशव्यापी कसौटी पर आज भी कांग्रेस में अशोक गहलोत नंबर वन और पायलट नंबर दो हैं, और डोटासरा – जूली इन दोनों नेताओं का विकल्प नहीं बन सकते।
असल में, राजनीति केवल पद का खेल नहीं है। पद किसी को अधिकार दे सकते हैं, लेकिन प्रभाव नहीं। प्रभाव संघर्ष, स्वीकार्यता और जन विश्वास से पैदा होता है। डोटासरा और जूली पद के नेता हैं, कद के नहीं। मगर, गहलोत और पायलट दोनों ने अलग-अलग रास्तों से यह प्रभाव अर्जित किया है। इसलिए दोनों के बीच की प्रतिस्पर्धा केवल व्यक्तियों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि दो राजनीतिक शैलियों, दो पीढ़ियों और दो दृष्टिकोणों की प्रतिस्पर्धा भी है। लेकिन इतिहास गवाह है कि बड़ी राजनीतिक सफलताएं प्रतिस्पर्धा से नहीं, समन्वय से जन्म लेती हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं है। बीजेपी तो उसकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पार्टी है, जिससे कभी भी जीत सकते हैं। लेकिन कांग्रेस की असली चुनौती अपने भीतर वह विश्वास पैदा करना है, जो कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिला सके कि पार्टी का भविष्य व्यक्तिगत समीकरणों का बंधक नहीं बनेगा।
राजस्थान की जनता भी अब केवल राजनीतिक संदेशों से संतुष्ट नहीं होती। वह राजनीतिक व्यवहार को देखती है, नेताओं के संबंधों को परखती है और उनके निर्णयों से निष्कर्ष निकालती है। इसलिए तस्वीरों में मुस्कान जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह राजनीतिक संदेश है, जो उन मुस्कानों के पीछे छिपा होता है। कांग्रेस के लिए आने वाला वक्त बेहद निर्णायक हैं। विधानसभा चुनाव में केवल दो साल बचे हैं। यदि गहलोत का अनुभव और पायलट की ऊर्जा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है, तो पार्टी नई राजनीतिक ताकत के रूप में उभर सकती है। लेकिन यदि तस्वीरों की मुस्कानें केवल अवसरों की औपचारिकता बनी रहीं, तो कार्यकर्ताओं की उम्मीदें फिर निराशा में बदल सकती हैं। आखिरकार राजनीति में हाथ मिलाने से ज्यादा जरूरी दिलों का मिलना होता है। क्योंकि जब दिल मिलते हैं, तब संगठन मजबूत होते हैं। और जब संगठन मजबूत होते हैं, तभी जनता का विश्वास लौटता है। राजस्थान कांग्रेस की असली परीक्षा भी यही है कि वह तस्वीरों की दोस्ती को राजनीतिक एकजुटता में कितना बदल पाती है। बाकी तो खैर, तस्वीरें तो बेचारी कल भी खिंचती थीं, आज भी खिंच रही हैं और आगे भी खिंचती रहेंगी। मगर कांग्रेस का क्या होगा, कांग्रेसियों के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए।