
कानून के खौफ की जरूरत
( दिव्यराष्ट्र के लिए अम्बरीष प्रजापति* ) राजस्थान के श्रीगंगानगर से आई दरिंदगी की वारदात ने इंसानियत को एक बार फिर शर्मसार कर दिया है। एक तेरह साल की मासूम बच्ची, जिसकी उम्र अभी ठीक से दुनिया को समझने की भी नहीं थी, उसे पांच दिनों तक चार अलग-अलग होटलों में बत्तीस दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। 18 जून को मासूम बच्ची ऑटो से जा रही थी, ऑटो चालक ने बीच रास्ते में ही एक होटल वाले को बेच दिया। वह बच्ची शारीरिक रूप से भले ही सांसें ले रही हो, लेकिन समाज और व्यवस्था ने मिलकर उसकी आत्मा की हत्या कर दी है। इस झकझोर देने वाली घटना के बाद समाज में गहरा आक्रोश है, गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक न्याय की मांग उठ रही है। पुलिस ने आनन-फानन में चौदह आरोपियों को गिरफ्तार किया है और प्रशासन ने उन होटलों पर बुलडोजर चला दिया है जहां यह घिनौना कृत्य हुआ। लेकिन इस तात्कालिक और दिखावटी कार्रवाई के बीच एक बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या अब सिर्फ बुलडोजर चलाना ही न्याय का अंतिम पैमाना बन गया है? क्या विध्वंस की यह गूंज उस मासूम को असली इंसाफ दिला पाएगी, या फिर यह हमारी न्याय प्रणाली की अक्षमता को छिपाने का जरिया मात्र है?
जनता का गुस्सा पूरी तरह स्वाभाविक है। जब बत्तीस लोग मिलकर एक मासूम को नोंच खाते हैं, तो समाज का कानून-व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। यही वजह है कि आज आम नागरिक बेहद आक्रामक लहजे में पूछ रहा है कि ऐसे दरिंदों को बीच चौराहे पर फांसी क्यों नहीं दी जाती या उनका एनकाउंटर क्यों नहीं कर दिया जाता? लोगों को डर है कि यह मामला भी देश के अन्य अनगिनत मामलों की तरह अदालतों के चक्करों में उलझकर रह जाएगा। पुलिस इन दरिंदों को कोर्ट ले जाएगी, महीनों और सालों तक तारीखें पड़ेंगी, कुछ आरोपी रसूख और बेहतरीन वकीलों के दम पर जमानत पर बाहर आ जाएंगे, कुछ के खिलाफ सबूतों के अभाव में आरोप ही साबित नहीं हो पाएंगे, और कुछ को कानून की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर हल्की-फुल्की सजा मिलकर रह जाएगी। आम आदमी का यह अविश्वास निराधार नहीं है। निर्भया से लेकर कठुआ और हाथरस तक, हमने देखा है कि अदालती न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी और थकाऊ होती है कि पीड़िता और उसका परिवार न्याय की आस में जीते-जी मर जाता है।
इसी जनतांत्रिक हताशा और त्वरित न्याय की मांग को देखते हुए सरकार ने ‘बुलडोजर’ को न्याय के विकल्प के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। जब भी कोई बड़ी और जघन्य घटना होती है, प्रशासन किसी इमारत को गिराकर अपनी पीठ थपथपाने लगता है। लेकिन हमें ठंडे दिमाग से सोचना होगा कि क्या होटल की दीवारों को ढहा देने से बत्तीस दरिंदों की ऐसी मानसिकता का अंत हो जाएगा? होटल पर बुलडोजर चलना एक प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है, अवैध निर्माण के खिलाफ कदम हो सकता है, या फिर जनता के गुस्से को शांत करने का एक राजनीतिक हथकंडा हो सकता है, लेकिन इसे किसी भी सूरत में ‘न्याय’ नहीं कहा जा सकता। न्याय इमारतों को तोड़ने से नहीं, बल्कि अपराधियों की रूह को कानून के खौफ से कंपाने से मिलता है। बुलडोजर चलाने से एक संदेश तो जाता है, लेकिन वह संदेश प्रक्रियात्मक न्याय का स्थान नहीं ले सकता।
भीड़ या समाज द्वारा त्वरित न्याय के रूप में एनकाउंटर या सरेआम फांसी की मांग करना भावनात्मक रूप से सही लग सकता है, लेकिन एक सभ्य और लोकतांत्रिक देश में यह रास्ता आत्मघाती है। यदि हम पुलिस को ही जज, जूरी और जल्लाद बनने का अधिकार दे देंगे, तो फिर न्यायपालिका और संविधान की जरूरत ही क्या रह जाएगी? इतिहास गवाह है कि जब-जब कानून को हाथ में लेकर ‘त्वरित न्याय’ देने की कोशिश की गई है, तब-तब व्यवस्था और अधिक निरंकुश हुई है। एनकाउंटर की संस्कृति कई बार निर्दोषों को भी अपनी चपेट में ले लेती है और असली गुनहगार बच निकलते हैं। हमें मध्यकालीन बर्बरता की तरफ लौटने के बजाय आधुनिक कानून व्यवस्था को मजबूत करना होगा। सरेआम फांसी या गैर-कानूनी एनकाउंटर से अपराध नहीं रुकते, बल्कि अपराध तब रुकते हैं जब अपराधी को यह शत-प्रतिशत यकीन हो कि वह चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएगा और उसे जल्द से जल्द कड़ी सजा मिलेगी।
असली चुनौती हमारी जांच एजेंसी और न्याय प्रक्रिया की कछुआ चाल में है। श्रीगंगानगर की इस पीड़ित बच्ची को सच्चा न्याय तब मिलेगा जब जांच अधिकारी इतने पुख्ता सबूत और वैज्ञानिक साक्ष्य इकट्ठा करें कि अदालत में बत्तीस के बत्तीस दरिंदों का बचना नामुमकिन हो जाए। हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि शुरुआती आक्रोश के बाद मीडिया और समाज दोनों शांत हो जाते हैं। इसके बाद पुलिस की चार्जशीट कमजोर हो जाती है, गवाह मुकर जाते हैं या उन्हें डरा-धमका दिया जाता है, और अंततः नतीजा सिफर निकलता है। इस मामले में सरकार को बुलडोजर चलाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री नहीं कर लेनी चाहिए। असली परीक्षा यह है कि इस केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाए और हर दिन सुनवाई हो। दो से तीन महीने के भीतर सभी आरोपियों को कानून के दायरे में रहते हुए फांसी की सजा मुकर्रर की जाए जो मिसाल बन सके।
इसके साथ ही, हमें इस कड़वी हकीकत को भी स्वीकार करना होगा कि अदालती सजाएं अपराध होने के बाद का इलाज हैं, लेकिन अपराध को रोकने का उपाय नहीं हैं। एक तेरह साल की बच्ची पांच दिनों तक लापता रहती है, उसे चार अलग-अलग होटलों में ले जाया जाता है, बत्तीस लोग इस अपराध श्रृंखला में शामिल होते हैं, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगती। यह हमारी स्थानीय इंटेलिजेंस, पुलिस गश्त और सामाजिक सजगता की बहुत बड़ी विफलता है। होटलों में बिना पहचान पत्र या बिना जांच के इस तरह के कृत्य होना यह दिखाता है कि व्यापारिक फायदे के लिए नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया गया था। केवल होटल तोड़ना काफी नहीं है, बल्कि उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी नाक के नीचे यह सब चल रहा था।
उस मासूम बच्ची की मरी हुई आत्मा को जिंदा तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षा का अहसास दिलाना अब पूरे समाज और राज्य सरकार का दायित्व है। न्याय केवल अपराधियों को जेल भेजने का नाम नहीं है, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास, उसकी मानसिक काउंसलिंग और उसे समाज में सिर उठाकर जीने का माहौल देने का नाम भी है। अगर समाज उसे हीन भावना से देखेगा या व्यवस्था उसे भूल जाएगी, तो वह अदालती जीत के बाद भी हार जाएगी।
आज देश को बुलडोजर के दिखावे की नहीं, बल्कि ‘जस्टिस डिलीवरी सिस्टम’ यानी न्याय वितरण प्रणाली में आमूलचूल सुधार की जरूरत है। पुलिस अनुसंधान को आधुनिक और राजनीति से मुक्त करना होगा ताकि वे बिना किसी दबाव के अपराधियों के खिलाफ अचूक केस फाइल तैयार कर सकें। गवाहों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनाने होंगे ताकि कोई भी अपराधी रसूख के बल पर न्याय को प्रभावित न कर सके। जब तक न्याय मिलने में बरसों लगेंगे, तब तक जनता चौराहे पर फांसी और एनकाउंटर जैसी असंवैधानिक मांगें उठाती रहेगी। श्रीगंगानगर की घटना एक चेतावनी है कि यदि अब भी हमने अपनी न्याय प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त और त्वरित नहीं बनाया, तो समाज का कानून से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा और फिर जो अराजकता फैलेगी, उसे संभालना किसी भी बुलडोजर के वश में नहीं होगा। सरकार और अदालतें इस मामले को एक सामान्य अपराध की तरह न लें, बल्कि इसे देश की कानून व्यवस्था की साख बचाने की लड़ाई मानकर अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाएं, तभी उस मासूम के साथ वास्तविक न्याय हो सकेगा।




