
राजस्थान की संस्कृति, आस्था और सुहाग का हरित उत्सव
सावन आया खुशियाँ लाया
धरती ने हरियाली का श्रृंगार सजाया।
(दिव्य राष्ट्र के लिए नीरू शर्मा जयपुर)। झूले पड़े, मेहंदी रची,
तीज ने फिर से प्रेम की कहानी कही।
लोकगीतों की गूंज हुई, सखियों का संग,
राजस्थान की संस्कृति में भर गया नया रंग।”
सावन की पहली फुहार के साथ ही राजस्थान की धरती का रंग बदलने लगता है। सूखी धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, पेड़ों पर झूले पड़ते हैं और गांवों से लेकर शहरों तक लोकगीतों की मधुर गूंज सुनाई देने लगती है। सावन मास में मनाया जाने वाला हरियाली तीज राजस्थान के प्रमुख लोकपर्वों में से एक है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि राजस्थान की लोकसंस्कृति, प्रकृति प्रेम, पारिवारिक रिश्तों और महिलाओं की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
राजस्थान में हरियाली तीज का विशेष महत्व
हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इसे भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम और वैवाहिक समर्पण से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी आस्था के कारण महिलाएं इस दिन शिव-पार्वती की पूजा कर अपने परिवार और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
राजस्थान में तीज का स्वरूप विशेष रूप से रंगीन और भव्य दिखाई देता है। यहां यह पर्व महिलाओं के लिए अपनी सखियों और परिवार के साथ मिलकर खुशियां मनाने का अवसर भी होता है। नवविवाहित महिलाओं के लिए मायके से तीज का सिंजारा भेजने की परंपरा कई परिवारों में आज भी देखने को मिलती है। इसमें कपड़े, चूड़ियां, मेहंदी, मिठाई और श्रृंगार की वस्तुएं शामिल होती हैं।
मेहंदी, चूड़ियां और हरे रंग का श्रृंगार
तीज से पहले ही महिलाओं में उत्साह दिखाई देने लगता है। हाथों में सुंदर मेहंदी रचाई जाती है। हरे रंग की चूड़ियां, पारंपरिक राजस्थानी आभूषण और रंग-बिरंगे परिधान तीज के उत्सव को और आकर्षक बना देते हैं।
हरे रंग का संबंध प्रकृति और सावन की हरियाली से जोड़ा जाता है। इसलिए तीज के अवसर पर हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियों का विशेष आकर्षण रहता है। महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सजकर पूजा में शामिल होती हैं।
झूले और सावन के लोकगीत
हरियाली तीज की सबसे खूबसूरत परंपराओं में से एक है झूला झूलना। पेड़ों की मजबूत डालियों पर रंग-बिरंगे झूले लगाए जाते हैं। सखियां और महिलाएं मिलकर झूला झूलती हैं तथा सावन और तीज के पारंपरिक गीत गाती हैं।
इन लोकगीतों में सावन की सुंदरता, मायके की याद, सखियों का प्रेम और जीवन की भावनाओं की झलक दिखाई देती है। यही कारण है कि तीज केवल एक धार्मिक पर्व न रहकर राजस्थान की लोककला और लोकसंगीत को जीवित रखने वाला महत्वपूर्ण अवसर भी बन गया है।
कैसे मनाई जाती है हरियाली तीज?
तीज के दिन महिलाएं प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की तैयारी की जाती है। घर में पूजा का स्थान सजाया जाता है तथा फूल, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।
महिलाएं तीज माता और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं तथा परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं। कई महिलाएं इस दिन व्रत भी रखती हैं। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है और परिवार की परंपरा के अनुसार प्रसाद वितरित किया जाता है।
इस अवसर पर घरों में विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं। घेवर और अन्य मिठाइयां तीज के उत्सव का विशेष आकर्षण होती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।
जयपुर की तीज—राजस्थान की पहचान
राजस्थान में जयपुर की तीज विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां तीज माता की भव्य सवारी और पारंपरिक आयोजन लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं। सजाए गए रथ, लोक कलाकार, राजस्थानी वेशभूषा, लोकनृत्य और संगीत राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करते हैं।
देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी राजस्थान की तीज संस्कृति को देखने के लिए आकर्षित होते हैं। इस प्रकार तीज राजस्थान की लोक परंपरा को देश-दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम भी बनती है।
बदलते समय में तीज का बदलता स्वरूप
समय के साथ त्योहार मनाने के तरीकों में बदलाव आया है। आज महिलाएं सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में भी सक्रिय हैं, इसलिए तीज का उत्सव कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मेहंदी प्रतियोगिताओं, झूला उत्सव और सामूहिक आयोजनों के रूप में मनाया जाता है।
फिर भी इस पर्व की मूल भावना आज भी वही है—अपनी संस्कृति से जुड़ना, प्रकृति का स्वागत करना, रिश्तों में प्रेम और अपनापन बढ़ाना तथा भगवान शिव-पार्वती के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना।
तीज केवल त्योहार नहीं, राजस्थान की सांस्कृतिक धड़कन है
हरियाली तीज राजस्थान के लिए केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भावनाओं और परंपराओं का उत्सव है। सावन की फुहार, पेड़ों पर झूले, हाथों की मेहंदी, हरे रंग का श्रृंगार, लोकगीतों की मिठास और शिव-पार्वती की भक्ति—ये सभी मिलकर तीज को विशेष बनाते हैं।
आज जरूरत है कि आधुनिकता के इस दौर में भी हम अपनी लोक परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। तीज हमें प्रकृति से प्रेम करने, रिश्तों को महत्व देने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देती है।
सच तो यह है कि राजस्थान में जब सावन बरसता है, तो केवल धरती ही हरी नहीं होती—तीज के रंगों से रिश्ते, यादें और पूरी संस्कृति भी हरियाली से भर उठती है।






