
शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम
(डॉ.सीमा दाधीच)
युवाओं के आदर्श, पितृभक्त, महादानी पराक्रमी भगवान परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर बैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ। इस दिन को परशुराम जन्मोत्सव के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। परशुराम के बचपन का नाम राम था, किंतु शिव द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किए रहने के कारण यह परशुराम कहलाए। भगवान परशुराम साहस,पराक्रम और धर्म के प्रतीक हैं। परशुराम जी ने भगवान शिव को अपना आराध्य देव माना और कठोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया,उनकी तपस्या केवल पूजा तक ही सीमित नहीं थी बल्कि परशुराम में गहन अनुशासन और पूर्ण समर्पण था इसी कारण उन्होंने अपने जीवन को धर्म और ईश्वर की सेवा के प्रति समर्पित किया, शिवजी से प्राप्त शिक्षा और शक्ति के पथ पर ही परशुराम ने अधर्म का नाश किया और समाज में संतुलन स्थापित किया। परशुराम के जीवन से युवाओं को सकारात्मक दिशा में अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए, युवाओं को अपनी भावनाओं को सही दिशा में मोड़ना चाहिए। परशुराम के जीवन से युवाओं को बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम भी होना चाहिए इसके साथ ही जीवन में हमेशा अन्याय अत्याचार और अधर्म के खिलाफ निडर होकर खड़े होने की सीख लेनी चाहिए।परशुराम जी ने अपने जीवन में सदैव धर्म की रक्षा को सर्वोपरि रखा जब पृथ्वी पर अन्याय और अत्याचार बढ़ गया विशेषकर क्षत्रिय द्वारा, तब उन्होंने अधर्म का नाश करने का संकल्प लिया उन्होंने संदेश दिया कि जब समाज में असंतुलन हो तब धर्म की स्थापना के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक है। वे किसी जाति के विरोधी नहीं रहे केवल अन्याय का समूल नाश चाहते थे, परशुराम हमेशा न्याय प्रिय और निष्पक्ष, निडर रहे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत भावनाओं से उठकर न्याय का पालन किया उनके जीवन की घटनाएं सिखाती है कि न्याय करते समय पक्षपात नहीं होना चाहिए। परशुराम गुरु के रूप में भी श्रेष्ठ गुरु रहे उन्होंने कई योद्धाओं को शिक्षा दी और उन्हें उच्च शिक्षा युद्ध कला धनुर्विद्या अस्त्र विद्या दिव्यास्त्रों की शिक्षा में पारंगत किया, शिष्यों में भीष्म,द्रोणाचार्य, कर्ण और अकृतव्रर्ण का नाम मुख्य है। परशुराम शस्त्र और शास्त्र दोनों के ज्ञाता रहे। ये एक महान योद्धा और विष्णु के छठा अवतार के रूप में पूजे गए। उनका व्यक्तित्व अत्यंत वीर और साहसी था। वह केवल पराक्रम ही नहीं बल्कि अत्यंत विद्वान और संवेदनशील हृदय वाले भी थे उन्होंने अपनी माता रेणुका के सानिध्य में वेद,शास्त्र और धर्म का गहन अध्ययन किया। ज्ञान,तपस्या और अनुशासन के प्रतीक थे परशुराम उनके भीतर ब्रह्मज्ञान और क्षत्रिय शक्ति का अनोखा संगम था। परशुराम जी ने 21 बार क्षत्रियों को पराजित कर पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त की इसके बाद उन्होंने पूरी पृथ्वी ऋषि कश्यप को दान में दे दिया। यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दान है, उन्होंने अपने पास कोई राज्य या संपत्ति नहीं रखी सब कुछ दान करके स्वयं तपस्या के लिए वन चले गए। परशुराम का दान केवल धन या भूमि तक सीमित नहीं था उन्होंने पृथ्वी,संपत्ति और ज्ञान तीनों का त्याग करके आदर्श दानशीलता का उदाहरण प्रस्तुत किया।
यह पशु प्रेमी भी थे, परशुराम जी के पास सुरभि,कामधेनु नाम की दिव्य गाय थी। वे पशु पक्षियों की भाषा समझते थे और उनसे बात करते थे उनके दिव्य और शांत स्वभाव के कारण कई हिंसक वन्य पशु उनके स्पर्श मात्र से मित्र बन जाते थे। आज के युवाओं को अपने माता-पिता की आज्ञा का हमेशा पालन करना चाहिए और गुरु का सम्मान करना चाहिए। युवाओं को परशुराम जयंती पर संकल्पित होना चाहिए और अपने क्रोध पर नियंत्रण करना चाहिए, अनुशासन और तपस्या से ही व्यक्ति अपने जीवन में कठिन से कठिन कार्य को कर सकता है। यह कठोर तप और साधना जीवन में उन्नति की ओर अग्रसर करता हैं। हमें परशुराम जी के जीवन से और उनके व्यक्तित्व से क्रोध पर नियंत्रण जरूर सीखना चाहिए। साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए। धैर्य,समर्पण, निष्ठा और आस्था का अद्भुत संयम ही राम से भगवान परशुराम में निहित रहा इन्होंने ज्ञान तपस्या और तप और क्रोध पर नियंत्रण रखा और अहंकार की छाया भी इन्हें छू नहीं पाई। ये आज के युग के लिए आदर्श है।




