
गुरू ईश्वर का देवदूत
दिव्य राष्ट्र के लिए डॉ मंजु लता
“गुरु ईश्वर की ओर से भेजा हुआ वह देवदूत होता है जो आपको मुक्ति प्रदान करता है। जब आपका ज्ञान गुरु के ज्ञान के साथ एकाकार हो जाता है तब आपको मुक्ति मिलती है, अन्यथा आप अपनी इच्छाओं के दास बने रहते हैं। मुक्ति के पथ पर चलना उन महापुरुषों का अनुसरण करना है, जो स्वयं मुक्त हो चुके हैं।” पूर्व और पश्चिम के संत और योग के जनक कहलाए जाने वाले जगद्गुरु परमहंस योगानन्दजी के ये शब्द आषाढ़ के इस माह में आने वाली पुर्णिमा पर एक ऐसे शुभ संदेश की उद्घोषणा करते हैं जिसे सुनकर मन आशा से परिपूर्ण हो जाता है। आशा, कौनसी आशा? सब कष्टों से दूर आंतरिक सुख की आशा, आंतरिक शांति की आशा!
इस परम सुख और शांति को पाने हेतु अपनी पुस्तक “योगी कथामृत”, उनकी अद्वितीय और युग-युगांतकारी आध्यात्मिक विरासत के रूप में जानी जाने वाली आत्मकथा, में योगानन्दजी ने क्रियायोग के पथ को “ईश्वर के पास पहुँचने के लिए विमान मार्ग” की संज्ञा दी है। सभी दुखों का हवन अर्थात ईश्वर को पाने की इस उच्चतम वैज्ञानिक प्रविधि को सीखाने के लिए 1917 में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया तथा 1920 में अमरीका में सेल्फ़ रियलाईजेशन फ़ेलोशिप की स्थापना करके उन्होने एक जगद्गुरु की भूमिका निभाई। संसारभर में गृह पाठमाला अध्ययन की सुविधा प्रदान कर उन्होने मानवजाति पर एक महान् उपकार किया है। इच्छुक भक्त इसके विषय में अधिक जानकारी हेतु yssi.org देख सकते हैं।
सर्वविदित है कि हमारी भावनाएँ सृष्टि में विद्यमान द्वंद्वात्मकता के साथ प्रतिक्रिया करके हमें आसक्ति एवं अनावश्यक इच्छाओं के मायाजाल में फँसा देती हैं। इस शक्ति को निलंबित करने हेतु विमान चालक के रूप में एक सद्गुरु की नितांत आवश्यकता होती है। संत कबीर के ये शब्द गुरु की महता को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं-
यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान। शीश दिये यदि गुरु मिलें, तो भी सस्ता जान।
श्रीमद्भगवद् (IV:36) में कहा गया है —-“गुरु द्वारा दी गई साधना करता हुआ शिष्य अपना विवेक रूपी भवतारक बेड़ा स्वयं ही बना लेता है।” अपने शिष्य के संरक्षण हेतु गुरु उसके बुरे कर्मों को अपने ऊपर ले लेते हैं। यही नहीं ईश्वर की आज्ञा से वे समुदाय के सामूहिक कर्मों को भी अपने ऊपर लेने में सक्षम होते हैं। योगानन्दजी के शिष्य बताते थे कि एक बार कोरिया के युद्ध के दौरान समाधि की अवस्था में वे युद्धभूमि में घायल और मरने वाले सैनिकों की व्यथा को अपने ऊपर लेकर वे पीड़ा से कराह उठते थे।
गुरु के भौतिक रूप में प्रस्तुत न होने पर शिष्य संदेह करने लगते हैं कि वे उनकी कृपा अथवा उनके आशीर्वादों से वंचित रह जाएंगे। जबकि निश्चित रूप से ऐसा नहीं है। योगानन्दजी कहते हैं-“सिद्ध पुरुष के समसामयिक केवल वे ही लोग नहीं होते जो उनके जीवनकाल में हुआ करते हैं।” गुरु के सान्निध्य में होने का अर्थ उनके भौतिक शरीर के नहीं अपितु उनकी चेतना के सान्निध्य में होना होता है। परमहंस योगानन्दजी की एक निकट ईश्वर प्राप्त शिष्या श्री श्री दया माताजी के शब्द –“गुरुजी उतने ही तुम्हारे नजदीक हैं जितने तुम्हारे विचार उन्हें तुम्हारे निकट आने की अनुमति देते हैं” – इस तथ्य को पुष्ट करते हैं।
गुरु पुर्णिमा के इस पावन अवसर पर आइए परमहंस योगानन्दजी के इन शब्दों को एक प्रतिज्ञापन के रूप में अपना लें-“ हे गुरु… आप मूक ईश्वर की मुखर वाणी हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप मोक्ष के मंदिर के दिव्य द्वार हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”





