
उमेन्द्र दाधीच
किसानों के लिए बढ़ी एमएसपी, लागत और बाजार के बीच नई उम्मीद
नई दिल्ली:/ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार, 30 सितंबर 2026 को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए छह प्रमुख रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य किसानों को उत्पादन लागत पर लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है।
कैबिनेट के फैसले के मुताबिक गेहूं की एमएसपी में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर इसे 2,610 रुपये किया गया है। जौ की एमएसपी 136 रुपये बढ़कर 2,286 रुपये, चने की 83 रुपये बढ़कर 5,958 रुपये, मसूर की 390 रुपये बढ़कर 7,390 रुपये, रेपसीड एवं सरसों की 413 रुपये बढ़कर 6,613 रुपये तथा कुसुम की एमएसपी 675 रुपये बढ़कर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है।
इस निर्णय का महत्व केवल समर्थन मूल्य बढ़ाने तक सीमित नहीं है। भारतीय कृषि के सामने उत्पादन लागत, मौसम की अनिश्चितता, बाजार भाव, सिंचाई, उर्वरक और कृषि उत्पादों की खरीद जैसे अनेक सवाल लगातार बने रहते हैं। ऐसे में एमएसपी किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण मूल्य-सुरक्षा व्यवस्था के रूप में सामने आती है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा जब घोषित एमएसपी पर पर्याप्त और प्रभावी सरकारी खरीद भी सुनिश्चित हो।
सरकार ने बताया है कि गेहूं, सरसों, मसूर और अन्य रबी फसलों के लिए घोषित एमएसपी में उत्पादन लागत के ऊपर 50 प्रतिशत से लेकर 106 प्रतिशत तक का मार्जिन रखा गया है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार गेहूं पर यह मार्जिन 106 प्रतिशत, रेपसीड एवं सरसों पर 96 प्रतिशत और मसूर पर 92 प्रतिशत है।
फैसले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू दलहन और तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। भारत खाद्य तेल और दालों की घरेलू जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहता है। इसलिए सरसों, मसूर और चने जैसी फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी को घरेलू उत्पादन बढ़ाने की व्यापक नीति से जोड़कर देखा जा सकता है। सरकार ने धान कटाई के बाद खाली रहने वाले क्षेत्रों में दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए बीज, तकनीकी सलाह और वित्तीय सहायता देने की बात भी कही है।
किसान के लिए किसी भी नीति की सफलता का वास्तविक पैमाना खेत और मंडी के बीच दिखाई देता है। एमएसपी घोषित होने के साथ खरीद केंद्रों की उपलब्धता, समय पर भुगतान, भंडारण क्षमता, परिवहन व्यवस्था और मंडी तंत्र को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। यदि किसान को घोषित समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने में कठिनाई होती है तो कागज पर बढ़ी एमएसपी का पूरा आर्थिक लाभ उसे नहीं मिल पाएगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि खेती की लागत राज्य, फसल, सिंचाई और मौसम के अनुसार अलग-अलग होती है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एमएसपी बढ़ाने के साथ स्थानीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।
बुधवार का कैबिनेट फैसला किसानों को मूल्य-सुरक्षा देने, दलहन-तिलहन उत्पादन बढ़ाने और रबी कृषि को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम है। अब असली चुनौती इसे खेत तक पहुंचाने की है। एमएसपी की घोषणा से लेकर किसान के बैंक खाते में भुगतान तक पूरी व्यवस्था पारदर्शी, समयबद्ध और प्रभावी रहे—यही इस निर्णय की वास्तविक कसौटी होगी। किसानों की आय और कृषि की स्थिरता केवल कीमत से नहीं, बल्कि उत्पादन, खरीद, बाजार और जोखिम-प्रबंधन की पूरी श्रृंखला से तय होती है।




