
दिव्यराष्ट्र, जयपुर: राजस्थान भले ही देश में रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) का सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभरा है, लेकिन अब बिजली सप्लाई करने वाली ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी इसके रास्ते का रोड़ा बन रही है। राज्य में लगभग 60 गीगावाट (GW) के सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स से पैदा हो रही बिजली सिर्फ इसलिए अटके हुए हैं क्योंकि उन्हें ग्रिड से जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन लाइनें ही नहीं हैं। इससे साफ पता चलता है कि जिस रफ्तार से सोलर प्लांट लग रहे हैं, उस रफ्तार से बिजली आगे पहुँचाने का इंतजाम नहीं हो पा रहा है।
सेंट्रल ट्रांसमिशन यूटिलिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (CTUIL) ने हाल ही में केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) को एक रिपोर्ट सौंपी है। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में लगभग 73 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क की योजना बनाई जा चुकी है या उस पर काम चल रहा है। वहीं, ग्रिड कनेक्टिविटी के लिए आवेदन 130 गीगावाट से अधिक पहुंच चुके हैं। इसका मतलब है कि लगभग 60 गीगावाट परियोजनाओं के लिए अभी तक पर्याप्त ट्रांसमिशन व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
राजस्थान सौर ऊर्जा उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य है। यहां लगभग 179 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता होने का अनुमान है। इस क्षमता का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर जिलों में स्थित है, जहां भरपूर धूप और विशाल भूमि उपलब्ध है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि केवल बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यदि बिजली को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क नहीं होगा, तो ऊर्जा परियोजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा। राजस्थान में बड़ी संख्या में नई परियोजनाओं की घोषणा होने से ट्रांसमिशन नेटवर्क पर दबाव बढ़ गया है। परियोजनाओं में निवेश तेजी से हो रहा है, लेकिन ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण में भूमि अधिग्रहण, विभिन्न मंजूरियां और राज्यों के बीच समन्वय जैसी प्रक्रियाओं के कारण समय लगता है।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ सद्दाफ आलम का कहना है कि भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा में ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर रीढ़ की हड्डी की तरह है। राजस्थान में बनने वाली सौर और पवन ऊर्जा तब तक पूरी तरह उपयोगी नहीं हो सकती, जब तक उसके लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन लाइनें समान गति से विकसित न हों। एक मजबूत राष्ट्रीय ग्रिड ऊर्जा सुरक्षा और सस्ती स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है।
एक अन्य विशेषज्ञ का कहना है कि आज सबसे बड़ी चुनौती बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि उसे उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। यदि राजस्थान ने नई ट्रांसमिशन लाइनों और सबस्टेशनों के विस्तार की गति नहीं बढ़ाई, तो ऐसी स्थिति बन सकती है जहां कागजों पर बिजली उत्पादन मौजूद हो, लेकिन वह मांग वाले क्षेत्रों तक पहुंच ही न सके। भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पूरा करने में राजस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। ऐसे में नए सोलर पार्क और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।





