दिव्यराष्ट्र, जयपुर: राजस्थान समेत उत्तर भारत में भीषण गर्मी की दस्तक के साथ बिजली की मांग तेजी से बढ़ने लगी है। इसी के साथ प्रदेश में एक अहम चुनौती सामने आ रही है। देश के सबसे बड़े अक्षय ऊर्जा केंद्र के रूप में उभर चुके इस राज्य में करीब 4 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता दिन के समय ट्रांसमिशन बाधाओं के कारण पूरी तरह उपयोग में नहीं आ पा रही है। इससे स्वच्छ ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह को लेकर चिंता बढ़ गई है।
नॉर्दर्न रीजनल लोड डिस्पैच सेंटर (NRLDC) के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में वर्तमान में लगभग 23 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित है। इसके विपरीत, उपलब्ध ट्रांसमिशन नेटवर्क केवल 18.9 गीगावाट बिजली संभालने में सक्षम है। इस बड़े अंतर के कारण कई चालू सोलर प्लांट अपनी पूरी क्षमता से बिजली की सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं।
बता दें कि मौजूदा ट्रांसमिशन क्षमता का अधिकांश हिस्सा उन परियोजनाओं को आवंटित है जिनके पास लंबी अवधि का ‘जनरल नेटवर्क एक्सेस’ (GNA) है। इससे 4 गीगावाट से अधिक क्षमता वाले सोलर प्लांट अस्थायी नेटवर्क एक्सेस (T-GNA) के भरोसे चल रहे हैं, जिन्हें बिजली भेजने के लिए स्थायी ट्रांसमिशन मार्ग नहीं मिल पा रहा है।
जिसके चलते, कई परियोजनाओं को बिजली कटौती (कर्टेलमेंट) का सामना करना पड़ रहा है। यह समस्या मुख्य रूप
से राजस्थान के प्रमुख सौर उत्पादन जिले जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर में देखी जा रही है। जहां बड़े सोलर
पार्क दिन के समय भारी मात्रा में बिजली पैदा कर रहे हैं। इससे अब ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ सद्दाफ आलम का कहना है कि राजस्थान गर्मियों की दोपहर में, जब मांग चरम पर होती है, भारी मात्रा में सौर ऊर्जा की आपूर्ति करने में सक्षम है। लेकिन जब तक ट्रांसमिशन विस्तार की गति उत्पादन के बराबर नहीं होगी, तब तक यह स्वच्छ ऊर्जा स्रोत पर ही फंसी रहेगी। उन्होंने कहा कि यह स्थिति ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़े असंतुलन को दर्शाती है। भारत में कई क्षेत्रों में अक्षय ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन ट्रांसमिशन नेटवर्क उसी गति से विकसित नहीं हो पा रहा है। राजस्थान इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां उत्पादन क्षमता तो है, लेकिन उसे बाहर भेजने के लिए मजबूत नेटवर्क की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं अक्सर दूरस्थ और संसाधन-समृद्ध इलाकों में स्थापित होती हैं, जो बड़े उपभोग केंद्रों से काफी दूर होते हैं। ऐसे में उच्च क्षमता वाले अंतरराज्यीय ट्रांसमिशन कॉरिडोर बेहद जरूरी हो जाते हैं। एक अन्य ऊर्जा विश्लेषक के अनुसार, राजस्थान में इतनी क्षमता है कि वह उत्तर और मध्य भारत के बड़े हिस्से को स्वच्छ बिजली दे सकता है। लेकिन इसके लिए ग्रिड का विस्तार उत्पादन के साथ-साथ होना चाहिए। ट्रांसमिशन लाइनें ही वे हाईवे हैं, जिनसे रेगिस्तान की बिजली शहरों तक पहुंचती है।
ट्रांसमिशन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जैसे-जैसे भारत अपने महत्वाकांक्षी स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, इस मुद्दे पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। एक ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ ने कहा कि ट्रांसमिशन लाइनें ऊर्जा परिवर्तन की ‘साइलेंट एनैबलर’ हैं। यदि राजस्थान की धूप से पूरे भारत के घरों और उद्योगों को रोशन करना है, तो हमें मजबूत ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर की तत्काल आवश्यकता है।





