‘साइलेंट गेम चेंजर’ के ‘साइलेंट स्ट्रैटेजिस्ट’
(दिव्यराष्ट्र)
समुद्र लांघने से लेकर सीता जी का पता लगाने, राक्षसों का वध और लंका दहन जैसे तमाम पराक्रमों का क्रेडिट हनुमान जी राम को दे देते हैं-प्रभु, यह सब आपकी ही कृपा है। इस संबंध में रामचरितमानस में एक से एक सुंदर व प्रेरक प्रसंग है।
जब हनुमान लंका से लौटकर राम को माता सीता का संदेश और मुद्रिका देते हैं, तब भी वे अपनी प्रभुता को नकारते हुए कहते हैं-राम कृपा भा काजु बिसेषी” अर्थात राम जी की कृपा से ही सब विशेष कार्य सफल हुए हैं। हनुमान जी विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं कि उनका पराक्रम, सीता माता की खोज और लंका को जलाना केवल राम जी की शक्ति और कृपा से ही संभव हुआ है।
ठीक उसी तरह बंगाल विजय के बाद भाजपा में यह देखा जा रहा है कि जीत का श्रेय हर कोई एक दूसरे को दे रहा है। हालांकि ज्यादातर भाजपाई बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में पार्टी की जीत का सेहरा शीर्ष नेतृत्वकर्ता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के सिर पर बांध रहे हैं और यह सही भी है मगर इससे अलग बंगाल अभियान में लगे तमाम नेता और कार्यकर्ता एक दूसरे की मेहनत को क्रेडिट दे रहे हैं, सराहना कर रहे हैं। भाजपा की यही ताकत है जो उसे लगातार सफलता दिला रही है।
बहुत सुंदर दृश्य दिखा जब 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय पहुंचे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम दिग्गजों की मौजूदगी में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन प्रधानमंत्री को माला पहनाने के लिए आगे बढ़े तो प्रधानमंत्री ने माला लेकर उन्ही को पहना दिया और उनकी पीठ ठोंकी। इस पर पूरा पार्टी मुख्यालय तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। पूरा देश जानता है कि बंगाल चुनाव को जीतने के लिए मोदी और शाह ने कैसी मेहनत की है, कैसा पराक्रम दिखाया है और तब जीत का चमत्कार हो पाया है। गृहमंत्री अमित शाह ने तो जैसा आक्रामक चुनाव प्रचार बंगाल में किया, शायद ही कभी अपने जीवन में पहले किया होगा। लेकिन दोनों शीर्षस्थ नेताओं ने जीत का श्रेय पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इसे कार्यकर्ताओं की दशकों की “तपस्या और संघर्ष” का परिणाम बताया। उन्होंने कार्यकर्ताओं को “पार्टी की असली ताकत” कहा, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मेहनत की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल जीत को कार्यकर्ताओं के बलिदान और समर्पण की जीत बताया।
*सुनील बंसल पर केके उपाध्याय का लेख**
इसी क्रम एक लेख देखा जो देश के वरिष्ठ पत्रकार केके उपाध्याय ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल प्रभारी सुनील बंसल के संबंध में लिखा-“बंगाल विजय ने इतिहास रचा, सूत्रधार बने सुनील बंसल।” मुझे यह लेख पढ़ कर अच्छा लगा। उपाध्याय ने सारा क्रेडिट बंसल को दे दिया। यहां हम पहले दोनों लोगों के संबंध को बता दें। वैसे तो उपाध्याय ने चुनाव में भाजपा के मीडिया कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया है मगर हकीकत में उन्होंने बिल्कुल ‘मौन साधक’ के रूप में सुनील बंसल के साथ काम करते हुए ‘बदलाव की इबारत’ लिखी है। वे बंसल जी के ‘बैकबोन’ हैं या यूं कह लें ‘दाहिने हाथ’। उपाध्याय जी ने पूरे चुनाव में भाजपा चिंतक और रणनीतिकार की भूमिका निभाई। बिल्कुल साइलेंटली।
*एक साल से बंगाल में रहकर अथक प्रयास**
भाजपा में भी बहुत कम लोगों को पता है कि वे साल भर पहले से एक बड़ी टीम के साथ कोलकाता में कैंप कर रहे थे जब से सुनील बंसल ने बंगाल में अपना आसन जमाया । सुनील बंसल की योजना को अमली जामा पहनाने में केके उपाध्याय ने शानदार काम किया है।
*साइलेंट गेम चेंजर’ के ‘मौन रणनीतिकार’**
सुनील बंसल को बंगाल विजय का ‘साइलेंट गेम चेंजर’ बताया जा रहा है। केके उपाध्याय बंसल के ‘साइलेंट स्ट्रैटेजिस्ट’ हैं। आठ साल तक भाजपा के संगठन मंत्री और चार साल से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहते किसी ने बंसल को टीवी डिबेट में नहीं देखा, किसी भी मंच पर बड़ी-बड़ी बातें करते नहीं देखा। करीब 12 साल के राजनीतिक सफर में समाचार पत्रों में उनके साक्षात्कार तो दूर बयान तक नहीं छपे। वह भी तब, जब उन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकसभा और विधानसभा के दो-दो चुनावों में जीत का शिल्पकार करार दिया गया। गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी उसी सुनील बंसल ने अपनी मौन रणनीति से पूरब में भाजपा के लिए अब तक अभेद्य किला रहे पश्चिम बंगाल को अपनी व्यूह रचना से भेद दिया। वह भी तब, जब करीब दो साल पहले उसी पश्चिम बंगाल में पार्टी को मिली करारी हार के बाद उनकी प्रतिभा और क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे थे।
लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त को बंसल ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना को जमीनी स्तर पर मुद्दा बना कर तृणमूल के भोद्रोलोक और बंगाल अस्मिता से जुड़े वोट बैंक को तोड़ने के लिए बांचते चाईं-बीजेपी ताई (जीना है तो भाजपा जरूरी) का नारा गढ़ा जो देखते ही देखते पार्टी का प्रमुख नारा बन गया। जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने के लिए बंसल ने कई प्रयोग किए। इसके लिए 1.65 लाख घर-घर बैठकें आयोजित करने के साथ ही हर विधानसभा में कमल मेलाओं का आयोजन और फुटबॉल मैच आयोजित कराए। इस दौरान हिंसा के कारण वोट देने से वंचित रहने वाले बूथों की पहचान की, जिससे हिंसामुक्त चुनाव में मदद मिली। इनके अलावे बंसल ने तमाम उपाय किए जिससे ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को शिकस्त दिया जा सका। सुनील बंसल के प्रयासों के पीछे केके उपाध्याय की बड़ी भूमिका रही है। पश्चिम बंगाल में अब मिली सफलता ने राष्ट्रीय राजनीति में बंसल के कद को और बड़ा कर दिया है।
*पड़ते जिस ओर चरण मेरे, भूगोल उधर दब जाता है*….
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की बड़ी ओजस्वी कविता है- “पड़ते जिस ओर चरण मेरे, भूगोल उधर दब जाता है।” मैंने चुनाव के दौरान कोलकाता प्रवास में इस कविता की चर्चा करते हुए उपाध्याय से कहा था कि आप और सुनील बंसल जिन- जिन राज्यों में गए, वहां भाजपा जीत गई, बंगाल में क्या होगा? भाजपा कार्यालय स्थित अपने चेंबर में उपाध्याय जी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा-“देखिएगा यहां भी भाजपी जीतेगी।” चेंबर में मौजूद दिल्ली से आए भाजपा पदाधिकारी बताने लगी कि हां, यह बात तो सही है कि आपने इसके पहले महाराष्ट्र और ओडिशा में काम किया और दोनों जगह पार्टी को सफलता मिली।
दरअसल, सुनील बंसल से केके उपाध्याय के संबंध उत्तर प्रदेश में बने थे जहां बंसल भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री हुआ करते थे। यहां बता दें कि बंसल ही वह शख्स थे जिन्होंने अमित शाह के मार्गदर्शन में काम करते हुए वर्ष 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को शानदार सफलता दिलाई थी। उस समय अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। भाजपा ने इन दोनों की रणनीतिक जोड़ी के दम पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। बंगाल में अमित शाह और सुनील बंसल की जोड़ी ने यूपी के इतिहास को दोहराया है। उत्तर प्रदेश में सुनील बंसल के साथ भाजपा संगठन को मजबूत करने के लिए केके उपाध्याय ने उल्लेखनीय काम किए।
*जहीन संपादक से ‘सफल रणनीतिकार’**
केके उपाध्याय बिहार और उत्तर प्रदेश में हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के कार्यकारी संपादक और उसके पहले अमर उजाला के संपादक रहे हैं। पत्रकार के रूप में उनकी छवि और लेखनी-दोनों शानदार रही है।
बिहार में ‘हिंदुस्तान’ से अलग होने के बाद उन्होंने जनता टीवी में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के संपादक के रूप में काम किया लेकिन इसी दौरान वे लखनऊ में सुनील बंसल के साथ भाजपा प्रवक्ताओं की ट्रेनिंग और अन्य रणनीतिक काम में जुड़ गए। उपाध्याय जी एक शानदार इंसान और जहीन किस्म के संपादक रहे हैं। पिछले दिनों कोलकाता में जब भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में उनसे मुलाकात हुई तो उनके पास बैठे कई लोग कह रहे थे कि आपका व्यक्तित्व जितना शानदार है, उतना ही शानदार आपका संस्कार है। सभी लोग अलग-अलग प्रदेशों के थे और चुनाव में उनके साथ काम करने आए थे।
मैंने उपाध्याय के साथ काम किया है हिंदुस्तान अखबार में। वे पटना में थे और मैं भागलपुर में। अखबार से अलग होने के बाद भी उनसे संपर्क बना हुआ है और मिलना-जुलना भी।
शायद ही कोई आलोचना करने वाला मिलेगा उपाध्याय जी का। संपादक थे तब भी और आज भी, कम बोलते हैं। मौन रहकर रणनीति बनाते हैं। इधर-उधर की फालतू बात नहीं करते। अपनी बखान करते उन्हें कभी नहीं देखा गया और ना किसी के साथ बेअदबी से पेश आते। सबके साथ बड़ा ही शालीन व्यवहार, सबका सम्मान करने वाले, दोस्तों के दोस्त। उनका व्यक्तित्व जितना शानदार है व्यवहार भी। अखबार में उनका लोकप्रिय नाम ‘केके’ (kk sir या kk jee) रहा है। आदर से उन्हें ‘उपाध्याय जी’ भी कहा जाता है। हिंदुस्तान अखबार में बिहार और झारखंड के दो- दो बार संपादक रहे। प्रख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ बाबू के निधन के बाद पीएमसीएच में एंबुलेंस आने में देरी हुई थी जिसके चलते उनकी लाश पड़ी रही। इस मुद्दे पर केके उपाध्याय ने अखबार के पहले पेज पर जो लेख लिखा, उसके तीखेपन की लोग आज भी चर्चा करते हैं। स्वास्थ्य विभाग की बखिया उधेड़ कर रख दी थी। यह वह दौर था जब नीतीश सरकार की आलोचना करने का मतलब परेशानी को आमंत्रण देना था। बंगाल चुनाव के दौरान केके उपाध्याय ने कई राष्ट्रवादी लेख लिखे जिसकी खूब चर्चा हुई। बंगाल प्रवास के दौरान अमेरिका के एक प्रोफेसर से हमारी अक्सर मुलाकात होती थी। उन्होंने अक्सर भारत की यात्रा कर अच्छी हिंदी सीख ली है। एक दिन उनके समक्ष सोशल मीडिया पर टंगे केके उपाध्याय के एक लेख पर मैं किसी से चर्चा कर रहा था। बीच में टोक कर अमेरिकी प्रोफेसर ने उस लेख को पढ़ा और सराहना की। फिर के के उपाध्याय से मिलने की ईच्छा जाहिर की। उपाध्याय जी छोटा और कंपैक्ट लेख लिखते हैं। उनके वाक्य बहुत ही छोटे और रोचक होते हैं।
किसी को भी आश्चर्य होगा कि कम बोलने वाला और झूठ -फरेब से दूर रहने वाला पत्रकार राजनीति का कुशल रणनीतिकार कैसे बन गया? लेकिन इन दोनों नेता और रणनीतिकार पर पार्टी का भरोसा इस कदर बढ़ रहा है जिसको देखकर ऐसा लग रहा है कि आने वाला कल भारत की राजनीति में ‘सुनील बंसल का कौशल’ और ‘केके का करिश्मा’ का और शानदार गवाह बनेगा।