समाज रत्न
दिव्यराष्ट्र:/ कुछ व्यक्तित्व केवल अपने लिए नहीं जीते—वे अपनी प्रतिभा को समाज की संवेदना से जोड़कर जीवन को सार्थक बनाते हैं। सौ. भाग्यश्री गोविंदप्रसाद दायमा (दाधीच) ऐसा ही एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिनकी पहचान कवयित्री, लेखिका, गायिका, संगीतप्रेमी, एंकर एवं समाजसेविका के रूप में निरंतर विस्तार पा रही है।
जन्म वर्ष : 1970,जन्म स्थान : अंबाजोगाई, महाराष्ट्र*
कलम से भाव, स्वर से संवेदना और कर्म से सेवा*
साहित्य के क्षेत्र में उनकी सक्रियता अनेक प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची है। जलगाँव के राज्यस्तरीय कवि सम्मेलन में बहिणाबाई चौधरी महाराष्ट्र फेवरेट कवि पुरस्कार, वारजे, पुणे में महिला दिवस समारोह में अध्यक्ष पद एवं अहिल्याबाई होलकर पुरस्कार, विश्व ब्राह्मण समाज संघटना, पुणे की ओर से समाजभूषण महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार तथा विभिन्न संस्थाओं द्वारा काव्य लेखन पुरस्कार एवं काव्य भूषण पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
98वें अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन, दिल्ली में उनकी कविता का कवि कट्टा के लिए चयन होना उनकी साहित्यिक प्रतिभा की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।
संत तुकाराम भवन, पंढरपुर में हस्तलिखित “नामदेव गाथा” के लिए अध्यक्ष के कर-कमलों से श्री विठ्ठल-रुक्मिणी की मूर्ति एवं सम्मानपत्र प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी साहित्य-साधना के साथ-साथ उनकी भक्ति एवं सांस्कृतिक संवेदना का भी परिचायक है।
नाशिक ज्ञानसिंधु राज्यस्तरीय काव्य सम्मेलन में उनकी कविता का चयन हुआ तथा उन्हें आमंत्रित कवयित्री के रूप में सहभागिता का अवसर मिला। अनेक अखिल भारतीय, राज्यस्तरीय एवं अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में उन्होंने हिंदी एवं मराठी कविताओं का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया है।
आधुनिक केसरी, पुढारी, ज्योतिर्मय कॅलिफोर्निया, ज्ञानसिंधु महिला विश्व सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ एवं लेख प्रकाशित हुए हैं। उनकी कविताओं की पुस्तक के प्रकाशन की तैयारी भी प्रगतिपथ पर है।
पुरस्कारों से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी साहित्य-साधना*
साहित्यिक उपलब्धियों की इस यात्रा में उन्हें महाकवि कालिदास पुरस्कार से सामाजिक कार्यों के लिए भी सम्मानित किया गया। अष्टपैलू संस्कृति कला अकादमी, मुंबई की ओर से राज्यस्तरीय काव्य लेखन पुरस्कार तथा काव्य भूषण पुरस्कार प्राप्त करना उनकी रचनात्मक प्रतिभा की प्रतिष्ठित पहचान है।
उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति केवल हिंदी और मराठी तक सीमित नहीं है। अपनी बोली राजस्थानी भाषा के गीतों तथा भक्ति संगीत के प्रति भी उनका विशेष लगाव है। साहित्य, गीत, संगीत और मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से वे भारतीय संस्कृति एवं भावनाओं को अभिव्यक्ति देती हैं।
संगीत और मंच—अभिव्यक्ति के दो सशक्त माध्यम*
भाग्यश्री को सिंगिंग, म्यूजिक और एंकरिंग में विशेष रुचि है। स्वर और संगीत के प्रति उनका अनुराग उनकी रचनात्मक यात्रा को एक अलग आयाम देता है। मंच संचालन के माध्यम से लोगों से जुड़ने और अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से वातावरण को जीवंत बनाने की उनकी क्षमता उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को और समृद्ध करती है।
हिंदी, मराठी एवं राजस्थानी गीतों तथा भक्ति संगीत के माध्यम से अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को व्यापक मंच प्रदान करना उनके साहित्य एवं संस्कृति प्रेम का परिचायक है।
प्रतिभा जब सेवा बन जाए*
भाग्यश्री जी की यात्रा की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि उनकी साहित्यिक संवेदना सामाजिक सेवा में भी दिखाई देती है।
गीता परिवार फाउंडेशन की दत्त पालक योजना से जुड़े बच्चों के लिए शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने में सहयोग से लेकर लक्ष्मीबाई गर्ल्स हाईस्कूल की बालिकाओं को स्कूल यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने तक उन्होंने जरूरतमंदों के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई है।
ईंट-भट्ठा कामगार परिवारों के लिए दीपावली के अवसर पर दीये, पणती, दीपक, दीपावली फराळ के पैकेट एवं मिठाई देकर उनके घरों में भी त्योहार का उजास पहुँचाने का कार्य उनके सेवा-भाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।
डीआईटीएफ फाउंडेशन, मुंबई के लिए स्वरचित गीतों का योगदान तथा सोशल मीडिया फाउंडेशन महाराष्ट्र महिला ग्रुप, पुणे की सदस्य के रूप में सक्रिय सहभागिता भी उनके सामाजिक सरोकारों को दर्शाती है।
साहित्य से समाज तक… एक सार्थक यात्रा
भाग्यश्री जी का व्यक्तित्व यह प्रमाणित करता है कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि संवेदनाओं को कर्म में बदलने की शक्ति भी है।
उनकी कलम भावनाओं को शब्द देती है, उनका स्वर उन भावनाओं को जन-जन तक पहुँचाता है और उनका सेवा-भाव उन संवेदनाओं को समाज के जरूरतमंद वर्ग तक ले जाता है।
जहाँ शब्द कविता बनते हैं,
कविता संवेदना बनती है,
संवेदना सेवा बनती है
और सेवा किसी के जीवन में उजाला बन जाती है।
यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व…
सौ. भाग्यश्री गोविंदप्रसाद दायमा (दाधीच) की जीवनयात्रा हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन में मिली प्रतिभा और अवसर केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और मानवता के कल्याण के लिए भी समर्पित किए जा सकते हैं।
साहित्य की साधना, संगीत का अनुराग, मंच की प्रभावशाली अभिव्यक्ति और जरूरतमंदों के प्रति सेवा का भाव—इन सभी का सुंदर समन्वय उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट, अनुकरणीय और प्रेरणादायी बनाता है।