(मेजर जनरल डॉ राजेश चोपड़ा, एवीएसएम (सेवानिवृत्त) महानिदेशक, इंडियन माल्ट व्हिस्की एसोसिएशन)
(नई दिल्ली, दिव्यराष्ट्र) वह दौर अब बीत चुका है जब लग्ज़री स्पिरिट्स में कुछ पारंपरिक जगहों की मोनोपॉली हुआ करती थी। आंकड़े इस कहानी को साफ तौर पर बयां करते हैं। सिंगल माल्ट ने देश में इम्पोर्टेड स्कॉच से ज़्यादा बिक्री करके ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली है। इसी गति को बनाए रखते हुए, भारतीय व्हिस्की सेक्टर अब एशिया-पैसिफ़िक मार्केट के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा बनाता है। मार्केट की मौजूदा रिपोर्ट्स के अनुसार डोमेस्टिक सिंगल माल्ट कैटेगरी अगले दशक में 12 फीसदी से अधिक की सीएजीआर दर से विकसित होगी। हालाँकि, यह बढ़ोतरी सिर्फ़ मार्केट वॉल्युम या ब्रांडिंग की वजह से नहीं है। यह मैच्योरेशन में आए बुनियादी बदलाव को दर्शाता है, जिस पर उपमहाद्वीप के ट्रॉपिकल जलवायु का गहरा असर देखने को मिल रहा है।
ट्रॉपिकल गर्मी का असर बहुत अधिक होता है; इससे हर साल तकरीबन 10 से 12 फीसदी एंजल्स शेयर (वाष्पीकरण से होने वाला नुकसान) होता है, जबकि ठंडी जगहों पर यह सिर्फ़ 2 फीसदी होता है। हालांकि, वाष्पीकरण की तेज़ दर इस प्रक्रिया का सिर्फ़ एक पहलू है। वाष्पीकरण के बाद बचा हुआ लिक्विड बहुत गाढ़ा और बढ़िया होता है, जो लकड़ी के साथ लंबे समय तक संपर्क में रहने से बनता है। और भारत का मौसम इसे और अनुकूल बनाता है। ट्रॉपिकल वातावरण मैच्योरेशन के दौरान ऐसी तीव्रता प्रदान करता है, जिसकी बराबरी टेम्परेट जलवायु नहीं कर सकता। इस वातावरण में बैरल अधिक गहराई से “साँस” लेता है, स्पिरिट लकड़ी से अधिक गुणों को अवशोषित करती है, और स्वाद अधिक सघन तथा बहुस्तरीय रूप में विकसित होते हैं।इसके लिए बैरल का प्रबन्धन सावधानीपूर्वक करना ज़रूरी है, जहाँ प्रोडक्ट सिर्फ ऐज के आधार पर नहीं, बल्कि उसके स्वाद की परिपक्वता के आधार पर तैयार होता है। इस तरह सुनिश्चित किया जाता है कि फाइनल प्रोडक्ट की गुणवत्ता और स्वाद बेहतरीन हो संतुलित, तथा लकड़ी के टैनिन्स माल्ट के नाज़ुक स्वाद पर हावी न होने पाएँ।
उत्पादन का यह अनूठा वातावरण विश्वस्तरीय निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय पारखियों का ध्यान आकर्षित कर रहा है, जिससे भारतीय सिंगल माल्ट जिज्ञासा के दायरे से बढ़कर प्रीमियम प्रोडक्ट के रूप में स्थापित हो गया है। निवेशकों की सोच में भी बदलाव आया है, और सीमित मात्रा में निर्मित इन स्पिरिट्स की तरफ़ झुकाव बढ़ रहा है। इन्हें निवेश की परिसंपत्तियों के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, जागरूक उपभोक्ता अब लक्ज़री प्रोडक्ट्स की पर्यावरणीय साख पर भी सवाल उठा रहे हैं। वहीं भारतीय उद्योग जल-संरक्षण के कठोर मानकों को अपना रहा है। डिस्टिलरियां अपशिष्ट जल उपचार, भूजल स्तर बढ़ाने और सस्टेनेबिलिटी को बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं, ताकि प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित बनाए रखते हुए निवेशकों का भरोसा बनाए रखा जा सके। गर्मी, वाष्पीकरण और लकड़ी के बीच गहरे पारस्परिक प्रभाव ने साबित कर दिया है कि गुणवत्ता केवल समय का परिणाम नहीं बल्कि इस पर वातावरण और विशेषज्ञता का भी प्रभाव पड़ता है।
उद्योग की आवाज़ अधिक प्रभावशाली होती जा रही है, इस बीच इंडियन माल्ट व्हिस्की एसोसिएशन का एक ही उद्देश्य है- विश्व स्तर पर भारतीय माल्ट व्हिस्की की रक्षा करना, उसका संरक्षण करना और उसे बढ़ावा देना।
इसी उद्देश्य के साथ एसोसिएशन ने निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों के हित में एक पारदर्शी माहौल बनाया है। इसके तहत भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की और भारतीय प्योर माल्ट व्हिस्की के लिए स्पष्ट, वैश्विक मानकों के अनुरूप “दिशानिर्देश और मानक तय किए गए हैं। ये मानक प्रोडक्ट की गुणवत्ता, प्रमाणिकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के साथ-साथ भारतीय माल्ट व्हिस्की की वैश्विक पहचान को और सुदृढ़ बनाते हैं।