
(दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई, लेखक व विचारक)
कॉरपोरेट् जगत विज्ञापन से लेकर ग्राहक के सर्विस चयन, ड्रेस कोड और हाल ही में नासिक में एक नामी आईटी कंपनी में सामने आए यौन शोषण और धर्मांतरण का बहुचर्चित घटनाक्रम ने संपूर्ण देश को झकझोर दिया है। जिस तेजी से वैश्विक कॉर्पोरेट संस्कृति, भारत में सांस्कृतिक आस्था पर चोट कर रहा है, कॉरपोरेट जगत केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं ला रही—वह हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी चुनौती दे रही है।
पिछले कुछ समय में अनेक ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्होंने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में कार्य कर रही बड़ी कंपनियाँ वास्तव में “समानता” और “समावेश” का पालन कर रही हैं, या फिर यह केवल एक दिखावा बनकर रह गया है? त्योहारों पर बनाए गए विज्ञापन हों, ड्रेस कोड से जुड़ी नीतियाँ हों, या ग्राहकों के अधिकारों पर दिए गए बयान—कई मामलों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि एक विशेष सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि बहुसंख्यक समाज की परंपराओं को या तो नजरअंदाज किया जा रहा है या सीमित करने का प्रयास हो रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या भारत में अपनी ही संस्कृति को मानना अब “समस्या” बनता जा रहा है?
जब किसी संस्थान में एक धार्मिक प्रतीक को अनुमति दी जाती है, लेकिन दूसरे को नहीं, तो यह “समानता” नहीं बल्कि “चयनात्मक नीति” कहलाती है। यदि किसी महिला को अपने पारंपरिक प्रतीक जैसे बिंदी, सिंदूर या कलावा पहनने में बाधा हो, लेकिन अन्य प्रतीकों को खुली छूट दी जाए, तो यह स्पष्ट रूप से दोहरे मानदंड का काम है।
समाज को इस असंतुलन के विरुद्ध अपनी चेतन शक्ति से जबाब देना चाहिए। अब समय की मांग है कि किसी के विरोध में खड़ा होना मात्र ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति सजग और स्वाभिमानी होना है। यह वह विचार है जो अपने जीवन मूल्य की रक्षा करें। कॉर्पोरेट जगत को यह समझना होगा कि भारत केवल एक “मार्केट” नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। जो जीवन मूल्यों के लिए जीता है।
यदि समाज अपनी परंपराओं और प्रतीकों के प्रति उदासीन रहेगा, तो कोई भी बाहरी शक्ति उसे आसानी से प्रभावित कर सकती है। अपनी पहचान को सम्मान देना ही हिंदुत्व का मूल है।
आज के समय में उपभोक्ता ही सबसे बड़ी शक्ति है। यदि किसी कंपनी की नीति अनुचित लगती है, तो उसे प्रश्न करना, प्रतिक्रिया देना और आवश्यक रूप से वैकल्पिक विकल्प चुनना पूरी तरह से वैध और लोकतांत्रिक अधिकार और जवाब है।
जिम्मेदार प्रतिक्रिया का अर्थ अराजकता नहीं है। शांतिपूर्ण बहिष्कार, जागरूकता अभियान और संवाद—ये सभी प्रभावी और सकारात्मक तरीके हैं, जो किसी भी संस्था को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
हिंदुत्व का उद्देश्य किसी के खिलाफ नफरत फैलाना नहीं है। यह एक चेतावनी है—कि यदि संतुलन और समानता नहीं रखी गई, तो समाज में असंतोष बढ़ेगा। भारत की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन यह तभी संभव है जब सभी के साथ समान व्यवहार हो।
कॉर्पोरेट जगत को यह समझना होगा कि “ब्रांड वैल्यू” केवल विज्ञापन से नहीं बनती, बल्कि उस विश्वास से बनती है जो समाज उसके प्रति रखता है। और यदि यह विश्वास टूटता है, तो सबसे बड़ी कीमत वही कंपनियाँ चुकाती हैं।




