
सर्जरी या रिमोट कंट्रोल तकनीक से बढ़ाई जा सकती है इम्प्लांट की लंबाई
जयपुर, दिव्यराष्ट्र*। ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में बच्चों के उपचार के लिए ग्रॉइंग इम्प्लांट एक महत्वपूर्ण और आधुनिक तकनीक के रूप में सामने आया है। हड्डियों के कैंसर के कारण जब बच्चों की हड्डी का कोई हिस्सा निकालना पड़ता है, तब इस विशेष प्रकार के इम्प्लांट की मदद से हाथ या पैर की लंबाई को बच्चे की बढ़ती उम्र के अनुसार समायोजित किया जा सकता है। भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. प्रवीण गुप्ता ने बताया कि बच्चों की हड्डियां लगातार बढ़ती रहती हैं, इसलिए सामान्य इम्प्लांट कई बार लंबे समय तक उपयुक्त नहीं रहते। इसी समस्या के समाधान के लिए ग्रॉइंग इम्प्लांट विकसित किए गए हैं, जो बच्चे की बढ़ती उम्र के साथ उनकी हड्डियों की लंबाई को संतुलित बनाए रखने में मदद करते हैं।
उन्होंने बताया कि यह इम्प्लांट मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार वह है जिसमें बच्चे के शरीर में लगाए गए इम्प्लांट की लंबाई समय-समय पर सर्जरी के माध्यम से बढ़ाई जाती है। आमतौर पर लगभग हर छह महीने में एक छोटी सर्जरी कर इम्प्लांट की लंबाई बढ़ाई जाती है, ताकि वह बच्चे की प्राकृतिक वृद्धि के अनुरूप बना रहे। यह प्रक्रिया आमतौर पर बच्चे की लगभग 13 वर्ष की आयु तक जारी रहती है। इस प्रकार के इम्प्लांट की कीमत लगभग 5 लाख रुपये तक होती है।
वहीं दूसरा और अधिक आधुनिक प्रकार का इम्प्लांट रिमोट कंट्रोल तकनीक पर आधारित होता है। इसमें बार-बार सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस इम्प्लांट में विशेष मैग्नेटिक मैकेनिज्म लगा होता है, जिसकी मदद से डॉक्टर बाहर से रिमोट कंट्रोल के जरिए कमांड देकर इम्प्लांट की लंबाई बढ़ा सकते हैं। यह प्रक्रिया अस्पताल में ही कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है। इस प्रकार के उन्नत इम्प्लांट की कीमत लगभग 12 लाख रुपये तक होती है।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि आधुनिक तकनीक से बच्चों को बार-बार होने वाली सर्जरी से काफी हद तक राहत मिलती है और उनकी सामान्य शारीरिक वृद्धि को बनाए रखने में मदद मिलती है। ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी में ग्रॉइंग इम्प्लांट जैसी तकनीकों के उपयोग से अब हड्डियों के कैंसर से प्रभावित बच्चों के लिए बेहतर और प्रभावी उपचार के नए रास्ते खुल रहे हैं।



