
31 मई जयंती पर विशेष
(दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई जोधपुर)
भारतीय इतिहास में अनेक महान शासकों ने अपने पराक्रम, प्रशासन और जनकल्याणकारी कार्यों से अमिट छाप छोड़ी है, किंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल एक राज्य के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। देवी अहिल्याबाई होल्कर ऐसा ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थीं। वे केवल मालवा की महारानी नहीं थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, धर्मस्थलों के संरक्षण और लोककल्याण की महान संरक्षिका थीं। उनका शासन भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। विशेष रूप से भारतीय मंदिरों के पुनर्निर्माण और तीर्थों के संरक्षण में उनका योगदान अतुलनीय है।
31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहिल्याबाई नगर (जिसे पहले अहमदनगर के नाम से जाना जाता था) जिले के चौंडी ग्राम में उनका जन्म मानकोजी शिंदे के घर हुआ। वे एक सामान्य ग्रामीण परिवार से थीं, किंतु उनके संस्कार, करुणा और धर्मनिष्ठा ने उन्हें असाधारण बना दिया। बाल्यकाल से ही उनमें सेवा, दया और धार्मिक आस्था के गुण दिखाई देते थे। कहा जाता है कि एक दिन मालवा के प्रसिद्ध सरदार मल्हार राव होल्कर पुणे जाते समय चौंडी गांव में रुके। वहां उन्होंने छोटी अहिल्या को मंदिर के बाहर गरीबों को भोजन कराते देखा। बालिका के संस्कार और व्यवहार से प्रभावित होकर उन्होंने अपने पुत्र खांडेराव होल्कर के लिए उनका विवाह प्रस्ताव रखा। यही बालिका आगे चलकर भारतीय इतिहास की महानतम महिला शासकों में गिनी गई।
विवाह के पश्चात अहिल्याबाई इंदौर के होल्कर राजघराने में आईं। उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ने उनमें असाधारण क्षमता देखी और उन्हें प्रशासन, न्याय व्यवस्था तथा सैन्य संचालन का प्रशिक्षण दिया। पति खांडेराव की मृत्यु कुम्हेर युद्ध में हो गई। उस समय समाज में सती प्रथा प्रचलित थी और अहिल्याबाई भी सती होना चाहती थीं, किंतु मल्हार राव ने उन्हें समझाया कि उनका जीवन केवल परिवार के लिए नहीं, बल्कि प्रजा और राष्ट्र के लिए आवश्यक है। यही निर्णय आगे चलकर लाखों लोगों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुआ।
1767 में मालवा की शासन व्यवस्था संभालने के बाद अहिल्याबाई ने लगभग तीस वर्षों तक आदर्श शासन दिया। उनके शासनकाल में मालवा समृद्ध, सुरक्षित और सांस्कृतिक रूप से संपन्न बना। वे न्यायप्रिय, करुणामयी और दूरदर्शी शासिका थीं। उन्होंने राज्य की आर्थिक व्यवस्था मजबूत की, किसानों को संरक्षण दिया, व्यापार को प्रोत्साहन दिया तथा जनता को भयमुक्त वातावरण प्रदान किया। किंतु उनके व्यक्तित्व का सबसे महान पक्ष भारतीय मंदिरों और तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण में दिखाई देता है।
मुगल शासन के अंतिम काल, विशेषकर औरंगजेब के शासन में भारत के अनेक प्राचीन मंदिरों को तोड़ा गया था। अनेक तीर्थस्थल उजड़ गए थे और सनातन संस्कृति पर गंभीर आघात पहुंचा था। उस समय भारत राजनीतिक अस्थिरता और सांस्कृतिक संकट के दौर से गुजर रहा था। ऐसे कठिन समय में अहिल्याबाई होल्कर ने केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापिका के रूप में कार्य किया। उन्होंने अपने निजी धन से देशभर में मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया तथा तीर्थों को पुनर्जीवित किया।
काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण उनका सबसे प्रसिद्ध कार्य माना जाता है। औरंगजेब द्वारा नष्ट किए गए इस मंदिर के स्थान पर मस्जिद बना दी गई थी। हिंदू समाज के लिए यह अत्यंत पीड़ादायक विषय था। अहिल्याबाई ने 1777 में काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। आज जो काशी विश्वनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, उसके पुनरुत्थान का श्रेय अहिल्याबाई को जाता है। उन्होंने केवल मंदिर ही नहीं बनवाया, बल्कि वहां यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, जल व्यवस्था और भोजनालय भी स्थापित करवाए।
इसी प्रकार गुजरात के सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। सोमनाथ मंदिर भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक था, जिसे अनेक बार विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा और तोड़ा। अहिल्याबाई ने वहां पुनः मंदिर निर्माण करवाकर यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति को मिटाया नहीं जा सकता।
उन्होंने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक अनेक मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार करवाया। बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, देवप्रयाग, प्रयागराज, गया, अयोध्या, मथुरा, द्वारका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, उज्जैन, नासिक, कांचीपुरम और उडुपी जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों पर उनके द्वारा बनवाए गए मंदिर, घाट, कुएं, बावड़ियां और धर्मशालाएं आज भी उनकी धर्मनिष्ठा और लोकसेवा की साक्षी हैं।
उन्होंने केवल धार्मिक भवन ही नहीं बनवाए, बल्कि तीर्थयात्रियों की सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा। उस समय लंबी यात्राएं अत्यंत कठिन होती थीं। रास्तों में भोजन, पानी और ठहरने की समस्या रहती थी। अहिल्याबाई ने देश के विभिन्न तीर्थों में धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र और यात्री निवास बनवाए। देवप्रयाग में गरीबों के लिए भोजनशाला स्थापित की गई। उनके निर्माण कार्यों में केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा और लोककल्याण की भावना भी निहित थी।
अहिल्याबाई की विशेषता यह थी कि वे धार्मिक कार्यों को केवल कर्मकांड नहीं मानती थीं। उनके लिए मंदिर भारतीय समाज की सांस्कृतिक आत्मा थे। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि शिक्षा, समाज संगठन, कला, सेवा और आध्यात्मिक चेतना के केंद्र थे। इसलिए उन्होंने मंदिरों के माध्यम से समाज को पुनः संगठित करने का प्रयास किया। उस कालखंड में जब भारत राजनीतिक रूप से विभाजित और अस्थिर था, तब अहिल्याबाई ने तीर्थों और मंदिरों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ किया।
उनकी धार्मिकता कट्टरता से दूर थी। वे सभी प्रजा के प्रति समान व्यवहार रखती थीं। उनके शासन में न्याय व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ थी। कहा जाता है कि वे प्रतिदिन खुला दरबार लगाती थीं और स्वयं जनता की समस्याएं सुनती थीं। प्रजा उन्हें माता के समान मानती थी। उनके प्रशासन में भ्रष्टाचार और अत्याचार के लिए कोई स्थान नहीं था।
अहिल्याबाई एक कुशल सेनानायिका भी थीं। उन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए सुदृढ़ सेना तैयार की। जब भी राज्य पर संकट आया, उन्होंने साहस और बुद्धिमत्ता से उसका सामना किया। किंतु उनका सबसे बड़ा शस्त्र जनता का विश्वास था। उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि जनता उन्हें देवी के समान पूजती थी।
महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से भी अहिल्याबाई का जीवन अत्यंत प्रेरणादायक है। उस युग में जब महिलाओं को केवल परिवार तक सीमित माना जाता था, तब उन्होंने एक विशाल राज्य का सफल संचालन किया। उन्होंने सिद्ध किया कि नारी केवल गृह संचालन ही नहीं, बल्कि राज्य संचालन और राष्ट्र निर्माण में भी अग्रणी भूमिका निभा सकती है। वे शक्ति, संवेदना, नीति और धर्म का अद्भुत संगम थीं।
पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने अनेक कुएं, बावड़ियां, तालाब और घाट बनवाए। जल संरक्षण के महत्व को समझते हुए उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में जल संरचनाओं का निर्माण करवाया, जिससे जनता को स्थायी लाभ मिला। आज भी भारत के अनेक हिस्सों में उनके द्वारा निर्मित घाट और बावड़ियां उपयोग में हैं।
उनका जीवन सादगी और सेवा का उदाहरण था। राजमहल में रहते हुए भी उन्होंने कभी विलासिता को महत्व नहीं दिया। वे स्वयं अत्यंत साधारण जीवन जीती थीं और राज्य के धन को जनता के कल्याण में लगाती थीं। यही कारण है कि इतिहास में उनका नाम केवल एक रानी के रूप में नहीं, बल्कि लोकमाता के रूप में सम्मानित है।
आज जब हम अहिल्याबाई होल्कर की जयंती मना रहे हैं, तब उनके जीवन से अनेक प्रेरणाएं प्राप्त होती हैं। उन्होंने दिखाया कि सच्चा शासन वही है जो धर्म, न्याय और लोककल्याण पर आधारित हो। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि भारतीय संस्कृति की शक्ति उसके मंदिरों, तीर्थों, परंपराओं और समाज की आध्यात्मिक चेतना में निहित है।
भारतीय मंदिरों के पुनर्निर्माण में उनका योगदान केवल स्थापत्य कला का कार्य नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का महान अभियान था। उन्होंने विदेशी आक्रमणों से आहत भारत की आत्मा को पुनः जागृत किया। उनके निर्माण कार्यों ने हिंदू समाज में आत्मविश्वास और गौरव की भावना का संचार किया। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय इतिहास में श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।
अहिल्याबाई होल्कर वास्तव में भारत की नारी शक्ति की अद्भुत प्रतीक थीं। वे शौर्य, करुणा, धर्मनिष्ठा, सेवा और राष्ट्रभावना का अनुपम संगम थीं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि साधारण परिस्थितियों में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अपने कर्म, त्याग और सेवा से इतिहास में अमर हो सकता है।
उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोककल्याण और राष्ट्रधर्म के प्रति पुनः संकल्प लेने का अवसर है। भारतीय मंदिरों और तीर्थों के पुनर्निर्माण में उनका योगदान सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। आने वाली पीढ़ियां उन्हें भारतीय संस्कृति की महान संरक्षिका और आदर्श शासिका के रूप में सदैव स्मरण करती रहेंगी।




