
(डॉ.इंदिरा सरीन, नारायणा हॉस्पिटल जयपुर)
घर को संभालने वाली, सबकी जरूरतों को समझने वाली महिला अक्सर अपने ही शरीर के संकेतों को अनदेखा कर देती है। पेल्विक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात नहीं होती। पेशाब का रिसाव हो, बार बार संक्रमण हो या शरीर के नीचे की ओर भारीपन महसूस हो, इसे उम्र या प्रसव का सामान्य परिणाम मान लिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि यह समस्याएँ आम हैं, इलाज योग्य हैं और इनके पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं।
आज यूरोगायनेकोलॉजी एक स्थापित विशेषज्ञता है, जो महिलाओं के मूत्राशय, मूत्रमार्ग और पेल्विक अंगों से जुड़ी समस्याओं का समर्पित इलाज करती है। पहले इन समस्याओं को अलग पहचान नहीं मिलती थी, अब इनके लिए विशेष उपचार उपलब्ध हैं।
हर तीसरी महिला प्रभावित, मगर चुप
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन के अनुसार दुनियाभर में करोड़ों महिलाएँ यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस यानी पेशाब के रिसाव से प्रभावित हैं। विभिन्न अध्ययनों में यह पाया जाता है कि लगभग 30 से 40 प्रतिशत महिलाएँ जीवन में किसी न किसी समय इस समस्या का अनुभव करती हैं।
इंटरनेशनल यूरोगाइनेकोलॉजिकल एसोसिएशन के प्रकाशित शोध बताते हैं कि 40 वर्ष से अधिक आयु की लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं में पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स देखा जाता है, जिसमें गर्भाशय या मूत्राशय नीचे की ओर खिसकता है।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि भारत में बड़ी संख्या में महिलाएँ लक्षण होने के बावजूद इलाज नहीं करवातीं। हर घर में कम से कम एक महिला ऐसी मिलती है जो किसी न किसी यूरोगायनेकोलॉजिकल समस्या से जूझती है, लेकिन संकोच के कारण बात नहीं करती।
छींकने, खाँसने या हँसने पर पेशाब निकल जाना सामान्य नहीं है। यह पेल्विक फ्लोर मांसपेशियों की कमजोरी का संकेत देता है।
बार बार होने वाला यूटीआई और उसका असर
लगभग 50 से 60 प्रतिशत महिलाओं को जीवन में कम से कम एक बार मूत्र संक्रमण होता है। 20 से 30 प्रतिशत मामलों में यह संक्रमण बार बार लौटता है। बार बार संक्रमण होने पर मूत्रमार्ग में सूजन और संकुचन हो सकता है। उम्र बढ़ने, रजोनिवृत्ति, कैथेटर के उपयोग या कैंसर के बाद दी गई रेडियोथेरेपी से यह समस्या और बढ़ती है।
ऐसे मामलों में यूरेथ्रोप्लास्टी सर्जरी की जाती है, जिसमें सिकुड़े हुए मूत्रमार्ग को ग्राफ्ट की मदद से चौड़ा किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय आंकड़े बताते हैं कि यह प्रक्रिया 80 से 90 प्रतिशत मामलों में सफल रहती है और मरीज को दीर्घकालिक राहत मिलती है।
आदतें जो नुकसान करती हैं
यात्रा के दौरान या सार्वजनिक शौचालय से बचने के लिए 3 से 4 घंटे तक पेशाब रोककर रखना मूत्राशय की अंदरूनी परत और गुर्दों के लिए हानिकारक होता है। इससे बैक्टीरिया को बढ़ने का अवसर मिलता है और संक्रमण का खतरा बढ़ता है।
सार्वजनिक शौचालय में भारतीय शैली को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है क्योंकि इससे सीधे संपर्क की संभावना कम रहती है। उपयोग से पहले पानी से साफ करना सुरक्षित होता है। केवल कीटाणुनाशक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि बहुत कम संख्या में मौजूद जीवाणु भी तेजी से बढ़ सकते हैं।
जननांगों को बार बार साबुन या एंटीसेप्टिक से धोना आवश्यक नहीं है। इससे प्राकृतिक माइक्रोबायोम असंतुलित होता है। सामान्य पानी से सफाई पर्याप्त रहती है।
खानपान और सप्लीमेंट की भूमिका
पर्याप्त पानी पीना सबसे सरल उपाय है। कैफीन, अत्यधिक मसालेदार और तीखा भोजन मूत्राशय को उत्तेजित करते हैं। नियंत्रित सेवन से लक्षणों में सुधार होता है।
प्रोबायोटिक्स योनि और आंत के अच्छे बैक्टीरिया को संतुलित रखते हैं। विटामिन बी12, सी, डी3 और मैग्नीशियम मांसपेशियों और प्रतिरक्षा प्रणाली को सहारा देते हैं। शोध यह दिखाता है कि विटामिन डी की कमी पेल्विक फ्लोर कमजोरी से जुड़ी रहती है।
पेल्विक फ्लोर व्यायाम का महत्व
रैंडमाइज्ड क्लिनिकल ट्रायल्स यह दर्शाते हैं कि नियमित केगल व्यायाम से हल्के से मध्यम स्तर के पेशाब रिसाव में 50 से 70 प्रतिशत तक सुधार होता है। यह व्यायाम पेल्विक अंगों को सहारा देने वाली मांसपेशियों को मजबूत करता है और कई मामलों में सर्जरी की आवश्यकता को टाल सकता है।
रोबोटिक सर्जरी और आधुनिक समाधान
जटिल पेल्विक सर्जरी में अब रोबोटिक तकनीक का उपयोग बढ़ता है। इससे सटीकता बढ़ती है, रक्तस्राव कम होता है और रिकवरी अवधि छोटी रहती है। जिन समस्याओं को पहले उम्र का परिणाम मान लिया जाता था, अब उनका सुरक्षित और प्रभावी इलाज उपलब्ध है।



