
मुंबई दिव्यराष्ट्र* ,नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई ने 12 वर्षीय प्रदीप कुमार (बदला हुआ नाम) का सफलतापूर्वक इलाज किया है, जो एक दुर्लभ और अत्यंत आक्रामक प्रगतिशील ल्यूकेमिया से जूझ रहा था। यह उपचार एक उन्नत और दुर्लभ रूप से किया जाने वाला टी-डिप्लीटेड हैप्लोआइडेंटिकल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट था, जिसमें बच्चे की मां ने अर्ध-मिलान (हाफ-मैच्ड) डोनर के रूप में आगे आकर अपने बेटे को नया जीवनदान दिया।
करीब तीन वर्ष पहले बच्चे को सीएमएल (क्रॉनिक मायलॉइड ल्यूकेमिया) का पता चला था और वह टार्गेटेड थेरेपी पर था। हालांकि, समय के साथ उसकी स्थिति बिगड़ती गई और बीमारी एएमएल (एक्यूट मायलॉइड ल्यूकेमिया) के ब्लास्ट क्राइसिस चरण में पहुंच गई। यह ल्यूकेमिया का एक जानलेवा रूप है, जिसमें तुरंत इलाज और हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। कीमोथेरेपी के बाद और मिनिमल रेसिडुअल डिज़ीज़ नेगेटिविटी प्राप्त होने पर, बच्चे को बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) के लिए नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई रेफर किया गया।
मैच्ड सिब्लिंग डोनर उपलब्ध न होने के कारण, मेडिकल टीम ने उसकी मां को संभावित डोनर के रूप में मूल्यांकन किया। विशेष केआईआर मिसमैच विश्लेषण सहित विस्तृत अनुकूलता जांच के बाद, टीम ने हैप्लोआइडेंटिकल (अर्ध-मिलान) ट्रांसप्लांट करने का निर्णय लिया और मां को डोनर के रूप में चुना गया।
बच्चे का टी-डिप्लीटेड हैप्लोआइडेंटिकल हीमेटोपोइएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (एचएससीटी) किया गया, जो एक तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल और संसाधन-सघन प्रक्रिया है, जिसके लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता और उन्नत बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है। बच्चे ने ट्रांसप्लांट को अच्छी तरह सहन किया और वह 42 दिनों तक बीएमटी यूनिट में भर्ती रहा। उल्लेखनीय रूप से, उसे कोई बड़ी जटिलता नहीं हुई, ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक एंग्राफ्ट हुआ और 100 प्रतिशत डोनर काइमेरिज़्म भी प्राप्त हुआ।
आज, ट्रांसप्लांट के 18 महीने बाद, प्रदीप पूरी तरह रोगमुक्त (कम्प्लीट रेमिशन) है। उसे न तो ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट डिज़ीज़ हुआ है और न ही किसी सुप्त वायरस का पुनः सक्रिय होना देखा गया है। वह पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी रहा है। फिलहाल वह टायरोसीन किनेज़ इन्हिबिटर दवा पर है, जिसे उसे अगले छह महीनों तक लेना होगा, जिसके बाद वह सभी दवाओं से मुक्त हो जाएगा।
इस मामले पर बात करते हुए, डॉ. प्रीति मेहता, सीनियर कंसल्टेंट – पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी, हीमेटोलॉजी एवं बीएमटी, नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई ने कहा, “यह ल्यूकेमिया के ब्लास्ट क्राइसिस चरण के कारण एक अत्यंत हाई-रिस्क केस था। टी-डिप्लीटेड हैप्लोआइडेंटिकल ट्रांसप्लांट के लिए अत्यंत सावधानीपूर्वक चयन और उच्च स्तरीय विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। बच्चे की उत्कृष्ट रिकवरी और स्थायी रेमिशन यह दर्शाती है कि उन्नत ट्रांसप्लांट तकनीकें उन बच्चों के लिए भी नई उम्मीद पैदा कर सकती हैं, जिनके पास अन्य विकल्प सीमित होते हैं।”




