23 साल की उम्र में जो इंकलाब जगा गए, आज भी जिंदा है वो आवाज

आज पूरा देश उस लाल को याद कर रहा है जिसने अपनी जवानी देश के नाम कर दी। आज शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती है। हर साल 28 सितंबर को उनकी जयंती मनाई जाती है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर के घर जन्मे भगत सिंह के खून में ही क्रांति थी।
भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, एक विचार थे। महज 12 साल की उम्र में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तो वे स्कूल से 12 मील पैदल चलकर उस खून से सनी मिट्टी को मुट्ठी में भर लाए थे। यहीं से उनके अंदर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आग पैदा हुई।
नौजवान भारत सभा से एचएसआरए तक का सफर
भगत सिंह ने मार्च 1926 में नौजवान भारत सभा की स्थापना की और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) से जुड़ गए। वे मानते थे कि आजादी सिर्फ गोरे अंग्रेजों को भगाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना है जहां किसी का शोषण न हो।
1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को मार गिराया। इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधानसभा (सेंट्रल असेंबली) में बम फेंका, पर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं, बल्कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए खुद को गिरफ्तार करवा दिया। उनका मकसद बहरे अंग्रेजों को जगाना था।
जेल में 700 दिन और विचारों की क्रांति
भगत सिंह जेल में भी आजाद थे। करीब 700 दिन से ज्यादा जेल में रहे और यह समय उन्होंने पढ़ने-लिखने में बिताया। लेनिन, मार्क्स, बर्ट्रेंड रसेल को पढ़ा। वहीं पर उन्होंने अपना ऐतिहासिक लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लिखा जो 27 सितंबर 1931 को ‘द पीपल’ अखबार में प्रकाशित हुआ।
उन्होंने कहा था- “क्रांति में लहूलुहान संघर्ष जरूरी नहीं, न ही इसमें व्यक्तिगत बदले की जगह है। यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में बदलाव।” उनका इंकलाब सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक समानतावादी, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी समाज का सपना था।
23 मार्च 1931: वो शहादत जो अमर हो गई
अंग्रेजों ने 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें मौत की सजा सुनाई और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। उस वक्त भगत सिंह की उम्र सिर्फ 23 साल थी। हंसते-हंसते फंदे को चूमना और देश के लिए प्राण देना, यही उन्हें ‘शहीद-ए-आजम’ बनाता है।
उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। आज भी उनका नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ हर आंदोलन की आत्मा है।
आज के युवाओं के लिए प्रेरणा
2026 की जयंती और भी खास है क्योंकि यह उनकी 119वीं जयंती है। आज जब युवा सोशल मीडिया पर भटक रहा है, भगत सिंह का जीवन उन्हें सिखाता है कि असली हीरोइज्म क्या है- पढ़ना, सोचना, सवाल पूछना और देश के लिए खड़ा होना।
भारत सरकार ने उनके सम्मान में 5 रुपये का सिक्का भी जारी किया था। उन पर कई फिल्में बनीं- ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ और ‘शहीद’ आज भी युवाओं में जोश भर देती हैं।
भगत सिंह ने कहा था- “मेरी महबूबा तो आजादी है।” और उन्होंने अपनी महबूबा के लिए अपनी जान दे दी। आज उनकी जयंती पर हमें संकल्प लेना होगा कि हम उनके सपनों के भारत- जहां समानता, न्याय और भाईचारा हो, उसे बनाएंगे।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह अमर रहें!




