
विश्वमांगल्य सभा द्वारा भाग्यनगर में आयोजित युगानुकूल मातृत्व सम्मेलन में गूंजा सनातन संस्कृति का उद्घोष
स्वागताध्यक्ष भगवती बल्दवा ने दिया तकनीकी दक्षता और भारतीय संस्कारों के अद्भुत समन्वय का मंत्र
भाग्यनगर (हैदराबाद) दिव्यराष्ट्र। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि मातृत्व संपूर्ण सृष्टि, पोषण और मानव अस्तित्व की निरंतरता का मूल आधार है। मातृत्व के बिना यह संपूर्ण व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में आकर हमने अपनी कालजयी परंपराओं को भुला दिया और पश्चिमी विकृतियों को आधुनिकता मान बैठे, जबकि हमारी संस्कृति में पुरुष और स्त्री को समान अधिकार के साथ-साथ अत्यंत पवित्र एवं पूजनीय स्थान दिया गया है। विश्वमांगल्य सभा द्वारा भाग्यनगर (हैदराबाद) के कोमरम भीम आदिवासी भवन एवं सेवालाल बंजारा भवन में आयोजित दो दिवसीय दक्षिण भारत प्रबोधन बैठक तथा युगानुकूल मातृत्व राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए पूजनीय सरसंघचालक जी ने यह विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की स्वागताध्यक्ष एवं प्रसिद्ध समाज सेविका भगवती बल्दवा ने सरसंघचालक मोहन भागवत का आभार व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय सम्मेलन की आधारशिला रखी।
भगवती बल्दवा ने कहा कि आज के डिजिटल और एआई युग में जहाँ महिलाएँ कॉरपोरेट, चिकित्सा, न्यायपालिका और उद्यमिता में नित नए कीर्तिमान रच रही हैं, वहीं बच्चों में श्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण करना और ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ बनाना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संतान के सर्वांगीण विकास और संस्कारों की ज़िम्मेदारी केवल माँ की ही नहीं, बल्कि पिता, परिवार और पूरे समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने सनातन संस्कृति के प्रसिद्ध श्लोक का स्मरण करते हुए कहा कि *नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः,। नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रपा**॥’ यानी माँ से बढ़कर कोई छाया नहीं, माँ से बढ़कर कोई जीवनदायिनी नहीं, माँ से बढ़कर कोई रक्षक नहीं और माँ से बढ़कर कोई शीतल आश्रय नहीं है। भगवती बल्दवा ने बल देकर कहा कि बच्चों के लालन-पालन और चरित्र निर्माण की जिम्मेदारी केवल माँ की नहीं, बल्कि पिता, परिवार और पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने अपनी ओजस्वी काव्य पंक्तियों के माध्यम से माताओं से आह्वान किया कि “बहती नदिया की धार बनो, गुल की रक्षा में खार बनो। वीरांगना सा श्रृंगार बनो, मेहमानों का सत्कार बनो। माँ की ममता और प्यार बनो, संतानों की संस्कार बनो। निज संस्कृति का आधार बनो…”उन्होंने आगे कहा कि आज की विषम परिस्थितियों में बहनों को दुष्टों का संहार करने के लिए रानी की तलवार भी बनना होगा। हमारी डिग्री जीवन चलाने का साधन हो सकती है, लेकिन हमारे जीवन मूल्य ही हमारे जीवन को संवारते हैं। हमारे विचार आधुनिक हों, पर चरित्र पूर्णतः भारतीय होना चाहिए।
कार्यक्रम में विश्वमांगल्य सभा के राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों एवं मार्गदर्शकों के सानिध्य में एक मीटिंग का भी आयोजन हुआ। जिसमें विश्वमांगल्य सभा के संस्थापक जितेंद्रनाथ महाराज ने संगठन के मूल सिद्धांतों एवं मातृत्व जागरण के राष्ट्रव्यापी संकल्प पर प्रकाश डाला। तो राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. वृषाली जोशी ने युगानुकूल मातृत्व की कार्य योजना और समाज निर्माण में महिलाओं की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया। अखिल भारतीय मार्गदर्शक प्रशांत होलकर ने भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की सुदृढ़ता पर विचार रखे। राष्ट्रीय अध्यक्ष नलिनी हावड़े ने महिला प्रबुद्ध वर्ग को राष्ट्र निर्माण के कार्यों में आगे आने का आह्वान किया। तो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सूरज डामोर ने समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और सांस्कृतिक चेतना जगाने का संदेश दिया। संयुक्त सचिव श्रुति बोड्डुपल्ली और राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री गायत्री लोमटे ने धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम के उद्देश्यों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का संकल्प दोहराया। इस मौके पर प्रसिद्ध उद्योगपति व दानदाता महेश बल्दवा, डॉ. खुशबू बल्दवा सहित न्यायपालिका, चिकित्सा, कॉर्पोरेट और उद्यमिता क्षेत्र की दक्षिण भारत की कई हस्तियां उपस्थित रहीं। दक्षिण भारत के सात राज्यों से आए कार्यकर्ताओं के अप्रतिम उत्साह ने इस आयोजन को ऐतिहासिक सफलता प्रदान की।




