
(दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई)
भारत विविधताओं का देश है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र की अपनी भाषा, बोली, वेशभूषा, संस्कृति और लोक परंपराएँ हैं। इन्हीं परंपराओं की आत्मा है लोक संगीत। लोक संगीत किसी विशेष क्षेत्र, समुदाय या संस्कृति के सामान्य जनजीवन से उपजा वह संगीत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ता आया है। इसके रचयिता प्रायः अज्ञात होते हैं, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक चेतना और अनुभवों की अभिव्यक्ति है। भारतीय जनमानस में लोक संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास, आस्था और सामाजिक मूल्यों का जीवंत संवाहक है।
लोक संगीत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मौखिक परंपरा है। यह किसी पुस्तक या लिखित ग्रंथ में सीमित नहीं रहता, बल्कि सुनकर, गाकर और जीवन में जीकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता है। इसके लिए कभी विद्यालय या विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं रही। गाँवों के चौपाल, खेत-खलिहान, विवाह समारोह, धार्मिक उत्सव और पारिवारिक संस्कार ही इसके सबसे बड़े विद्यालय रहे हैं। यही कारण है कि लोक संगीत सदियों से समाज की स्मृति में सुरक्षित रहा है।
भारतीय समाज में लोक संगीत जीवन के प्रत्येक अवसर से जुड़ा हुआ है। जन्म के समय सोहर, विवाह में बन्ना-बन्नी, फसल कटाई पर श्रमगीत, वर्षा ऋतु के कजरी और सावन गीत, भक्ति के अवसरों पर भजन तथा विभिन्न पर्वों पर गाए जाने वाले लोकगीत समाज की भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। ये गीत केवल अवसर विशेष तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों के सुख-दुःख, आशा-निराशा, प्रेम, विरह, परिश्रम, प्रकृति और सामाजिक संबंधों का भी सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं।
लोक संगीत की एक अन्य विशेषता इसके सरल एवं पारंपरिक वाद्ययंत्र हैं। ढोलक, सारंगी, बांसुरी, मंजीरा, एकतारा, रावणहट्टा, खड़ताल, नगाड़ा और चंग जैसे वाद्य न केवल संगीत को मधुर बनाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति की पहचान भी हैं। इन वाद्यों की ध्वनि सुनते ही उस क्षेत्र की सांस्कृतिक छवि मन में उभर आती है।
भारतीय जनमानस में लोक संगीत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। मंदिरों, मेलों, लोकदेवताओं की आराधना, संतों की वाणी तथा भक्ति परंपरा में लोक संगीत ने सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कबीर, मीरा, गुरु नानक, तुलसीदास और अनेक संतों की वाणी लोकधुनों के माध्यम से जन-जन तक पहुँची। इस प्रकार लोक संगीत ने केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि नैतिकता, भक्ति और सामाजिक समरसता का भी संदेश दिया।
राजस्थान, पंजाब, गुजरात, बंगाल, महाराष्ट्र, असम, उत्तराखंड और दक्षिण भारत के प्रत्येक प्रदेश का लोक संगीत उसकी सांस्कृतिक पहचान है। राजस्थान का मांड, पधारो म्हारे देश, पनिहारी गीत और वीर रस से ओतप्रोत लोकगाथाएँ आज भी देश-विदेश में भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ा रही हैं। इन लोकधुनों में भारत की मिट्टी की सुगंध, लोकजीवन की सरलता और सांस्कृतिक आत्मा का दर्शन होता है।
आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस युग में लोक संगीत अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। पाश्चात्य संगीत, डिजिटल मनोरंजन और बदलती जीवनशैली के कारण नई पीढ़ी का जुड़ाव पारंपरिक लोकधुनों से कुछ कम हुआ है। फिर भी यह संतोष का विषय है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने लोक कलाकारों और लोक संगीत के संरक्षण के लिए अनेक प्रयास किए हैं। विभिन्न राज्यों में लोक कला अकादमियों की स्थापना, सांस्कृतिक महोत्सवों का आयोजन तथा अनेक लोक कलाकारों को पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित कर इस विरासत को नई पहचान दी गई है। इससे लोक कलाकारों का उत्साह बढ़ा है और युवा पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर आकर्षित हो रही है।
भारतीय जनमानस का यह विश्वास रहा है कि जिस समाज की लोक परंपराएँ जीवित रहती हैं, उसकी सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित रहती है। लोक संगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। यह हमें अपनी भाषा, संस्कृति, इतिहास और पूर्वजों से जोड़ता है तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करता है।
अतः लोक संगीत भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। इसका संरक्षण केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। यदि हम अपनी लोकधुनों, लोक कलाकारों और लोक परंपराओं को सम्मान देंगे, तो हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेगी। वास्तव में लोक संगीत भारत की आत्मा की मधुर अभिव्यक्ति है, जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और जनजीवन को निरंतर जीवंत बनाए हुए है।


