अमर दानव
बूझो तो जाने। वह क्या है जो जल में, थल में, हम सब में एक ही समय में, सब जगह विद्यमान है?
दैवीय शक्ति ? आज इसका उत्तर है प्लास्टिक। प्लास्टिक के नेनो कण विभिन्न समुद्रों में अधिकतम गहराई तक, नदियों में, आकाश में 9500 फ़ीट तक, भूमि में, यहाँ तक कि हमारे नमक में, हमारे शरीर में – माँ के दूध, शुक्राणु, किडनी, फेफड़ों, दिमाग में…… हर जगह पाए गए हैं। विभिन्न आकार और प्रकार में प्लास्टिक अब सब तरफ इस प्रकार हे कि इसकी ओर ध्यान ही नहीं जाता। जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ ।
अपने देश की नदियां में न केवल पानी की सतह पर बड़े प्लास्टिक के टुकड़े तैरते हुए दिखते हैं परन्तु पानी के अंदर अदृश्य पांच एमपीएम यानी चावल के एक दाने से भी छोटे टुकड़े पाए जाते हैं जो जीव जंतुओं के शरीर के अंदर भी चले जाते है । एक दूध का फटा पैकेट नदी में फेंका जाता है तो वह मछलियों, कछुओं, आदि के जीवन के लिए भी भयावह होता है। हमारी संस्कृति में गौ माता पूजनीय है फिर यह तो विडंबना ही है कि अनेक गायों के पेट में 15 किलो तक पॉलिथीन पाई गई। अनेक लोग खाने का सामान प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर फेंक देते हैं जो अंततः जानवरों के पेट में पहुँच जाती है। नालियों में प्लास्टिक की पन्नियों के कारण वॉटरलॉगिंग की समस्या अब सामान्य जीवन का हिस्सा है।
जीवन की अनेक पहलुओं में आवश्यकतानुसार प्लास्टिक अनेक रूप से ज़रूरी है । समस्या यह है कि प्लास्टिक के कारण ‘डिस्पोजेबल कंज्यूमर कल्चर’ सृजित हुआ। सिंगल यूज़ प्लास्टिक के कारण ‘थ्रो अवे पीढ़ी’ का जन्म हुआ। इससे सबका नुकसान हो रहा। इसके उदाहरण हमें अपने समीप ही दिख जाते हैं- शादियों और भंडारों में प्लास्टिक के ग्लास, प्लेट,नारियल पानी में प्लास्टिक की स्ट्रॉ और बृहद रूप से उपयोग की जा रही मिनरल वाटर की प्लास्टिक की बोतलें । कुछ वर्ष पूर्व यूएनईपी द्वारा बताया गया था कि 1 मिनट में विश्व में 10 लाख प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग होता है यानी 1 दिन में 144 करोड़! है ना भयावह कि हम प्लास्टिक के कचरे की पृथ्वी विरासत में छोड़ रहे हैं ? भारत में प्रत्येक दिन करीब 26,000 मेट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट व देश के 60 मुख्य शहरों में प्रत्येक दिन 4000 से अधिक मैट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट का सृजन होता है। । देश में करीब 94% प्लास्टिक वेस्ट इस प्रकार की है जिसकी आसानी से रीसाइक्लिंग संभव नहीं है। अंततः ज़्यादातर प्लास्टिक वेस्ट खुले स्थलों और लैंडफिल पर डम्प कर दी जाती है। सीएसई के अनुसार देश में प्लास्टिक की 12% रीसाइक्लिंग हो रही है और 20% प्लास्टिक का कचरा जलाया जा रहा है । जलाने से रसायनों की एक खतरनाक कॉकटेल पैदा होती है जिससे कि मनुष्यों में अनेक जानलेवा बीमारियाँ बढ़ रही है, वातावरण में ग्रीनहाउस गैस में इजाफा हो रहा है ।
प्लास्टिक के बैग को डिकंपोज होने में 1000 वर्ष लगते हैं। वैसे प्लास्टिक अमर है और कभी नष्ट नहीं होता । वह छोटे छोटे माइक्रोप्लास्टिक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्लास्टिक के दानव का वध किस प्रकार संभव है? आवश्यकता इस बात की है कि सब समाधान का हिस्सा बनें । देश में प्लास्टिक के 30,000 से अधिक उत्पादक है परंतु उनके लिए रीसाइक्लिंग महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। उत्पादक पर भी इसके विकल्पों का उपयोग करने व उत्पादित प्लास्टिक को एकत्र कर रीसाइक्लिंग सुनिश्चित करने का दायित्व होना चाहिए। हमारा ध्यान केवल वेस्ट मैनेजमेंट पर है जो आवश्यक है, लेकिन साथ ही साथ प्लास्टिक के उपयोग में कमी लाने की भी ज़रुरत है जिससे कम वेस्ट हो और कम रिसाइकिलिंग हो।
लेकिन यदि हम उन का उपयोग ही ना करें तो उनके उत्पादन और उसके बाद रीसाइक्लिंग में ऊर्जा का उपयोग होता है उससे बचा जा सकता हैं । यद्यपि कि अनेक प्रकार के सिंगल यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंधित है परन्तु अनेक स्थानों पर उसका उपयोग हो रहा है और सामान्य नागरिक उसकी ज़िम्मेदारी प्रशासन के ऊपर डालकर अपने दायित्व से बचते हैं।
क्या हम विभिन्न आयोजनों में प्रतिबंधित प्लास्टिक की कटलरी का उपयोग बंद कर सकते हैं ?
क्या यह संभव है कि हम हवन या पूजा की सामग्री प्लास्टिक की थैली में बांधकर नदियों में ना फेंके?
क्या हम अपने कूड़े को गीले, कागज़, प्लास्टिक, आदि प्राविधानित श्रेणियों में अलग करके कूड़ा संग्रहीत करने वाले व्यक्ति को दे सकते हैं?
जब बच्चे पानी की बोतल स्कूल ले जा सकते हैं तो बड़े भी ऐसा कर सकते हैं। क्या हम सब्जियाँ, फल व अन्य सामान अपने कपड़ों के थैलों में ला सकते हैं और प्लास्टिक के साथ साथ अन्य प्रकार के बैगों का भी उपयोग कम कर, निस्तारण हेतु कचरे की मात्रा में कमी ला सकते हैं ?
जब हम ‘जीवन साथी’ मोबाइल को कहीं भी ले जाना नहीं भूलते तो क्या हम अपनी पानी की बोतल और कपड़े का थैला भी साथ ले जाना याद रख सकते हैं?
क्या हम अपने और अपने परिवार के लिए स्वस्थ जीवन चाहते हैं? यदि हाँ, तो क्या हम स्वार्थवश ही आदतों में बदलाव कर सकते है I आदतों में बदलाव कठिन हो सकता है परन्तु असंभव नहीं।बहुत से लोगों का कहना है बच्चों में बदलाव लाया जाए। जब तक बड़े अपनी आदतें नहीं बदलेंगे तो बच्चो में बदलाव संभव नहीं है? हम सबको ही समाधान का हिस्सा बनना पड़ेगा। कुछ लोग पहला कदम इसलिए नहीं उठाते क्योंकि उन्हें लगता है कि केवल उनके कुछ करने से स्थिति नहीं बदलेगी, लेकिन अंधकार को कोसने से बेहतर एक दिया जलाना है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति का प्रभाव पड़ता ,है चाहे हम कुछ करें या ना करें । गाँधीजी ने कहा है की दुनिया को धीमे से हिलाइए । हम शुरुआत करें, अपने ही दायरे से बिल्ली के गले में घंटी बांधकर।



