दिव्यराष्ट्र के लिए सुरेन्द्र चतुर्वेदी, जयपुर
बंगाल ने भाजपा को अपना लिया। अपनाया ही नहीं बल्कि अपने सिर माथे बिठाया है। आजादी के समय विभाजन और उसके बाद बांग्लादेश की प्रसव वेदना को बंगाल ने झेला। भाजपा को जो बंगाल मिला है वो ना केवल घायल है अपितु आत्मा तक क्षत विक्षत है । भाजपा को सबसे पहले बंगाल की आत्मा पर मरहम लगाना होगा, यह सनातन के लेप से ही होगा!
असंख्य साधकों की तपोस्थली बंगाल की सुषुप्त आत्मा को जागृत करना आसान नहीं होगा। सैकड़ों सालों तक बंगाल को तिल तिल कर मारा गया है। 1204 में लक्ष्मण सेन की पराजय के बाद बख्तियार खिलजी के मुगल शासन फिर अंग्रेजी हुकूमत और आजादी के बाद कांग्रेस, वामपंथ और ममता के कुशासन से मुक्त होना ही बंगाल की असली विजय है। भाजपा को अब उसी धागे को पकड़ कर आगे बढ़ना है। राजनीतिक रूप से भाजपा को वंदेमातरम् गीत में कहे गए सुखदाम वरदाम और दश प्रहर धारिणी बनाने की कठिन अग्नि परीक्षा से निकलना होगा।
दरअसल, बंगाल का चुनाव केवल एक विधानसभा का ही चुनाव नहीं था कि जिसमें राजनीतिक सत्ता किसको मिलेगी ? यह चुनाव इसलिए और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था कि इस देश में मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ और देश विरोधी मानसिकता को संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों को भारत का जनमानस नकारता है या नहीं ?
दुर्भाग्य से आजादी के बाद से ही ऐसी राजनीति स्थापित की गई जो सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण पर केंद्रित थी। मुस्लिमों को तुष्ट करने के लिए बहुसंख्यक हिंदू समाज को निर्लज्ज भाव से अपमानित करना, हिन्दू आख्यानों को उपेक्षित करना और हिंदू समाज को जातियों , भाषाओं और क्षेत्र के आधार पर बांट कर और बहका कर सत्ता में बने रहना ही उनका लक्ष्य होता था। लेकिन देर से ही सही बंगाल ने उस राजनीति को तिरस्कृत कर दिया और मुसलमानों के हाथ में सत्ता की चाभी है, इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया। बंगाल के बाद अगले साल उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं, हालांकि यहाँ पर भी मुस्लिम भाजपा के विरोध में ही हैं लेकिन *बंगाल में भाजपा की जीत ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुस्लिमों को भारत में विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा। वह भी इस देश के वैसे ही नागरिक हैं जैसे कि हिंदू समाज के लोग।
बंगाल की जीत उन राजनीतिक दलों के लिए सबक है जो मुस्लिम समुदाय और उनके वोटों को अपना ग़ुलाम समझते हैं और उनकी रणनीति में मुस्लिम वोट प्राथमिकता पर होते हैं। पहले बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और आने वाले चुनाव में उत्तर प्रदेश में यादव मुस्लिम वोट के भरोसे सत्ता प्राप्त करने की होड़ में समाजवादी पार्टी लगी है। भाजपा विरोधी दलों की यह रणनीति बिहार में ध्वस्त हुई, यही हाल उत्तर प्रदेश में होना है।
भाजपा के लिए अब आगे का रास्ता और ज़्यादा सावधानी बरतने का है। उसे धीरे धीरे ऐसे नेतृत्व को सामने लाना होगा जिनकी सोच में सनातनी स्पष्टता और कार्य शैली में तीव्र आक्रामकता हो। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह विश्वास जगाया है तो असम में हेमंत विश्व सरमा, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ उसी मार्ग पर चल रहे हैं। बंगाल में भी हिंदुओं को आक्रामक नेता चाहिए। जो सच को डंके की चोट पर कहने का साहस रखता हो। जो भरोसे की गारंटी हो।
बंगाल चुनाव की बात अमित शाह और सुनील बंसल के बिना अधूरी है। इस जोड़ी ने उत्तर प्रदेश के बाद बंगाल को देश द्रोहियों से मुक्त कर दिया। अमित शाह के साथ ने सुनील बंसल को एक ऐसा संगठनकर्ता के रूप में देश के सामने ला खड़ा किया है, जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य रखते हुए एक एक कड़ी को जोड़कर विजय माला तैयार कर देता है। राजनीतिक विश्लेषक बंसल में काफ़ी संभावनाएं देख रहे हैं। ये आने वाले कल की भाजपा का चेहरा है, जिन पर भारत को सुखदाम वरदाम बनाने की ज़िम्मेदारी है!!



