
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ.लोकेश कुमार चंदेल*)
-बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ.लोकेश कुमार चंदेल*)
जयपुर। महात्मा गांधी भगवान बुद्ध को एक महान सुधारक और अहिंसा का सर्वोच्च अवतार मानते थे। वे बुद्ध को हिंदू धर्म का ही हिस्सा (एक महान हिंदू) मानते थे, जिन्होंने धर्म को अंधविश्वासों से मुक्त कर उसे पुनर्जीवित किया। गांधीजी ने बुद्ध को ‘सत्य का खोजी’ और ‘प्रकाशित पुरुष’ कहा और स्वीकार किया कि वे बुद्ध के जीवन से बहुत प्रभावित है। वैशाख पूर्णिमा या वैशाख को ही बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन भगवान गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। वैशाख पूर्णिमा को ही ज्ञान प्राप्त और वे वैशाख पूर्णिमा को ही महापरिनिर्वाण (मृत्यु) हुआ था। इसलिए वैशाख पूर्णिमा को ही त्रिविध पावन दिवस भी कहा जाता है। बुद्ध के जीवन कि ये तीनों महत्वपूर्ण घटनाएं वैशाख पूर्णिमा को हुई थी। यह शांति, अहिंसा और करुणा का प्रतीक माना गया है। वे अपने अनुयायियों को कहा करते थे कि उन्हें या उनकी शिक्षाओं को आंख बंद करके नहीं मानें, बल्कि स्वयं परखें और अनुभव करें। वे कहते थे कि स्वयं के प्रति जागरूक रहें ‘अप्प दीपो भव’ का अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए और अपने विचारों व कर्मों का मालिक खुद बनना चाहिए। वे किसी और पर या खुद बुद्ध पर निर्भर रहने के बजाए, अपने ज्ञान और आचरण से अपने जीवन का मार्ग खुद रोशन करें। वे अपने प्रगतिशील शिक्षाओं के कारण आज विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। इस दिन अनुयायी बौद्ध मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं, बुद्ध की प्रतिमा पर फूल चढ़ाते हैं, मोमबत्तियां (दीपक) जलाते हैं, और दान-पुण्य करते हैं। वे आमतौर पर सफेद कपड़े पहनते हैं और ‘अष्टांग मार्ग’ के अनुसार जीवन जीने का संकल्प लेते हैं। यह दिन बुद्ध के शांति, करुणा, मध्यम मार्ग और प्रेम के उपदेशों को याद करने और उन्हें जीवन में अपनाने के लिए मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए यह सबसे पवित्र दिन है, वहीं कई हिंदू मान्यताएं बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार मानकर इस दिन उनकी पूजा करते हैं। महात्मा बुद्ध मनुष्य जीवन में शांति, अहिंसा, करुणा और सत्य पर जोर देते हुए कहते थे कि दुखों से मुक्ति के लिए चार आर्य सत्य (जीवन दुखमय है, कारण तृष्णा है, निवारण संभव है, मार्ग अष्टांगिक है) और मध्यम मार्ग (अत्यधिक भोग और तपस्या के बीच का रास्ता) अपनाने की शिक्षा दी, जो वर्तमान में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। वे कहा करते थे कि अतीत की यादों और भविष्य के सपनों में उलझने के बजाय, वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित रखकर अपना जीवन यापन करना चाहिए। उनका मनाना था कि सुख-दुख हमारे मन की अवस्था है, जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया। घृणा से घृणा कभी खत्म नहीं होती, उसे केवल प्रेम से ही जीता जा सकता है। वे हमेशा कहते थे कि सभी जीवों के प्रति दया भाव रखना और सत्य के मार्ग पर चलना परम धर्म है। संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है, इसलिए बदलाव को स्वीकार करना ही शांति लाता है। उनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व अनार्य शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था। उनकी मां का नाम महामाया था, जो कोलीय वंश से थीं, उनका निधन बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापति गौतमी ने किया। सिद्धार्थ का मन बचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं में मिलता है। जिसमें वे घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुंह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त के तीर से घायल कर हंस की सहायता की ओर उसके प्राणों की रक्षा की। 29 साल की आयु में सिद्धार्थ नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जन्म- मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। इस ऐतिहासिक घटना को बौद्ध धर्म में ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहा जाता है। सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या प्रारंभ की, इसके बाद वे आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूख गया । उनके छह साल बीत गए तपस्या करते हुए, लेकिन वे सफल नहीं हुए। एक दिन कुछ स्त्रियां किसी नगर से लौटती हुई, वहां से निकलीं, जहां सिद्धार्थ तपस्या कर रहे थे। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़े- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो, ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना भी कसो भी मत कि वे टूट जाएं।’ बात सिद्धार्थ को जंच गई। वे मान गए कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है और इसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है। बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे,जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की। 35 वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन ही सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए हुए थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की। समीपवर्ती गांव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ। वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुंची। सिद्धार्थ वहां बैठे ध्यान कर रहे थे। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा करने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया।
धर्म-चक्र-प्रवर्तन*
वे अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश देने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुंचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पांच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिए भेज दिया। महाप्रजापति गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला। आनंद,बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे।
महापरिनिर्वाण*-
बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक व्यक्ति से भेंट रूप में प्राप्त किया था, जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।
बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग : दुखों से मुक्ति और निर्वाण (ज्ञान) प्राप्ति का मार्ग है, जिसे ‘मध्यम मार्ग’ भी कहते हैं। ये आठ सिद्धांतकृसही दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति, और एकाग्रताकृनैतिक आचरण (शील), मानसिक अनुशासन (समाधि) और प्रज्ञा (ज्ञान) के माध्यम से दुखों का अंत करते हैं।
बहरहाल, हम यही कह सकते बुद्ध एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर मानवता को सही राह दिखाई। भगवान बुद्ध ने अपने अंतिम समय में शिष्यों से स्वयं को दीपक बनाने के लिए कहा था, जिसे ‘अप्प दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) के रूप में जाना जाता है। बुद्ध की अहिंसा और करूणा से विश्व में हो रहे, युद्ध से निपटा जा सकता है।





