
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. सीमा दाधीच)
होली फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है यह एक प्रमुख हिंदू त्यौहार है जो आमतौर पर मार्च महीने में आता है। यह रबी की फसलें पकने का महीना है। गेहूं,चना और सरसों के खेत फसलों से मन को आनंदित करते हैं और कृषक फाल्गुन पूर्णिमा के दिन खेत से नए अनाज की बलिया लाते है और जब होली में आग लगती है तो अपने अनाज की बलिया को सेकते है यानी फसल की कटाई के लिए मंगलकामना करते है और हमारे देश में नए अनाज का अग्नि देव को भोग लगाने की परंपरा हैं। होली से एक रात पहले, लोग सर्दियों को विदाई देने के लिए अलाव भी जलाते हैं। भारत के अधिकांश प्रदेशों में होली का त्योहार अलग-अलग नाम और रूप से मनाया जाता है। जहां एक तरफ ब्रज की होली आकर्षण का केंद्र होती है,वहीं बरसाने की लठमार होली को देखने के लिए भी दूर-दूर से लोग आते हैं।
मथुरा और वृंदावन में 14 दिनों तक धूमधाम से मनाई जाती है। इनके आलावा बिहार में फगुआ, छत्तीसगढ़ में होरी,पंजाब में होला मोहल्ला,महाराष्ट्र में रंग पंचमी, हरियाणा में धुलंडी जैसे नामों से होली का उत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए मनाया जाता है पौराणिक काल में राक्षसराज हिरण्यकशिपु और उनके पुत्र भक्त प्रह्लाद की है। अहंकारी हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान मानता था लेकिन विष्णु भक्त प्रह्लाद ने उसे स्वीकार नहीं किया।हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) के साथ मिलकर प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया लेकिन होलिका जल गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। यह कथा बताती है अहंकार का अंत निश्चित है। अन्य कथा के अनुसार होली का भगवान कृष्ण से भी गहरा संबंध है क्योंकि माना जाता है कि वृंदावन में राधा और गोपियों के साथ कृष्ण ने ही रंगों के त्योहार की शुरुआत की थी।
हमारा जीवन भी रंगो से भरा होना चाहिए जैसे इंद्रधनुष के सात रंग हमें खुशियां देते हैं वैसे ही फागोत्सव में भी फूलों से,गुलाल और रंगों में भीगे चेहरे सबको आनंदित करते है ये आनंद जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। प्रत्येक रंग अलग-अलग दिखते पर सब आनंद उठाने के लिए बनाए गए हैं। लाल रंग जोश,ऊर्जा, संवेदनशीलता का प्रतीक है वैसे पीला खुशी, आशावाद और ज्ञान का,हरा जीवन में ताजगी, सुकून और समृद्धि का, नारंगी उमंग, रचनात्मकता का, बैंगनी विलासिता का और सफेद शांति, पवित्रता और सादगी के रूप में देखा जाता है लेकिन होली में उमंग और खुशी से काला रंग भी मन को आनंदित करता है,फाग में प्रकृति के सभी रंग मनुष्य को आनंदित करते है।
जब मन प्रसन्न होता है तो मन झूमता नृत्य करता है जो रंगों के त्योहार को और रंगीन के साथ ऊर्जावान बनाता है नृत्य जब समूह में हो तो सामुदायिक एकता का पर्व बनता है। यह बसंत ऋतु के आगमन और नई फसल का जश्न फाल्गुन माह में लोगों को फाग लोक गीतों चंग डफ और ढोलक की थाप पर सामूहिक नृत्य में देखने को मिलता हैं जैसे कि ब्रज की लठमार होली या राजस्थान का चंग नृत्य वही जोधपुर में होली के दौरान गैर नृत्य और चंग की थाप का गहरा संगम देखा जाता हैं जहां गैर नृत्य पुरुषों द्वारा चंग ढोल और थाली की थाप पर गोल घेरे में किया जाने वाला नृत्य है जो धुलंडी के आसपास जोर-शोर से मनाया जाता है।
सफेद पोशाक और रंगीन पगड़ी पहने ‘गेरिये’ (नृत्य करने वाले) पारंपरिक फाग गीत गाते हुए यह नृत्य करते हैं। वही मंदिर प्रांगण में भी महिलाओं द्वारा भजन कीर्तन, नृत्य और फूलों से फागोत्सव में संस्कृति का संगम देखने को मिलता है। यह नाराजगी मिटाकर गले लगाने का पर्व है। यह पर्व संदेश देता है कि सामाजिक एकता से ही त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जा सकता है।




