दिव्यराष्ट्र, जयपुर: आज वर्ल्ड कैंसर डे के अवसर पर, भारत में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर होने वाली चर्चा में एक गहरा बदलाव आ रहा है। पहले यह मुख्य रूप से केवल जीवित बचने (सर्वाइवल) के आंकड़ों तक सीमित थी। लेकिन आज की कहानी लंबी उम्र, जीवन की गुणवत्ता और इलाज के दौरान व बाद में भी बेहतर तरीके से जीने की क्षमता पर केंद्रित है। जांच, टारगेटेड थेरेपी और सहयोगी देखभाल में हुई प्रगति के कारण अब ब्रेस्ट कैंसर को सिर्फ एक बीमारी के बजाय, लंबे समय तक संभलकर मैनेज की जाने वाली स्थिति के रूप में देखा जा रहा है।
डॉ. संदीप जासूजा, मेडिकल सुपरिटेंडेंट और प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग, स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर, ने कहा, “आज के समय में ब्रेस्ट कैंसर से बचने का मतलब सिर्फ इलाज पूरा करना ही नहीं है। स्क्रीनिंग, जांच और इलाज के नए तरीकों में हुई क्रांतिकारी खोजों ने हर स्टेज पर नतीजों को काफी बेहतर बना दिया है। इससे मरीज न केवल ज्यादा लंबे समय तक जीवित रह पा रहे हैं, बल्कि अपनी बीमारी को भी बेहतर तरीके से मैनेज कर रहे हैं। अब इलाज के विकल्प हर मरीज के लिए खास तौर पर तैयार किए जाते हैं। इसमें ट्यूमर के लक्षण, कैंसर दोबारा होने का खतरा, मरीज की सामान्य सेहत और उनकी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है। यह तरीका न केवल जीवित बचने की दर बढ़ाता है, बल्कि जीवन के स्तर को भी बेहतर बनाए रखता है। इससे मरीज कैंसर के दौरान और उसके बाद भी सक्रिय रह सकते हैं और एक स्वस्थ व खुशहाल जीवन जी सकते हैं।”
यहाँ ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के वे चार आधुनिक तरीके दिए गए हैं जो भारत में मरीजों के लिए सर्वाइवल का मतलब बदल रहे हैं: एक-समान इलाज की जगह अब व्यक्तिगत उपचार ब्रेस्ट कैंसर के कई प्रकार होते हैं, जैसे हार्मोन रिसेप्टर-पॉजिटिव, एचईआर2-पॉजिटिव और ट्रिपल-नेगेटिव। हर प्रकार के लिए अलग इलाज की जरूरत होती है। अब नई जांच तकनीकों से डॉक्टर ट्यूमर की जैविक विशेषताओं के आधार पर सटीक इलाज तय कर सकते हैं। यह तरीका इलाज को ज्यादा असरदार बनाता है और फालतू के साइड इफेक्ट्स को कम करता है। इससे मरीज शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत रहकर अपना इलाज पूरा कर पाते हैं।
दोबारा कैंसर होने (रेकरेंस) के जोखिम से सक्रियता से निपटना शुरुआती इलाज के बाद भी कई मरीजों में कैंसर दोबारा होने का डर रहता है, जो कुछ मामलों में 50प्रतिशत तक हो सकता है। आज की नई एडवांस्ड थेरेपीज खास तौर पर उन रास्तों को निशाना बनाती हैं जो कैंसर को बढ़ाते हैं। ये पारंपरिक इलाज के मुकाबले दोबारा कैंसर होने के जोखिम को करीब 30प्रतिशत तक कम कर देती हैं। व्यक्तिगत फॉलो-अप प्लान और लगातार निगरानी से मरीज खुद को ज्यादा तैयार महसूस करते हैं और अनिश्चितता के डर से मुक्त होकर अपनी रिकवरी पर ध्यान दे पाते हैं।
बीमारी पर नियंत्रण के साथ जीवन की गुणवत्ता को बचाए रखना नए इलाज अब बीमारी को काबू में रखने और सामान्य रोजमर्रा की जिंदगी जीने के बीच संतुलन बनाने पर जोर देते हैं। इलाज से होने वाली परेशानियों को कम करके और देखभाल के लचीले प्लान देकर मरीज अपनी दिनचर्या जारी रख पाते हैं। वे काम पर जा सकते हैं और परिवार व सामाजिक जीवन में सक्रिय रह सकते हैं। यह बदलाव दिखाता है कि सर्वाइवल का मतलब सिर्फ यह नहीं कि आप कितने साल जिए, बल्कि यह भी है कि आप किस तरह जिए।
इलाज में भावनात्मक और सहयोगी देखभाल का समावेश जैसे-जैसे नतीजे बेहतर हो रहे हैं, मानसिक स्वास्थ्य और सर्वाइवरशिप प्लानिंग कैंसर की देखभाल का अहम हिस्सा बन गए हैं। अब काउंसलिंग और मेंटल हेल्थ सपोर्ट को इलाज का ही हिस्सा माना जाता है। चिंता, थकान और तनाव को दूर करने से मरीजों में मजबूती आती है और वे सक्रिय इलाज के बाद भी पूरे आत्मविश्वास के साथ जीवन जी पाते हैं।
वर्ल्ड कैंसर डे 2026 पर, भारत में ब्रेस्ट कैंसर देखभाल का यह नया नजरिया एक बड़ी सच्चाई सामने लाता है:तरक्की अब सिर्फ सर्वाइवल रेट से नहीं मापी जाती। वैज्ञानिक नवाचार और व्यक्तिगत देखभाल के मेल से मरीज न केवल लंबी उम्र पा रहे हैं, बल्कि अपनी जिंदगी पर फिर से नियंत्रण पाकर बेहतर जी रहे हैं।




