(दिव्य राष्ट्र के लिए गंवरु प्रमोद)
“स्मृतियों के आलोक में” डॉ ओंकार नाथ द्विवेदी की एक महत्त्वपूर्ण संस्मरणात्मक कृति है, जो हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराती है. यह पुस्तक केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं है, बल्कि साहित्यिक जीवन के अनुभवों, रचनात्मक संवादों और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा आलोक है, जिसमें पाठक सत्रह विशिष्ट साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व को एक साथ देखने-समझने का अवसर पाता है, मानो चेतना के न्यूरोनल नेटवर्क में संचित अनुभव-संकेत एक साथ सक्रिय होकर स्मृति-पटल पर उभर आए हों.
लेखक ने कुल जमा सत्रह प्रख्यात साहित्यकारों व लेखकों के संस्मरणों को बड़ी आत्मीयता, पूर्ण निष्पक्षता और साहित्यिक सजगता के साथ प्रस्तुत किया है. यह कृति इतिहास और भावबोध के मध्य एक सशक्त सेतु का निर्माण करती है, जिसे काल और चेतना के बीच स्थित एक संज्ञानात्मक ट्रांजिशनल स्पेस कहा जा सकता है. डॉ राम कुमार वर्मा, डॉ जगदीश गुप्त, डॉ हरदेव बाहरी, महादेवी वर्मा, सुशील दाहिमा ‘अभय’, उदय शंकर दुबे सहित अनेक साहित्यकारों पर लिखे गए ये संस्मरण केवल साहित्यिक मूल्यांकन नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति और विचार के ऐसे समन्वित प्रतिरूप हैं, जिनमें अनुभूति और बौद्धिक संरचना एक सहक्रियात्मक प्रणाली की भांति कार्य करती है.
डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने ‘एकलव्य’ महाकाव्य के प्रणेता डॉ रामकुमार वर्मा के विषय में अपने संस्मरण में लिखा है. “उनकी सहज वैदुष्यमयी उदारता और अनाविल सहृदयता के आलोक में मैंने चेतना की सहज दीप्ति का अनुभव किया. मेरा व्यक्तित्व उनकी सहज सन्निधि से पहले से कुछ बड़ा हो गया था.” यह कथन गुरु-शिष्य परंपरा के उस मानवीय आयाम को उद्घाटित करता है, जहाँ ज्ञान केवल सूचना-संग्रह नहीं रहता, बल्कि व्यक्तित्व के संज्ञानात्मक विस्तार और आत्मिक उत्क्रांति की प्रक्रिया बन जाता है.
इसी संस्मरण में डॉ द्विवेदी ने डॉ रामकुमार वर्मा के एक उद्बोधन का उल्लेख किया है, जिसमें ‘राम’ शब्द की ध्वन्यात्मक संरचना पर विचार व्यक्त किया गया है. उनके अनुसार ध्वनि-चित्रांकन यंत्र पर ‘राम’ शब्द के उच्चारण से जो वक्र रेखाओं की परिधि वाला सुंदर वृत्तचित्र बनता है, वह अन्य शब्दों से नहीं बनता. इस वृत्त में अग्नि की प्रसरणशीलता, सूर्य के क्रमशः प्रखर होते ताप और चंद्रमा की उत्तरोत्तर शीतलता का संकेत प्रतीकवत अनुस्यूत है, मानो ध्वनि-ऊर्जा का रूपांतरण किसी जैव-भौतिक प्रतिमान में ढल गया हो.
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में किसी शब्द के ध्वनिचित्र का वृत्ताकार बनना उसकी ध्वनि-आवृत्ति, अनुनाद, हार्मोनिक संरचना और तरंगों की फेज-संरचना से संबंधित होता है. ‘रा’ और ‘म’ ध्वनियों का संयुक्त उच्चारण अपेक्षाकृत स्थिर, संतुलित और न्यूनतम एंट्रॉपी वाला वेव-पैटर्न उत्पन्न करता है, जिससे सममित आकृतियों की संभावना बढ़ जाती है. सूर्य और चंद्र की तुलना यहाँ खगोलीय पिंडों के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा और शीतलता के दो मौलिक भौतिक सिद्धांतों, अर्थात ऊष्मागतिक सक्रियता और तापीय संतुलन, के प्रतीक के रूप में देखी जानी चाहिए. इस प्रकार राम नाम की सूर्य-चंद्र से तुलना धार्मिक आस्था से अधिक एक संतुलनकारी ऊर्जा-तत्व की सांकेतिक व्याख्या बन जाती है, जो इसे वैज्ञानिक प्रतीकवाद की सुदृढ़ आधारभूमि प्रदान करती है. गोस्वामी तुलसीदास द्वारा राम नाम का ऐसा महत्व निरूपित करना उनकी कालवेधी अंतर्दृष्टि और सांस्कृतिक संज्ञान का प्रमाण माना जा सकता है, जिसे आज का विज्ञान ध्वनि-तरंगों, मस्तिष्कीय अनुनाद और मनो-शारीरिक प्रभावों के स्तर पर समझने का प्रयास करता है.
डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने अपने किशोरावस्था काल में महादेवी वर्मा के भाषण को ज्यों का त्यों स्मृति में सुरक्षित रखा है. उनके शब्द हैं. “जो जीवन भर विद्यार्थी के रूप में ज्ञानार्जन करते हुए व्यवहार में उसे उतारते हैं, सच्चे अर्थों में वही लोग दूसरों को सीख देने के अधिकारी होते हैं.” किशोरावस्था को उन्होंने विद्यार्थी जीवन का उषाकाल कहा है, जहाँ ज्ञान की प्रभा क्रमशः प्रखर होती जाती है और सायंकाल वही किरणें चंद्रमा की चांदनी में ढलकर शीतलता प्रदान करती हैं. यह उपमा केवल काव्यात्मक नहीं है, बल्कि मानव मस्तिष्क के विकासात्मक चरणों, न्यूरोप्लास्टिसिटी और संज्ञानात्मक परिपक्वता के क्रम से भी गहन साम्य रखती है.
महादेवी वर्मा का यह कथन कि सच्चा ज्ञान वही है जो लोगों को आतंकित नहीं बल्कि आश्वस्त करता है, आज के वैज्ञानिक-मानवीय विमर्श में भी उतना ही प्रासंगिक है. विनम्रता, निर्भीकता, सेवा-भाव और करुणा का समन्वय सामाजिक स्थिरता का वही सूत्र है, जिसे आधुनिक सामाजिक विज्ञान, व्यवहारिक मनोविज्ञान और नैतिक तंत्र-विज्ञान सहअस्तित्व का आधार मानते हैं.
डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने सुशील दाहिमा ‘अभय’ पर वर्ष 2023 में जो संस्मरण लिखा था, वही गंवरु प्रमोद द्वारा संपादित पुस्तक “डा. सुशील दाहिमा अभय: अनुशिष्ट पत्रकार एवं साहित्यकार” में बिना किसी शब्द परिवर्तन के प्रकाशित हुआ. उसी संस्मरण को डॉ द्विवेदी ने अपनी पुस्तक “स्मृतियों के आलोक में” भी व्यापकता से स्थान दिया है. यह तथ्य उनकी विशाल हृदयता, बौद्धिक ईमानदारी और साहित्यिक नैतिकता का परिचायक है, जिसे अकादमिक अखंडता और पाठीय पारदर्शिता की संज्ञा दी जा सकती है.
पुस्तक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवेदनशील है. कहीं-कहीं शब्दावली में वैचारिक घनत्व अवश्य दिखाई देता है, किंतु वह संप्रेषणीयता को बाधित नहीं करता. स्मृतियों का चयन और उनका प्रस्तुतीकरण इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने जिन साहित्यकारों को निकट से देखा और जिया है, उन्हें पूरी ईमानदारी और सम्मान के साथ शब्दों में रूपायित किया है, मानो अनुभूति का कच्चा डेटा परिष्कृत संज्ञानात्मक संरचना में ढल गया हो.
इस कृति में साहित्य और विज्ञान किसी द्वैतात्मक अनुशासन की तरह नहीं, बल्कि चेतना की एक ही समग्र प्रक्रिया की भिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में सहसंलग्न दिखाई देते हैं. जहाँ साहित्य अनुभूति को रूप, रस और अर्थ प्रदान करता है, वहीं विज्ञान उसी अनुभूति के अंतर्निहित संरचनात्मक नियमों, ऊर्जा-संतुलन और सूचना-प्रवाह को उद्घाटित करता है. स्मृति यहाँ केवल भावात्मक पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि चेतना में संचित अनुभवों का पुनःसक्रिय संज्ञानात्मक विन्यास है, जो प्रत्येक स्मरण के साथ स्वयं को पुनर्निर्मित करता है. यह दृष्टि आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान और चेतना-अध्ययन की उस अवधारणा से साम्य रखती है, जिसमें स्मृति को स्थिर भंडार नहीं, बल्कि सतत रूपांतरणशील प्रक्रिया माना गया है.
डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी की संस्मरणात्मक दृष्टि स्मृति को रैखिक कालक्रम में नहीं बाँधती, बल्कि उसे बहुस्तरीय समय-बोध की भांति प्रस्तुत करती है, जहाँ अतीत, वर्तमान और अनुभव एक साथ सहअस्तित्व में रहते हैं. यह स्थिति जटिलता सिद्धांत और क्वांटम दृष्टिकोण से भी अर्थवान प्रतीत होती है, जहाँ यथार्थ किसी एक निश्चित अवस्था में नहीं, बल्कि संभावनाओं के समुच्चय के रूप में विद्यमान रहता है. साहित्य इस संभावनात्मक यथार्थ को संवेदना के माध्यम से पकड़ता है, जबकि विज्ञान उसे संरचना, संभावना और अंतःक्रिया की भाषा में व्याख्यायित करता है.
इस अंतःसंवाद में कल्पना और तथ्य परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक तत्त्व बन जाते हैं. जिस प्रकार विज्ञान अज्ञात को ज्ञात करने की अनुशासित जिज्ञासा है, उसी प्रकार साहित्य ज्ञात को अर्थ और करुणा से संपृक्त करने की साधना है. “स्मृतियों के आलोक में” इन दोनों को एक साझा चेतन प्रवाह में संयोजित करती है, जहाँ तर्क संवेदना से रहित नहीं और संवेदना विवेक से विमुख नहीं होती. यही वह बिंदु है जहाँ साहित्य विज्ञान की अमूर्तता को मानवीय बनाता है और विज्ञान साहित्य को बौद्धिक अनुशासन प्रदान करता है.
इस अर्थ में यह कृति केवल संस्मरणों का संकलन नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के उस सूक्ष्म और जटिल आयाम की अभिव्यक्ति है, जहाँ शब्द और सिद्धांत, अनुभूति और विश्लेषण, परंपरा और आधुनिकता एक ही बौद्धिक क्षितिज पर सहप्रकाशित होते हैं. यही इसका अत्यंत गूढ़, किंतु ग्राह्य, और दीर्घकालिक साहित्यिक–वैज्ञानिक महत्व है.
समग्रतः “स्मृतियों के आलोक में” हिन्दी साहित्य की एक पीढ़ी और उसके प्रतिनिधि रचनाकारों का जीवंत, मानवीय, वैज्ञानिक और वैचारिक दस्तावेज है. यह कृति अतीत की स्मृतियों को वर्तमान की वैज्ञानिक-बौद्धिक चेतना से जोड़ते हुए साहित्य की निरंतर प्रवाहित धारा को रेखांकित करती है. यही इसका स्थायी, बौद्धिक और युगधर्मी महत्व है.


