मुंबई दिव्यराष्ट्र/ नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई के डॉक्टरों ने दो वर्षीय बच्ची का सफलतापूर्वक इलाज किया, जिसकी छाती के ऊपरी हिस्से (मध्यवक्ष / मेडियास्टिनम) में स्थित एक जटिल गांठ गर्दन तक फैल गई थी। यह गांठ बच्ची की सांस की नली को दबा रही थी, जिससे उसे गंभीर श्वसन परेशानी हो रही थी। बच्ची (गोपनीयता के लिए नाम बदला गया) पिछले चार से पांच महीनों से गर्दन में अकड़न, सूजन और हल्की सांस की तकलीफ से पीड़ित थी।
उसके माता-पिता ने यह भी देखा कि उसे सांस लेते समय आवाज आने लगी थी, सांस फूलने की समस्या बढ़ रही थी और उसकी आवाज में बदलाव आ रहा था, जो खासकर संक्रमण के दौरान और लेटने पर ज्यादा हो जाता था। इन चेतावनी संकेतों को देखते हुए परिजन उसे तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे। नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई में क्लिनिकल जांच के दौरान बच्ची की ट्रेकिया (सांस की नली) के एक ओर खिसकने की पुष्टि हुई, जिसके बाद तुरंत विस्तृत जांच कराई गई।
बच्ची की कम उम्र को देखते हुए, सांस की नली पर हल्का दबाव भी जानलेवा साबित हो सकता था। अल्ट्रासाउंड और कॉन्ट्रास्ट सीटी स्कैन जैसी उन्नत जांचों में थाइमस क्षेत्र से उत्पन्न एक जटिल अग्र मध्यवक्षीय (मेडियास्टाइनल) गांठ का पता चला, जो गर्दन तक फैली हुई थी। यह दुर्लभ गांठ छाती और गर्दन के महत्वपूर्ण अंगों के बेहद करीब थी और ट्रेकिया को दबाकर उसकी स्थिति बदल रही थी, जिससे बच्ची को लगातार सांस की गंभीर समस्या का खतरा बना हुआ था।
डॉ. रसिकलाल शाह, वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल शल्य चिकित्सा, नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, मुंबई, के नेतृत्व में बहु-विषयक बाल चिकित्सा टीम ने सर्जरी की योजना बनाई। टीम में डॉ. प्रदीप के. कौशिक, वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल हृदय शल्य चिकित्सा भी शामिल थे। सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया और एयरवे प्रबंधन की जिम्मेदारी डॉ. नंदिनी दवे, वरिष्ठ परामर्शदाता – बाल संज्ञाहरण विज्ञान ने संभाली। मध्यवक्षीय (मेडियास्टाइनल) गांठ वाले छोटे बच्चों में एनेस्थीसिया के दौरान सांस की नली में रुकावट के उच्च जोखिम को देखते हुए विशेष सावधानी बरती गई।
सर्जरी के दौरान शल्यक्रिया के दौरान किए गए अल्ट्रासाउंड परीक्षण में गांठ के ठोस हिस्से सामने आए, जिसके बाद तुरंत सर्जिकल रणनीति में बदलाव किया गया। सुरक्षित और पूर्ण निष्कासन के लिए मीडियन स्टर्नोटॉमी का निर्णय लिया गया, जिससे सभी महत्वपूर्ण अंगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। ऊतक-विज्ञान संबंधी जांच में यह गांठ सौम्य (बिनाइन) पाई गई, जिसमें मायक्सोमा/मायक्सोलिपोमा की विशेषताएं थीं।
इस केस के बारे में करते हुए, डॉ. रसिकलाल शाह ने कहा, “छोटे बच्चों में मध्यवक्षीय गांठें सर्जरी और एयरवे प्रबंधन दोनों के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण होती हैं। इस मामले में सटीक निर्णय और विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच तालमेल से ही सुरक्षित परिणाम संभव हो पाया।”
वहीं डॉ. प्रदीप कौशिक ने कहा, “एयरवे पर दबाव की समय रहते पहचान और सर्जरी की योजना में लचीलापन इस बच्ची के सफल इलाज में सबसे अहम रहा।”
सर्जरी के दौरान ट्रेकिया, थाइमस और छाती की प्रमुख रक्त वाहिकाओं को सुरक्षित रखते हुए अत्यंत सावधानी से गांठ को निकाला गया। रक्तस्राव न्यूनतम रहा और किसी भी महत्वपूर्ण संरचना को नुकसान नहीं पहुंचा। सर्जरी के बाद बच्ची की कड़ी निगरानी की गई और पूरी तरह स्वस्थ होने पर उसे स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।





