
मुंबई, अप्रैल 2026.
एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य नीलकंठ मिश्रा ने कोटक प्राइवेट बैंकिंग के कार्यक्रम ‘टेक एंड काउंटर टेक’ (टीएटीसी)में कहा कि भारत को हर एक से दो साल में भू-राजनीतिक उथल-पुथल की तैयारी रखनी चाहिए और मौजूदा तनाव में आई कमी का इस्तेमाल लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ेढांचागत सुधारों को आगे बढ़ाने में करना चाहिए। कोटक प्राइवेट द्वारा आयोजित इस खास आमंत्रण-मात्र वाले मंच पर उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के संघर्षविराम की अपील के बाद तत्काल तनाव की आशंका भले कम हुई हो, लेकिन झटकों का यह सिलसिला जल्द थमने वाला नहीं है।
कोटकएसेट मैनेजमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर नीलेश शाह की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में नीलकंठ मिश्रा ने कहा, “यह अमेरिका और चीन के बीच एक बड़े टकराव का हिस्सा है। जब तक इन दोनों के बीच के समीकरण नहीं सुलझते, हमें हर एक-दो साल में उथल-पुथल के लिए तैयार रहना होगा।” उन्होंने कहा कि भारत के लिए सबक यह नहीं है कि स्थिरता का इंतजार करें, बल्कि यह है कि जब तक विकास की परिस्थितियां अनुकूल हैं, तब तक कड़े फैसले लेकर अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।
नीलकंठ मिश्रा ने संघर्ष के दिखाई ना देने वाले असर पर जोर दिया और कहा कि युद्ध सुर्खियों से कम और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करके ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा, “यह भारत के लिए बुरा है, लेकिन दुनिया के लिए बेहद बुरा है।” ऊर्जा, रसायन, उर्वरक, लॉजिस्टिक्स और हवाई यातायात में व्यवधान चुपचाप युद्ध के मैदान से दूर उत्पादन ठप कर सकता है। उन्होंने चेताया कि अगर दुनिया के चार फीसदी ऊर्जा प्रवाह में रुकावट आए तो इसका मतलब होगा कि “वैश्विक जीडीपी का चार फीसदी हिस्सा बाहर हो जाता है” और इसके ऊपर पर्यटन, विनिर्माण और व्यापार वित्त पर पड़ने वाला असर तो अलग से होगा।
‘1989-93 जैसा माहौल, लेकिन भारत ज्यादा तैयार‘
इन सबके बावजूद नीलकंठ मिश्रा ने भारत की तैयारी को लेकर काफी भरोसेमंद लहजा अपनाया। उन्होंने कहा कि पिछले वैश्विक संकटों की तुलना में भारत इस दौर में कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति से प्रवेश कर रहा है। उन्होंने कहा, “अपने इतिहास में किसी भी दूसरे समय के मुकाबले हम इससे निपटने के लिए कहीं बेहतर ढंग से तैयार हैं।” उन्होंने एक वरिष्ठ नीति-निर्माता के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया जिन्होंने आज के माहौल की तुलना उथल-पुथल भरे 1989-93 के दौर से की थी। फर्क यह है कि आज पूंजी बाजार काफी गहरे हैं, बाहरी संतुलन ज्यादा मजबूत है और नीतिगत विश्वसनीयता पहले से बेहतर है।
नीलकंठ मिश्रा ने एक अहम बात यह कही कि बाजारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अभी जो तकलीफ दिख रही है वही इस वक्त को सुधारों के लिए असाधारण रूप से अनुकूल बनाती है। उन्होंने कहा, “दुनिया के लिए यह बहुत दर्दनाक है, लेकिन यह खत्म होगा।” और जब खत्म होगा तो आर्थिक गति लौटेगी और जिन देशों ने मंदी के दौरान कदम उठाए वे और मजबूत होकर उभरेंगे। उन्होंने सावधान किया कि शांति का इंतजार करके फिर काम करना एक गलती होगी।
उन्होंने विद्युतीकरण को एक रणनीतिक प्राथमिकता बताया और कहा कि भारत अपने साथी देशों के मुकाबले तेल और गैस के झटकों के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि अंतिम उपयोग में बिजली की हिस्सेदारी अभी भी बहुत कम है। विद्युतीकरण में तेजी और बेहतर ऊर्जा मूल्य निर्धारण से भू-राजनीतिक जोखिम कम होंगे और दक्षता बढ़ेगी। आवास और शहरी बुनियादी ढांचा भी ऐसे क्षेत्र हैं जहां नीति निर्णायक रूप से आगे बढ़ सकती है और ऐसी घरेलू मांग तैयार कर सकती है जो वैश्विक उठापटक से काफी हद तक अछूती रहे।
‘अभी कड़े फैसले लो‘
नीलकंठ मिश्रा की सिफारिशों में पर्यटन और सेवा क्षेत्र के सुधार खास तौर पर उभरे। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधात्मक जोनिंग और फ्लोर स्पेस नियमों की वजह से भारत में “दुनिया का सबसे महंगा पर्यटन” है। होटलों के लिए एफएसआई यानी फ्लोर स्पेस इंडेक्स में ढील और शहरी क्षमता बढ़ाने से लागत घटेगी, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर रोजगार बनेगा। उन्होंने कहा,”हम सख्त कदम तभी उठाते हैं जब हमारे पास कोई और रास्ता नहीं बचता, और सुधार करने का इससे अच्छा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा।”
जहां नीलकंठ मिश्रा ने आर्थिक मजबूती पर ध्यान दिया, वहीं साथी पैनलिस्ट मेजर गौरव आर्या ने सुरक्षा खतरों पर जोर दिया, आतंकी घटनाओं में बढ़ोतरी की चेतावनी दी और रक्षा खर्च बढ़ाने की वकालत की। शाह ने दोनों पहलुओं को जोड़ते हुए रेखांकित किया कि विकास, सुरक्षा और सुधार अब अलग-अलग बातचीत के विषय नहीं रहे।
सीज़फायर कुछ वक्त के लिए राहत जरूर दे सकता है, लेकिन नीलकंठ मिश्रा का कहना था कि इससे ढिलाई नहीं आनी चाहिए। उन्होंने कहा, “यह दौर गुजर जाएगा। सवाल यह है कि क्या हम इसका इस्तेमाल करते हैं।”


