
भूल-चूक
हर इंसान अनुभव से समझदार बनता है और विचारों से परिपक्व। इसी मंथन से एक शब्द का जन्म होता है – ‘भूल-चूक’।
ऐसा एक भी इंसान नहीं, जिससे कभी भूल-चूक न हुई हो। गलती होना स्वाभाविक है। तभी तो हम कहते हैं, “गलती हुई है, पर इसे दोहराना मत।”
पर क्या आपने सोचा है, यही छोटी-सी लगने वाली भूल-चूक हमारा पूरा भविष्य बदल सकती है? जी हाँ, बदल सकती है!
जब हमसे गलती होती है, तो पहले खुद पर अफसोस होता है। ऐसे कठिन क्षण हर किसी के जीवन में आते हैं, पर हमें उन क्षणों का भी आभार मानना चाहिए। क्योंकि अगर गलती होगी ही नहीं, तो हम परखे कैसे जाएँगे? कठिन परिस्थिति में जीने की क्षमता वहीं से तो आती है।
इन्हीं क्षणों में इंसान ऊँची उड़ान भरना सीखता है। भूल-चूक के बाद ही सच्ची प्रगति होती है, क्योंकि वही तो हमें आगे बढ़ने का मौका देती है।
भूल-चूक के बाद हमारे पास दो ही सच्चे रास्ते होते हैं — जिसे तुमने दुख पहुँचाया है, पहले उससे माफी माँग लो, और जिसने तुम्हें दुख पहुँचाया है, उसे तुम माफ कर दो! यही दो बातें इंसान को बड़ा बनाती हैं।
भूल-चूक दुश्मन नहीं, बल्कि हमारी सबसे अच्छी शिक्षक है। जो अपनी गलती को छुपाता है, वह वहीं रुक जाता है, पर जो अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है, वह जीवन में सबसे आगे निकल जाता है।
कभी-कभी हमें जगाने के लिए ईश्वर स्वयं नहीं आते, वे किसी दूसरे व्यक्ति के रूप में आते हैं। जो हमें कठोर बोलता है, हम पर गुस्सा करता है, कई बार उसी की वजह से हमारा भविष्य उज्ज्वल होता है।
अगर सामने वाले से सच में कोई भूल हुई है, तो उसे विनम्रता से जरूर कहिए कि, “तुम गलत हो!” आपके सच कहने से उसके भीतर सुधार की एक नई शुरुआत हो सकती है।
पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कितना भी समझाओ, वे समझना ही नहीं चाहते। ऐसे में क्या करें? उनके कहे हुए सच में भी अगर कोई अच्छाई है, तो उसे अपने भीतर बो लेना चाहिए। अपना अच्छा कहना कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
क्योंकि हमारे अच्छे व्यवहार से ही एक दिन भूल करने वाला व्यक्ति भी वह गलती करना खुद-ब-खुद बंद कर देगा।
इंसान के ४ प्रकार होते हैं :
१) जिसके हाथों अचानक भूल हो जाती है।
२) जो कहता है, “मैं जानबूझकर गलती नहीं करता।”
३) जो कहता है, “मैं जैसा हूँ, वैसा ही ठीक हूँ।”
४) जो कहता है, “मुझे खुद को भी बदलना है और मैं दूसरे में भी बदलाव ला सकता हूँ।”
अंत में इतना ही कि, भूल-चूक होनी चाहिए, पर जानबूझकर नहीं। क्योंकि अनजाने में हुई भूल से ही हम सीखते हैं और तभी पता चलता है कि इंसान कितनी ऊँची उड़ान भर सकता है.
©®@सौ.भाग्यश्री दायमा(दाधीच)पुणे, महाराष्ट्र.





