असहमति की मर्यादा, राष्ट्रीय अस्मिता और संवाद की संस्कृति
(अम्बरीष प्रजापति स्वतंत्र पत्रकार ) भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी नींव अहिंसा, संवाद, संविधान और वैचारिक बहुलता पर टिकी हुई है। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने हर नागरिक को अपनी बात कहने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से खड़े होने की पूरी स्वतंत्रता दी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में युवा शक्ति ने रचनात्मक और शांतिपूर्ण मार्ग अपनाया है, तब-तब राष्ट्र ने नई ऊंचाइयों को छुआ है। छात्र देश का भविष्य हैं और उनकी ऊर्जा, उनकी जिज्ञासा तथा उनका असंतोष व्यवस्था को सुधारने का एक बड़ा माध्यम होता है। लेकिन जब यही छात्र शक्ति अपनी वैचारिक दिशा से भटककर हिंसा, तोड़फोड़ और अराजकता को महिमामंडित करने लगती है, तो यह न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
20 जून को दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक मामले को लेकर धरना प्रदर्शन शुरू किया। धरना प्रदर्शन स्थल पर अलग अलग विपक्षी दलों के नेता गए, अलग अलग विचारधारा के लोग गए। सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद कूच किया। संसद कूच के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा जिस प्रकार पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश की घटनाओं के उदाहरण दिए जा रहे हैं और जिस भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह बेहद आपत्तिजनक और खतरनाक है। यह समझना आवश्यक है कि लोकतांत्रिक विरोध और अराजकता के बीच एक बहुत बारीक लेकिन स्पष्ट रेखा होती है। नेपाल या बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल, वहां के राष्ट्रपति भवन या संसद भवनों को आग के हवाले करने जैसी घटनाओं को यदि भारत का कोई युवा अपना आदर्श मानता है या उन्हें प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करता है, तो यह केवल भटकाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा पर सीधा प्रहार है। भारत की संसद और संवैधानिक इमारतें किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों के सपनों, उनके बलिदानों और उनके लोकतांत्रिक गौरव का प्रतीक हैं। इन प्रतीकों को जलाने या नष्ट करने की वकालत करना किसी भी स्थिति में देशभक्त छात्र का आचरण नहीं हो सकता।
छात्रों के जायज मुद्दों को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आज का युवा यदि परीक्षाओं के समय पर न होने, पेपर लीक होने की समस्याओं या रोजगार के अवसरों को लेकर चिंतित है, तो उसकी चिंताएं पूरी तरह से जायज हैं। एक सुदृढ़ और पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था की मांग करना हर छात्र का लोकतांत्रिक अधिकार है। संसद मार्च के प्रदर्शन में क्या नीट पेपर लीक पीड़ित छात्र थे? और अगर वास्तव में पीड़ित छात्र ही थे तो उनके ऊपर किसी भी प्रकार का बल प्रयोग, लाठीचार्ज या आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल करना पूरी तरह से निंदनीय है। जब छात्र अपनी पढ़ाई और भविष्य की सुरक्षा के लिए शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर उतरते हैं, तो सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह उनके साथ संवाद स्थापित करे, उनकी समस्याओं का समाधान निकाले और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक दल बनते और बिगड़ते हैं, लेकिन यह देश और इसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं अमर रहनी चाहिए। राष्ट्र सर्वोपरि है और भारत सबसे पहले है। इस मूल भावना से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रदर्शन में लगभग 118 पुलिसकर्मी और लगभग 70 आंदोलनकारी घायल हुए है। कई के गंभीर चोटें भी आई है। क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन ऐसे ही होते है? क्या इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कहा जाएगा? यहीं पर यह सवाल भी उतना ही प्रासंगिक हो जाता है कि क्या इस आंदोलन की आड़ में कुछ असामाजिक तत्व या वैचारिक रूप से भटके हुए तत्व या कुछ राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेकने की कोशिश कर रहे हैं। यदि प्रदर्शन के दौरान कुछ युवा नेपाल और बांग्लादेश जैसी हिंसक क्रांतियों को भारत में दोहराने की धमकी देते हैं या उनका समर्थन करते हैं, तो ऐसे तत्वों की पहचान करना और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करना समय की सबसे बड़ी मांग है। चाहे वे किसी भी छात्र संगठन से जुड़े हों, किसी भी राजनीतिक दल—चाहे वह कांग्रेस हो, सपा, आप पार्टी हो या कोई अन्य दल के प्रभाव में हों, कानून के सामने सभी बराबर होने चाहिए। जो चेहरे और वीडियो आज सार्वजनिक पटल पर आ रहे हैं, जिनमें देश की संसद और लोकतांत्रिक व्यवस्था को जलाने या वैसी ही अराजकता फैलाने के उपदेश दिए जा रहे हैं, सरकार को पूरी पारदर्शिता के साथ यह स्पष्ट करना होगा कि ऐसे लोगों के विरुद्ध क्या कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
यदि ऐसे राष्ट्रविरोधी बयानों और हिंसा के समर्थकों के खिलाफ समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तो यह शासन की कमजोरी माना जाएगा। लोकतंत्र सहनशीलता की प्रेरणा देता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कोई व्यक्ति या समूह देश की संप्रभुता और कानून व्यवस्था को चुनौती देने की खुली छूट पा ले। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी को भी देश में आग लगाने या विदेशी हिंसक उदाहरणों के जरिए यहां अराजकता फैलाने का लाइसेंस नहीं देता। दुनिया भर में भारत की पहचान एक परिपक्व, शांतिप्रिय और मजबूत लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में है। हमारे युवाओं को यह समझना होगा कि पश्चिमी या पड़ोसी देशों की उथल-पुथल हमारे देश की राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती। भारत के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संविधान प्रदत्त कानूनी और लोकतांत्रिक रास्ते मौजूद हैं।
आज के इस परिप्रेक्ष्य में महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन और उनके विचार प्रासंगिक हो जाते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि समाज और राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब मनुष्य के भौतिक विकास के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक और नैतिक चेतना भी सुरक्षित रहे। उनका ‘एकात्म मानव दर्शन’ व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमेश्वर के बीच एक समन्वय स्थापित करता है, जिसमें विरोध या संघर्ष की जगह परस्पर पूरकता और सहयोग का भाव होता है। आज के युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि पाश्चत्य या विदेशी अराजक प्रवृत्तियों का अनुकरण करने के बजाय हमें अपनी स्वदेशी और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करना चाहिए। दीनदयाल जी हमेशा इस बात के पक्षधर थे कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और विकास पहुँचे, और इसके लिए लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर ही रचनात्मक संवाद का मार्ग अपनाया जाना चाहिए। हिंसा और तोड़फोड़ से कभी किसी स्थायी समाधान की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि यह राष्ट्र की एकता और उसकी अंतरात्मा को खंडित करती है।
इस समूची स्थिति से निपटने और लोकतांत्रिक मूल्यों को अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि देश में जब भी कोई बड़ा आंदोलन या प्रदर्शन हो, तब सरकार और समाज के बीच की खाई को पाटने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। हर आंदोलन के समय सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने के लिए एक उच्चस्तरीय और विश्वसनीय समिति का गठन किया जाना चाहिए। इस समिति के स्वरूप में संतुलन और निष्पक्षता का विशेष ध्यान रखा जाए, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों का एक-एक प्रतिनिधि शामिल हो, ताकि यह पूरी प्रक्रिया दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित का विषय बने। इसके साथ ही, समिति में समाज के किसी प्रतिष्ठित सामाजिक संगठन के व्यक्ति को भी जगह मिलनी चाहिए। यदि आंदोलन शिक्षा से संबंधित है, तो उस समिति में किसी प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान के विशेषज्ञ या सदस्य को शामिल किया जाए, और यदि मामला किसानों, श्रमिकों या किसी अन्य विशिष्ट समस्या से जुड़ा है, तो उस विशेष क्षेत्र के जानकार या प्रभावित वर्ग के प्रतिनिधियों को उस समिति का सदस्य बनाकर बातचीत के लिए भेजा जाना चाहिए।
संवाद एक बेहद स्वस्थ और सशक्त परंपरा है, जिसके माध्यम से बड़े से बड़े जटिल और उलझे हुए मसलों को शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जा सकता है। जब सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद के द्वार बंद होते हैं, तभी अविश्वास बढ़ता है और कुछ असामाजिक तत्व उसका फायदा उठाकर नेपाल या बांग्लादेश जैसी हिंसक घटनाओं के भ्रामक उदाहरण देने का दुस्साहस करते हैं। संवादहीनता को समाप्त कर यदि समय रहते सार्थक चर्चा की जाए, तो युवाओं के असंतोष को सकारात्मक दिशा दी जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, समाज और शैक्षणिक संस्थान मिलकर एक ऐसा स्वस्थ वातावरण तैयार करें जहां संवाद की निरंतरता बनी रहे। छात्रों की समस्याओं का त्वरित और पारदर्शी समाधान हो ताकि किसी भी बाहरी या अराजक तत्व को युवाओं की भावनाओं का दोहन करने का मौका न मिल सके। राष्ट्र निर्माण का मार्ग ईंट-पत्थर तोड़ने या संसद भवन जलाने से नहीं, बल्कि वैचारिक परिपक्वता, कड़ी मेहनत और संवैधानिक दायरे में रहकर संघर्ष करने से प्रशस्त होता है। सरकार की यह दोहरी जिम्मेदारी है कि वह एक तरफ तो अपने भविष्य यानी छात्रों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी दे, और दूसरी तरफ देश की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी भटके हुए तत्व को बख्शे नहीं। तभी हमारा लोकतंत्र और हमारा भविष्य दोनों सुरक्षित रह सकेंगे।