
(दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई)
बालक भीम राव का डॉ आंबेडकर होने से लेकर बाबा साहब रूपी राष्ट्ररक्षक कवच में ढलना ऐसी परिघटना है जो सबके जीवन में नहीं घटती। यदि घटती तो यंत्रणा को झेलना सबके बस की बात नहीं। इस महामानव के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में और खुद बाबा साहेब की नजर से देखना जरूरी है। डॉ भीमराव आंबेडकर का जन्म महार नाम की कथाकथित अस्पृश्य जाति में राम जी सकपाल के घर में हुआ। राम जी सकपाल सेना में सूबेदार थे। 14 भाई बहनों में सबसे छोटे भीमराव का जीवन अत्यंत कष्ट एवं संघर्षमय रहा। भीमराव मैट्रिक पास करने वाले अपनी जाति के पहले छात्र थे। भीमराव की इस सफलता में बहुत सकारात्मक सहयोग उनके एक ब्राह्मण अध्यापक का रहा। जिनका उपनाम आंबेडकर था।
भीमराव के एक और अध्यापक कृष्णा केलुस्कर ने भीमराव को भगवान बुद्ध की एक छोटी जीवनी पढ़ने को दी थी। भीमराव के जीवन पर इस पुस्तक और केलुस्कर का गहरा प्रभाव पड़ा। केलुसकर ही भीमराव को बड़ौदा के राजा के पास लेकर गए और उनको छात्रवृत्ति दिलाई। मुंबई यूनिवर्सिटी से उन्होंने अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान लेकर 1912 में स्नातक किया। वे बड़े अर्थशास्त्री थे। कोलंबिया यूनिवर्सिटी से उन्होंने स्नाकोत्तर की पढ़ाई की। यहीं से उन्होंने पीएचडी की और डीएससी किया। यह सारी उपलब्धियां उनकी अर्थशास्त्र में है।
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का उल्लेख सामाजिक न्याय के महान योद्धा के रूप में किया जा सकता है। वैसे उनके नाम के साथ अनेक विशेषण लगते हैं। जैसे भारतीय संविधान के शिल्पकार, समता के प्रवर्तक, अस्पृश्यता रूढ़ी के नाशक, धम्म प्रवर्तक आदि। ये सारे विशेषण उनके जीवन के विराट व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करते हैं। बाबा साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व के सारे विशेषण के भाव सामाजिक न्याय शब्द में समाहित है। अस्पृश्यता की रूढ़ि अन्याय कारक हैं। यह समाप्त हो जानी चाहिए। समता के लिए संवैधानिक और सामाजिक व्यवस्था होनी चाहिए। जातिभेद अस्पृश्यता के पीछे धर्म मानता खड़ी करना अधर्म हैं। उसे समाप्त करना चाहिए। ऐसे सारे विषय सामाजिक न्याय शब्द में निहित है। सामाजिक न्याय और राष्ट्रीयता एक दूसरे के पूरक है। इसलिए पूज्य बाबा साहब आंबेडकर आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता के शिल्पकार के रूप में हैं। राष्ट्र का अर्थ है जन, भूमि और संस्कृति। जन, भूमि के आधार पर संस्कृति का विकास होता है। यह संस्कृति राष्ट्र को जोड़ने का काम करती है। बाबा साहब मानते थे। कि एक राष्ट्र को खड़ा होने के लिए संस्कृति के साथ-साथ सांस्कृतिक एकता और सामाजिक एकता का भी बहुत बड़ा महत्व है। अगर हम डॉक्टर बाबा साहब के राष्ट्र चिंतन का विश्लेषण करें, तो हिन्दू समाज पर विचार करना आवश्यक है। इतना ही नहीं हिंन्दू समाज में अगर कुछ सुधार नहीं हो पाया। और आवश्यक परिवर्तन समाज में नहीं हुआ, तो देश कमजोर बना रहेगा। बाबासाहेब को इसका ख्याल था। इसलिए बाबासाहेब हिन्दू समाज में सुधार के लिए निरंतर प्रयास कर रहे थे। आंबेडकर का वृहद चिंतन संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने के लिए जीवंत पर्यंत प्रयास किया। साथ-साथ पत्रकारिता डॉ बाबासाहेब के जीवन का एक ऐसा पक्ष है। जिसकी कभी ज्यादा चर्चा नहीं होती। लेकिन बतौर निष्ठावान पत्रकार उनकी लेखनी ने चार दशक तक समाज को राह दिखाई। स्याही के माध्यम से सिद्धांतों के लिए संघर्ष की यह यात्रा अपने आप में अनोखी है। मूकनायक, बहिष्कृत भारत, जनता, प्रबुद्ध भारत, आदि समाचार पत्रों द्वारा समाज और राष्ट्र की 36 वर्षों तक सेवा की। श्रम मंत्री के रूप में बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर 1942-1946 ने भारतीय श्रमिक वर्ग के लिए ऐतिहासिक योगदान दिया, जिसमें कार्य के घंटे 14 से घटाकर 8 करना, न्यूनतम मजदूरी, समान कार्य के लिए समान वेतन, महिला मातृत्व लाभ, और भविष्य निधि (PF) जैसे क्रांतिकारी सुधार शामिल थे। उन्होंने 25 से अधिक श्रम कानूनों की नींव रखी।
महिलाओं को बराबरी के अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने सन 1951 में संसद में हिन्दू कोड बिल पेश किया। हालांकि जिस दृढ़ता से इस बिल को आंबेडकर ने बतौर कानून मंत्री के रूप में पेश किया। उतनी ही शिद्दत से इसका विरोध भी हुआ। यह बिल पास नहीं हो सका। जिसके कारण डॉक्टर आंबेडकर ने त्यागपत्र दे दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में डॉक्टर बाबासाहेब के मन में बहुत जिज्ञासा थी। वह संघ के शिविर में भी गए और अस्पृश्यता का कोई नामोनिशान न देखकर प्रसन्न हुए थे। उन्होंने प्रश्न किया कि इसमें अस्पृश्य समाज के कितने स्वयंसेवक है ? उन्हें उत्तर दिया गया कि इसमें न कोई स्वर्ण है, और न कोई अस्पृश्य। जो है, वे सिर्फ हिन्दू हैं। बाबासाहेब के लिए यह अनुभव अनूठा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समस्त स्वयंसेवक एकात्मता के स्रोत में ( ठकरो: भीमरावश्र, फुले नारायणो गुरु:) हर दिन उनका स्मरण करते हैं। डॉक्टर आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों की नाराजगी को कम्युनिज्म के चंगुल में पड़ने से बचा लिया था। डॉ आंबेडकर (महाराष्ट्र में) कराड की भवानी शाखा और दापोली की शाखा में भी गए। 1948 में जब संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था। तो पूज्य श्री गुरुजी डॉक्टर आंबेडकर जी को मिले थे। उनके सामने वस्तु स्थिति रखी और संघ पर से प्रतिबंध हटा तो पूज्य श्री गुरु जी ने उनको कृतज्ञता पत्र भेजा था।
डॉ आंबेडकर का दृढ मत ताकि भाईचारे से सामाजिकता मजबूत होती है और प्रत्येक व्यक्ति में ऐसा प्रभावशाली लगाव पैदा होता है जिससे वह दूसरों के कल्याण के बारे में सोचता है जहां लोग दूसरों के साथ सहानुभूति की संपूर्णता का अनुभव नहीं करते उनके आचरण में समरसता असंभव होती है। संविधान में हिन्दू की व्याख्या करते समय उन्होंने जो परिभाषा दी है। उसमें वैदिक मत, शैव, वैष्णव, जैन इत्यादि को सम्मिलित कर हिन्दू समाज की व्यापकता का संदेश दिया। बाबासाहेब अखंड भारत के समर्थक थे। उन्होंने पाकिस्तान के निर्णय का पुरजोर विरोध किया। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक शब्दों के भ्रम को दूर कर सटीक शब्दावली स्थापित करना चाहते थे। डॉ भीमराव आंबेडकर को विदेशी धर्मावलंबियों ने अपनी और आकर्षित करने का भरपूर प्रयास किया। परंतु बाबा साहेब का मत था। कि भारतीय मूल से उत्पन्न पंथ और मत में ही रहेंगे। जिन मत और पंथ की आस्था विदेशी धरती के केंद्र है। उनमें शामिल होकर मेरी आस्था मां भारती के प्रति कमजोर नहीं करूंगा। हिन्दू धर्म की कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने आवाज उठकर समाज का ध्यानाकर्षण उन कुरीतियों की ओर किया और भगवान बुद्ध की शरण में गए।





