ग्राम स्वराज की भावना या पद और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन?
दिव्यराष्ट्र के लिए लेखा राम विश्नोई जोधपुर
भारत में पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना का मूल उद्देश्य गांवों में लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ाना और सत्ता का विकेंद्रीकरण करना था। महात्मा गांधी की ग्राम स्वराज की कल्पना भी इसी भावना पर आधारित थी कि गांव अपने विकास के निर्णय स्वयं करें और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से हो। सरपंच और पंच केवल जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के विकास और सामाजिक नेतृत्व की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था के प्रथम स्तर यानी ग्राम पंचायतों के चुनाव के दो चरण संपन्न हो चुके हैं। सरपंच और पंच दोनों स्तरों के परिणाम भी घोषित हो चुके हैं। अब गांवों को अपने नए प्रतिनिधि मिल गए हैं। लेकिन चुनाव परिणामों के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो और रील समाज की बदलती मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
कहीं विजय के तुरंत बाद गाड़ी पर सरपंच की प्लेट लगवाने की होड़ है, तो कहीं समर्थकों के काफिले के साथ पद का प्रदर्शन किया जा रहा है। कुछ लोगों के लिए चुनाव जीतना मानो गांव की सेवा का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक हैसियत और रुतबा दिखाने का प्रमाणपत्र बन गया है। ऐसा लगता है कि गांव का विकास बाद में होगा, पहले गाड़ी की पहचान बदलना जरूरी है!
*पद मिला है या रुतबा दिखाने का लाइसेंस?*
विडंबना देखिए कि जिस पद की कल्पना गांव के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के लिए की गई थी, उसे कुछ लोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम समझने लगे हैं। गाड़ी पर सरपंच लिखवाने की जल्दी है, लेकिन गांव की टूटी सड़कों, पेयजल की समस्या, विद्यालयों की स्थिति और किसानों की परेशानियों पर चर्चा के लिए समय नहीं है।
क्या सरपंच की प्लेट लगते ही गांव का विकास शुरू हो जाएगा? क्या समर्थकों के काफिले से गांव की समस्याएं समाप्त हो जाएंगी? क्या पदनाम का प्रदर्शन जनता के प्रति जवाबदेही का विकल्प बन सकता है?
चिंता का एक और गंभीर पक्ष चुनावी माहौल में बड़े स्तर पर अफीम और शराब के प्रयोग तथा इनके माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित करने की प्रवृत्ति है। चुनावी जीत के जश्न में नशे का प्रदर्शन, हुड़दंग और शक्ति प्रदर्शन आखिर समाज को क्या संदेश दे रहे हैं? जिस नेतृत्व से युवा पीढ़ी को संयम, सामाजिक जिम्मेदारी और सकारात्मक आचरण की प्रेरणा मिलनी चाहिए, यदि वही नशे को प्रतिष्ठा का विषय बनाएगा तो सामाजिक आदर्शों की स्थिति क्या होगी?
*मतदाता भी करें आत्ममंथन*
सवाल केवल प्रत्याशियों से नहीं, मतदाताओं से भी है। हम किस आधार पर अपना प्रतिनिधि चुन रहे हैं? उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक प्रभाव, जातीय पहचान और चुनावी खर्च देखकर या उसके चरित्र, व्यवहार और गांव के विकास की दृष्टि देखकर?
यदि चुनाव में धनबल, नशा, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत प्रभाव योग्य नेतृत्व से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएं, तो चुनाव परिणामों से विकास की अपेक्षा करना अपने आप में विरोधाभास है। लोकतंत्र में मतदाता की जिम्मेदारी मतदान करने तक सीमित नहीं है। उसे अपने प्रतिनिधि के कार्यों पर नजर रखनी चाहिए और ग्रामसभा में सक्रिय सहभागिता निभानी चाहिए।
*गांव का नेतृत्व समाज का आदर्श बने*
सरपंच गांव का मालिक नहीं, बल्कि जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि और सेवक है। उसका दायित्व गांव में सामाजिक समरसता बढ़ाना, आपसी विवादों का समाधान करना, सभी वर्गों को साथ लेकर चलना और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक पहुंचाना है। गांव के बच्चे और युवा अपने जनप्रतिनिधियों के व्यवहार से भी सीखते हैं। इसलिए सरपंच का आचरण केवल व्यक्तिगत विषय नहीं, सामाजिक विषय है। उसे नशामुक्त वातावरण, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक विकास का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
पांच वर्ष बाद जनता गाड़ी पर लगी प्लेट नहीं देखेगी, बल्कि यह पूछेगी कि कितनी सड़कें बनीं, पेयजल की समस्या कितनी दूर हुई, कितने जरूरतमंद परिवारों को योजनाओं का लाभ मिला और ग्रामसभा में कितनी पारदर्शिता रही।
सवाल केवल सरपंच की प्लेट का नहीं, हमारी सामाजिक सोच का है। पंचायत चुनाव गांव के भविष्य और सामाजिक नेतृत्व की दिशा तय करने का अवसर हैं। सरपंच की प्लेट कुछ मिनटों में लग जाती है, लेकिन जनता का विश्वास अर्जित करने में पूरा कार्यकाल लग जाता है। लोकतंत्र में पद से बड़ा दायित्व और रुतबे से बड़ा जनविश्वास होता है। सरपंच की वास्तविक पहचान उसकी गाड़ी पर लिखे पदनाम से नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर आई संतुष्टि से होनी चाहिए। पंचायत राज व्यवस्था तभी सार्थक होगी, जब पद प्रदर्शन का नहीं, सेवा और जिम्मेदारी का माध्यम बनेगा।