विपक्ष ने की जवाबदेही और सुधार की मांग
दिव्य राष्ट्र के लाई अम्बरीश प्रजापत*। नई दिल्ली। मतदाता सूची पुनरीक्षण और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर है। हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणियों के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
अदालत ने मतदाता सूची से नाम काटे जाने और फॉर्म-8 के कथित स्वतः निरस्त होने जैसी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश कानून से चलेगा, न कि सॉफ्टवेयर या प्रशासनिक सुविधानुसार। इसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर विपक्ष ने कई प्रश्न उठाए हैं।
मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए विपक्ष का दावा है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसके चलते चुनाव आयोग पर निष्पक्षता को लेकर संदेह गहरा गया है। विपक्ष का आरोप है कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद से चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।
इस मुद्दे पर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, पुरानी मतदाता सूची बहाल करने तथा बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग उठाई है। गांधी जयंती के अवसर पर दिल्ली में विभिन्न विपक्षी दलों ने विरोध प्रदर्शन भी किया।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग पर आरोपों का इतिहास नया नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से विभिन्न राजनीतिक दल समय-समय पर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। सत्ता में रहते हुए आयोग की प्रशंसा और विपक्ष में आने पर उसी संस्था की आलोचना भारतीय राजनीति का एक स्थापित पैटर्न माना जाता रहा है।
दूसरी ओर, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया, तकनीकी खामियों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर उठ रहे कुछ सवालों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हाल के न्यायिक हस्तक्षेपों ने आयोग की जवाबदेही और पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है।
लेख में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग को जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए प्रभावित मतदाताओं को स्पष्ट कारण बताने, अपील की पर्याप्त व्यवस्था देने, सत्यापन योग्य आंकड़े सार्वजनिक करने, राजनीतिक दलों से संवाद बढ़ाने और तकनीक के उपयोग में अधिक पारदर्शिता अपनाने जैसे कदम उठाने चाहिए।
चुनाव आयोग पर लग रहे आरोपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच सबसे बड़ी चुनौती लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को बनाए रखना है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही ही चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकती है।