नई दिल्ली ,दिव्य राष्ट्र: भारत के अर्बन कोऑपरेटिव बैंक ( यूसीबीएस ) एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञ और आरबीआई के पूर्व सहायक महाप्रबंधक डॉ. राजीव उबेरॉय का मानना है कि नेशनल अर्बन को-ऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन *NUCFDC देश के सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बड़े परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।*
डॉ. उबेरॉय ने कहा है कि अर्बन कोऑपरेटिव बैंक वर्षों से स्थानीय व्यापारियों, पेशेवरों, छोटे उद्यमियों और वेतनभोगी वर्ग की वित्तीय जरूरतों को समझते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। हालांकि, तकनीक, साइबर सुरक्षा, नियामकीय अनुपालन, जोखिम प्रबंधन और कुशल मानव संसाधनों की बढ़ती लागत के कारण छोटे बैंकों के लिए प्रतिस्पर्धी बने रहना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
NUCFDC देगा तकनीकी और संचालन संबंधी मजबूती
फरवरी 2024 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अर्बन कोऑपरेटिव बैंकों के लिए अम्ब्रेला संगठन के रूप में पंजीकृत NUCFDC का उद्देश्य छोटे बैंकों को सामूहिक रूप से आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इससे उन्हें महंगी तकनीक और विशेषज्ञ सेवाओं तक आसान पहुंच मिल सकेगी।
डॉ. उबेरॉय के अनुसार, अलग-अलग बैंक यदि स्वयं तकनीकी ढांचा विकसित करने की बजाय साझा प्लेटफॉर्म का उपयोग करें तो लागत कम होगी और दक्षता बढ़ेगी। इसी सोच के तहत सहकार क्लाउड, सहकार डिजीपे, सहकार डिजीलोन और सहकार CBS जैसी पहलें शुरू की गई हैं।
“बैंक इन अ बॉक्स” से मिलेगा डिजिटल बैंकिंग का नया मॉडल
लेख में बताया गया है कि हाल ही में शुरू की गई “बैंक इन अ बॉक्स” अवधारणा के जरिए कोर बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, क्लाउड और अनुपालन सेवाओं को एकीकृत एवं किफायती समाधान के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। इससे छोटे सहकारी बैंक भी उन्नत तकनीकी मानकों के साथ ग्राहकों को बेहतर सेवाएं दे सकेंगे।
साइबर सुरक्षा में भी मिलेगा बड़ा लाभ*
NUCFDC साझा साइबर सुरक्षा ढांचा विकसित कर रहा है, जिसमें सिक्योरिटी ऑपरेशन सेंटर, साइबर फॉरेंसिक, फ्रॉड मॉनिटरिंग टूल्स और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं। इससे छोटे बैंकों को वह सुरक्षा स्तर प्राप्त होगा, जिसे अकेले विकसित करना उनके लिए कठिन और महंगा होता।
सरकार, RBI और NUCFDC की संयुक्त भूमिका*
डॉ. उबेरॉय ने कहा कि सहकारिता मंत्रालय सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने के लिए नीतिगत समर्थन प्रदान कर रहा है, जबकि RBI नियामकीय और पर्यवेक्षी जिम्मेदारी निभा रहा है। NUCFDC इन दोनों के बीच सेतु बनकर बैंकों को तकनीक, कौशल और पेशेवर क्षमताएं उपलब्ध करा सकता है।
पेशेवर प्रबंधन के साथ बची रहे सहकारी पहचान
लेख में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि सहकारी बैंकों को वाणिज्यिक बैंकों की तरह बनाने के बजाय उनकी स्थानीय पहचान और सदस्य-आधारित संरचना को बनाए रखते हुए उन्हें अधिक पेशेवर और सक्षम बनाया जाना चाहिए।
डॉ. उबेरॉय का मानना है कि भविष्य का आदर्श मॉडल होगा:
“स्थानीय स्वामित्व, पेशेवर प्रबंधन, राष्ट्रीय स्तर का बुनियादी ढांचा और मजबूत नियमन।”
निष्कर्ष*
विशेषज्ञों के अनुसार यदि NUCFDC की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो यह अर्बन कोऑपरेटिव बैंकों की लागत कम करने, तकनीकी क्षमता बढ़ाने और प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे सहकारी बैंक अपनी पहचान बनाए रखते हुए अधिक सुरक्षित, आधुनिक और पेशेवर संस्थान बन सकेंगे।