(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. सीमा दाधीच)
संपूर्ण दुनियां में 10 मई को विश्व मातृ दिवस मनाया जाता है वैसे हम भारतीयों के लिए तो प्रत्येक दिन की शुरूआत मां के आशीर्वाद और मातृ वंदना से ही होती है।हर साल मई के दूसरे रविवार को मनाए जाने वाले इस दिन माताओं के त्याग, प्रेम और अथक मेहनत को याद किया जाता है। लेकिन महज फूल, कार्ड और उपहार देकर क्या हम अपनी माँओं के प्रति वास्तविक कृतज्ञता जता पाते हैं? या यह दिन भी मात्र एक व्यावसायिक उत्सव बनकर रह गया है?
भारत जैसे परिवार-केंद्रित समाज में माँ की भूमिका अतुलनीय रही है। गर्भधारण से लेकर अंतिम सांस तक, एक माँ पूरे परिवार की भावनात्मक और शारीरिक रीढ़ होती है। भारतीय संस्कृति में माँ को ‘मातृ देवो भव’ कहा गया है। रामायण हो या महाभारत, हर महाकाव्य में माताओं की पीड़ा, बलिदान और मार्गदर्शन को प्रमुखता दी गई है। आज भी लाखों ग्रामीण महिलाएँ सुबह से रात तक खेतों, घर-बार और बच्चों के बीच जुगलबंदी कर रही हैं। शहरों में कामकाजी माताएँ ऑफिस, घर और बच्चों की पढ़ाई का त्रिकोण संभाल रही हैं।
कोविड महामारी के दौरान हमने देखा कि जब स्कूल बंद थे, अस्पतालों में दबाव था, तब माताएँ ही बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाती रहीं, बुजुर्गों की देखभाल करती रहीं और कई बार परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी भी संभाली। फिर भी, आँकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं का घरेलू और देखभाल संबंधी अशुल्क कार्य कुल जीडीपी का लगभग 7-8 प्रतिशत योगदान देता है, लेकिन इसे आर्थिक रूप से कभी मापा या सम्मानित नहीं किया जाता।
मातृ दिवस पर यह सवाल उठना लाजमी है कि हम माताओं को सिर्फ एक दिन क्यों याद करते हैं? क्या सरकारी नीतियाँ, निजी क्षेत्र और समाज उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान कर पा रहा है? मातृत्व अवकाश के नियमों में सुधार हुआ है, लेकिन छोटे उद्योगों और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली करोड़ों महिलाओं तक यह सुविधा नहीं पहुँचती। कार्यस्थल पर माताओं के लिए क्रेच सुविधा, लचीला कार्य समय और समान वेतन अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
आधुनिक जीवनशैली ने परिवार की संरचना भी बदल दी है। न्यूक्लियर परिवार बढ़ रहे हैं। बुजुर्ग माताएँ अकेलेपन से जूझ रही हैं। कई शहरों में वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है, जबकि हम ‘माँ’ को देवी मानते हैं। युवा पीढ़ी स्मार्टफोन और सोशल मीडिया में व्यस्त है। माँ से बात करने का समय कम हो गया है। भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। कई माताएँ स्वयं मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से गुजर रही हैं, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी के बोझ तले इसे व्यक्त भी नहीं कर पातीं।
फिर भी आशा की किरणें भी हैं। कई संगठन ‘मदर्स डे’ को सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि जागरूकता अभियान बना रहे हैं। कुछ कंपनियाँ ‘वर्किंग मदर सपोर्ट प्रोग्राम’ चला रही हैं। स्कूलों में माताओं की भूमिका पर चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर #थैंक यू मम जैसे अभियान युवाओं को अपनी माँ से जुड़ने का मौका दे रहे हैं।
सरकार को भी चाहिए कि मातृ दिवस को सिर्फ प्रतीकात्मक न बनाए। पोषण अभियान, महिला स्वास्थ्य कार्यक्रम, शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी और कार्यस्थल पर लिंग-संवेदनशील नीतियाँ बनाकर माताओं को सशक्त किया जा सकता है। पितृत्व अवकाश को बढ़ावा देकर देखभाल की जिम्मेदारी को साझा किया जाना चाहिए, ताकि माँ अकेली न बोझ उठाएँ।
मातृ दिवस केवल माँ को धन्यवाद कहने का दिन नहीं, बल्कि स्वयं से वादा करने का दिन है। वादा कि हम उनकी सेहत का ध्यान रखेंगे, उनकी भावनाओं को समझेंगे, उनके सपनों को पूरा करने में साथ देंगे। जो माँएँ अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके लिए यह दिन यादों को संजोने और उनके दिए संस्कारों को आगे बढ़ाने का अवसर है।
आइए, इस मातृ दिवस पर सिर्फ उपहार न दें, समय दें। उनकी कहानियाँ सुनें। उनकी थकान उतारें। क्योंकि माँ का प्रेम बिना शर्त होता है, लेकिन हमारा कर्तव्य शर्तिया है — उन्हें कभी अकेला न छोड़ना।
संपादकीय टीम