
इलेक्ट्रिक ट्रकों का प्रत्यक्ष अनुभव: चालकों को पर्यावरण-अनुकूल गतिशीलता, आय की वृद्धि , स्थिर रोजगार और बेहतर जीवन की गुणवत्ता से जोड़ने में मदद कर रहा है
जयपूर, दिव्यराष्ट्र साल 2025 में राजस्थान ने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया, इसमें सरकार का मजबूत समर्थन और महत्वपूर्ण साझेदारियाँ शामिल थीं। मुख्य विकासों में इलेक्ट्रिक वाहन नीति-2022 के तहत 200 करोड़ रुपए का ई-वाहन प्रोत्साहन कोष, पीएम ई-बस सेवा योजना के अंतर्गत राज्य के आठ प्रमुख शहरों में 675 से अधिक इलेक्ट्रिक बसों का संचालन और नीमराना तहसील में राज्य का पहला इलेक्ट्रिक ई-बस निर्माण संयंत्र शामिल हैं।
हालाँकि, कई मूल स्तर के हितधारकों के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बदलाव का विचार अब तक स्पष्ट नहीं था। साल 2024 में नयी सोच की सवारी (एनएसकेएस) द्वारा राज्यभर में आयोजित कार्यक्रमों ने उन्हें इसके बारे में बुनियादी जानकारी दी। यह एक राष्ट्रीय स्तर की जागरूकता पहल है, जो ट्रक चालकों, मैकेनिकों और फ्लीट संचालकों को इलेक्ट्रिक ट्रकों के बारे में समझाने पर केंद्रित है। इस वर्ष चालकों को कार्यक्रम स्थल पर और राजमार्ग पर भी इलेक्ट्रिक ट्रक चलाने और देखने का अनुभव मिला। राजस्थान में आयोजित इन कार्यक्रमों ने हितधारकों को न केवल इलेक्ट्रिक ट्रक को करीब से देखने का मौका दिया, बल्कि यह भी समझने में मदद की कि यह तकनीक लंबे समय में उनके कामकाजी जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है।
इलेक्ट्रिक ट्रकों को संचालित करने वाली कंपनियों के साथ साझेदारी करने से बातचीत केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आय की स्थिरता, काम करने की परिस्थितियाँ और परिवार के कल्याण जैसे विषयों तक पहुँचती है।
स्विचलैब्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक अजय प्रताप सिंह कहते हैं, “स्विचलैब्स में हम लंबी अवधि के अनुबंधों के तहत तय मार्गों पर इलेक्ट्रिक ट्रक चलाते हैं, साथ ही प्रशिक्षित चालक और चार्जिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराते हैं। चूँकि मार्ग और अनुबंध स्थिर होते हैं, इसलिए काम में अधिक एकरूपता रहती है और चालकों को उन्हीं रास्तों पर प्रशिक्षण दिया जाता है जिन्हें वे पहले से जानते हैं। इलेक्ट्रिक ट्रक अधिक आरामदायक और चलाने में आसान होते हैं, और चार्जिंग केंद्रों पर विश्राम की सुविधाएँ भी होती हैं। इन सभी कारणों से चालकों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है, उन्हें बेहतर वेतन, स्थिरता और अधिक आर्थिक सुरक्षा का अनुभव मिलता है। हालाँकि, ई-ट्रकों को लेकर अभी भी कुछ गलत धारणाएँ मौजूद हैं, लेकिन ‘नयी सोच की सवारी’ जैसी पहलें इस अंतर को कम करने में मदद कर रही हैं।”
इन कार्यक्रमों में इस दृष्टिकोण ने चालकों को इलेक्ट्रिक गतिशीलता को उनकी दैनिक वास्तविकताओं से जोड़कर समझने में मदद की, जैसे निश्चित मार्ग, तय कार्यकाल, नियमित आय और अधिक स्थिर पारिवारिक जीवन की संभावना-बजाय इसके कि वे ईवी को एक दूर का या रिस्की बदलाव समझें।
चालकों ने इस दृष्टिकोण के प्रभाव को ‘चाय पे चर्चा’ के दौरान आयोजित ज्ञान सत्रों और साँप-सीढ़ी जैसे इंटरैक्टिव टूल्स के माध्यम से अनुभव किया, जिनसे ईवी से जुड़े जटिल विषयों को सरल तरीके से समझाया गया। इस प्रत्यक्ष और सहभागितापूर्ण अनुभव का असर स्पष्ट रूप से उस सर्वेक्षण में दिखाई दिया, जो जागरूकता कार्यक्रम से पहले और बाद में किया गया था। सर्वेक्षण के परिणामों में भाग लेने वाले चालकों, फ्लीट संचालकों और मैकेनिकों की सोच में उल्लेखनीय सकारात्मक बदलाव देखा गया।
सर्वेक्षण के निष्कर्षों से प्रतिभागियों में ईवी अपनाने की तैयारी में स्पष्ट और ठोस बदलाव दिखाई दिया। वास्तविक अनुभव ने इलेक्ट्रिक ट्रकों को केवल एक भविष्य की अवधारणा से निकालकर दैनिक संचालन के लिए एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। सत्रों के बाद पहाड़ी इलाकों में इलेक्ट्रिक ट्रकों के संचालन को लेकर फैली गलतफहमियों में काफी कमी आई, केवल 9% प्रतिभागी ही अब भी मानते थे कि वे ऐसे क्षेत्रों में काम नहीं कर सकते। स्पीड, एक्सेलरेशन, पॉवर और टॉर्क से जुड़ी चिंताएँ भी प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से काफी हद तक दूर हो गईं, और केवल 2% फ्लीट संचालकों के मन में ही कुछ संदेह शेष रहे। विशेष रूप से, उन चालकों का प्रतिशत जो मानते थे कि इलेक्ट्रिक ट्रक डीज़ल मॉडलों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, 61% से बढ़कर 88% हो गया।






