डॉ. रमाकांत शर्मा (मुख्य चिकित्सा अधिकारी, नवनीत प्राकृतिक योग चिकित्सा धाम, बस्सी, जयपुर)
मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी का अभाव नहीं, बल्कि शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक एवं सामाजिक कल्याण की अवस्था है: डॉ. रमाकांत शर्मा
- आधुनिक जीवनशैली, बढ़ती अपेक्षाएँ और दूसरों से आगे निकलने की होड़ बन रहे हैं मानसिक तनाव के प्रमुख कारण
आज के दौर में मानसिक स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय बनकर उभर रहा है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, दूसरों से आगे निकलने की होड़ और अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव व्यक्ति के मानसिक एवं भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। इसका असर केवल मन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक व्यवहार पर भी पड़ सकता है। मानसिक स्वास्थ्य की वास्तविक अवधारणा, तनाव के कारणों और स्वस्थ जीवनशैली के महत्व को समझने के लिए विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर हमारे वरिष्ठ संवाददाता तरुण भारत वधवा की डॉ. रमाकांत शर्मा (मुख्य चिकित्सा अधिकारी नवनीत प्राकृतिक योग चिकित्सा धाम बस्सी जयपुर) से विशेष बातचीत।
प्रश्न: मानसिक स्वास्थ्य वास्तव में क्या है? क्या इसका अर्थ केवल मानसिक बीमारी का न होना है?
डॉ. रमाकांत शर्मा: मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी की अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखना चाहिए। स्वास्थ्य की व्यापक अवधारणा के अनुसार, यह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था है, न कि केवल बीमारी या दुर्बलता का अभाव। मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थिति, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपनी भावनाओं को समझ सके, परिस्थितियों का सामना कर सके, उचित निर्णय ले सके और अपने दैनिक जीवन को संतुलित ढंग से जी सके।
प्रश्न: मानसिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक स्वास्थ्य में क्या अंतर है?
डॉ. शर्मा: आम बोलचाल में लोग मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर मस्तिष्क की बीमारी या मानसिक अस्वस्थता से जोड़ देते हैं, जबकि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य का संबंध हमारे मन, सोच, विचारों, व्यवहार और परिस्थितियों को समझने की क्षमता से है। वहीं, भावनात्मक स्वास्थ्य का संबंध अपनी भावनाओं को पहचानने, व्यक्त करने और उन्हें संतुलित ढंग से संभालने से है। ये दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इसी प्रकार, सामाजिक स्वास्थ्य का संबंध हमारे पारिवारिक, व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों से है।
प्रश्न: आजकल असंतुष्टि और चिंता इतनी अधिक क्यों दिखाई देती है?
डॉ. शर्मा: असंतुष्टि का एक प्रमुख कारण हमारी अपेक्षाओं और वास्तविकता के बीच का अंतर है। उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी को परीक्षा में 100 में से 90 अंक मिलने की उम्मीद हो, लेकिन उसे 70 अंक मिलें, तो वह निराश हो सकता है। समस्या लक्ष्य निर्धारित करने में नहीं, बल्कि किसी एक लक्ष्य या परिणाम से अत्यधिक जुड़ जाने में है। जीवन में लक्ष्य होना आवश्यक है, लेकिन किसी एक परिणाम को अपनी खुशी, आत्मसम्मान और सफलता का एकमात्र आधार बना लेना उचित नहीं है। अपेक्षाएँ पूरी न होने पर निराशा होना स्वाभाविक है, लेकिन उससे उबरकर आगे बढ़ने की क्षमता विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।

प्रश्न: क्या दूसरों से आगे निकलने की होड़ भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है?
डॉ. शर्मा: निश्चित रूप से। आधुनिक जीवनशैली में प्रतिस्पर्धा और दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यदि कोई व्यक्ति महंगी गाड़ी खरीदता है, तो दूसरा उससे बेहतर गाड़ी खरीदने की दौड़ में लग सकता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति, शारीरिक स्वास्थ्य, परिवार और व्यक्तिगत खुशियों तक को नजरअंदाज करने लगता है। वह लगातार अधिक पाने और दूसरों से आगे निकलने के दबाव में जीता है। ऐसी जीवनशैली तनाव और असंतोष बढ़ा सकती है तथा नींद, खानपान और शारीरिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती है।
प्रश्न: भावनात्मक असंतुलन का हमारे संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
डॉ. शर्मा: व्यक्तिगत और भावनात्मक संबंधों में संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है। कई बार व्यक्ति दूसरों से इतनी अधिक अपेक्षाएँ रखने लगता है कि सामने वाले की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सीमाएँ प्रभावित होने लगती हैं। जब अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो निराशा, नाराजगी और आपसी दूरी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, भावनाओं को पूरी तरह दबा देना भी उचित नहीं है। स्वस्थ संबंधों के लिए आपसी संवाद, विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे की व्यक्तिगत सीमाओं को स्वीकार करना जरूरी है। भावनात्मक जुड़ाव अच्छी बात है, लेकिन उसमें संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रश्न: मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए क्या केवल मेडिटेशन पर्याप्त है?
डॉ. शर्मा: ध्यान यानी मेडिटेशन उपयोगी हो सकता है, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली की नींव हमारी दैनिक आदतों पर टिकी होती है। सबसे पहले अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना चाहिए। सुबह समय पर उठना, नियमित व्यायाम करना, संतुलित भोजन लेना, समय पर खाना और रात को पर्याप्त नींद लेना महत्वपूर्ण है। काम और आराम के बीच संतुलन बनाए रखना तथा परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। इसके साथ योग, ध्यान और श्वास संबंधी अभ्यासों को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। इन आदतों को धीरे-धीरे अपनाना और नियमित रूप से जारी रखना अधिक उपयोगी होता है।
प्रश्न: मानसिक परेशानी होने पर व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
डॉ. शर्मा: अपनी परेशानियों को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना पहला कदम है। यदि लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, चिड़चिड़ापन, नींद में बदलाव या दैनिक गतिविधियों में रुचि की कमी बनी रहती है, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को कमजोरी या शर्म का विषय नहीं मानना चाहिए। परिवार और समाज को भी ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें व्यक्ति खुलकर अपनी बात कह सके और उसे आवश्यक सहयोग मिल सके।
निष्कर्ष:
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए केवल तनाव कम करने के उपाय पर्याप्त नहीं हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण, हमारी अपेक्षाएँ, भावनात्मक संतुलन और दिनचर्या भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लक्ष्य निर्धारित करना आवश्यक है, लेकिन लक्ष्य प्राप्त न होने पर स्वयं को असफल मान लेना उचित नहीं है। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान देना, स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना और रिश्तों में संतुलन बनाए रखना स्वस्थ जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
संतुलित जीवनशैली, सकारात्मक दृष्टिकोण, भावनात्मक समझ और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता—यही स्वस्थ मन और बेहतर जीवन की मजबूत नींव हैं।