जयपुर , दिव्यराष्ट्र*चुरू जिले के एक छोटे से गांव में जब घर की बड़ी बेटी की शादी हुई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह खुशी का मौका नहीं, एक गलती की शुरुआत है। लड़की नाबालिग थी, उम्र छोटी थी, लेकिन परिवार के लिए यह एक जिम्मेदारी से मुक्ति का रास्ता था। बेटी मतलब बोझ, यही सोच थी जो पीढ़ियों से इस इलाके के घरों में जड़ें जमाए बैठी थी। शादी हुई और जल्द ही वह लड़की विधवा हो गई। न बचपन मिला, न घर बसा। जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा उससे छिन गया, और परिवार देखता रहा। इतना सब देखने के बाद भी परिवार ने कोई सबक नहीं लिया क्योंकि राजस्थान में बाल विवाह कोई नई बात नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 की रिपोर्ट के अनुसार चुरू में 27.9 फीसदी बेटियों का विवाह बालिग होने से पहले ही कर दिया गया था।
सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांवों में उतनी ही मजबूती से टिकी है। अक्षय तृतीया जैसे त्योहारों पर आज भी दूरदराज के गांवों में सामूहिक बाल विवाह की खबरें आती हैं। इस सबके बीच आटा-साटा जैसी प्रथाएं इस समस्या को और उलझा देती हैं। इस परंपरा में अदला-बदली में उम्र का, पढ़ाई का, बच्चे की इच्छा का कोई हिसाब नहीं होता। रिश्ते तय होते हैं तो बच्चे भी उसी सौदे का हिस्सा बन जाते हैं।
चुरू के इस परिवार ने भी यही किया। बड़ी बेटी की तकलीफ आंखों से देखी थी, लेकिन आर्थिक तंगी और पुरानी सोच ने मिलकर उन्हें फिर उसी गलत राह पर ला खड़ा किया। आटा-साटा प्रथा के तहत एक साथ तीन शादियां तय कर दी। बड़ी बेटी की दोबारा शादी, बेटे की शादी और 16 साल की छोटी बेटी रागिनी (बदला हुआ नाम) की भी, जो उस वक्त दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी। परिवार की दलील थी कि एक साथ तीन शादियां होंगी तो खर्च कम पड़ेगा। बड़ी बेटी के साथ जो हुआ वह दुख तो था, लेकिन सबक नहीं बन सका। रागिनी के हाथों में किताबें थीं, आगे पढ़ने के इरादे थे, लेकिन घर में शादी की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं।
तभी राजस्थान महिला कल्याण मंडल के कार्यकर्ता बाल विवाह रोको अभियान के तहत उस गांव में पहुंचे। गांव में किसी ने चुपचाप उन्हें बताया, “एक घर में नाबालिग लड़की की शादी होने वाली है।” टीम ने बिना देर किए पुलिस, चाइल्ड हेल्पलाइन और बाल कल्याण समिति को सूचित किया और सभी मिलकर उस घर पहुंचे। शुरुआत में परिवार ने विरोध किया। गरीबी का हवाला दिया, परंपरा की दुहाई दी और कहा कि यह तो हमेशा से होता आया है। लेकिन टीम ने समझाने के साथ ही बाल विवाह के कानूनी प्रावधान बताए, इसके नतीजे समझाए और यह भी बताया कि इस घर की बड़ी बेटी के साथ जो हुआ, वह इसी सोच का अंजाम था। पीढ़ियों से बनी सोच की दीवार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी और आखिरकार परिवार राजी हो गया। उन्होंने लिखित में वादा किया कि रागिनी की शादी उसके बालिग होने के बाद ही होगी।
बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले देश के सबसे बड़े नागरिक समाज नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन राजस्थान महिला कल्याण मंडल के निदेशक राकेश कुमार कौशिक कहते हैं, “बाल विवाह सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं, यह एक बच्चे के पूरे भविष्य को छीन लेने का अपराध है। आटा-साटा जैसी प्रथाएं इसे और खतरनाक बनाती हैं क्योंकि इनमें बच्चे सौदे की चीज बन जाते हैं। जब तक समाज और परिवार यह नहीं समझेंगे कि बेटी बोझ नहीं बल्कि अवसर है, तब तक रागिनी जैसी लड़कियों को बचाने की लड़ाई जारी रहेगी।” रागिनी आज फिर से दसवीं में पढ़ रही है। एक ही घर में एक बेटी का बचपन नहीं बचाया जा सका, दूसरी का बच गया। फर्क बस इतना था कि इस बार कोई वक्त पर पहुंच गया। सवाल यह है कि रागिनी जैसी न जाने कितनी बेटियां आज भी चुपचाप बाट जोह रही हैं।