
स्वामी दयानंद सरस्वती का राजस्थान से रहा विशेष लगाव
-दयानंद सरस्वती की जयंती पर विशेष
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ.लोकेश कुमार चंदेल)
जयपुर दिव्यराष्ट्र*। स्वामी दयानंद सरस्वती का राजस्थान से विशेष जुडाव रहा है। उन्होंने 1865 से 1883 के बीच तीन बार भ्रमण कर आर्य समाज का राजस्थान में प्रचार प्रसार किया। उन्होंने उदयपुर में परोपकारिणी सभा (1883) की स्थापना की और अजमेर में वेदों का भाष्य किया और अंतिम सांस भी अजमेर में ही ली, जहां उनकी याद में ऋषि मेला भरता है । महान समाज सुधारक और वेदों के पुनरुद्धारक स्वामी दयानंद का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था। उनका नाम मूल शंकर तिवारी था। उन्होंने 1875 में आर्य समाज स्थापना करके वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया । आह्वान से करोड़ों की संख्या में उनके अनुयायी बन गए। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, मूर्ति पूजा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया। वे धर्म में पाखंड का विरोध करते थे। उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए अपना पूरा जीवन ही खपा दिया। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता के प्रतिक्रिया स्वरूप आर्य समाज की स्थापना की थी। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया और ‘भारत भारतीयों के लिए है’ का नारा दिया। उत्तर वैदिक काल से लेकर अब तक के सभी मत-मतान्तरों को पाखण्ड और झूठ की संज्ञा देने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा था- “पुनः वेदों की ओर लौटो।’
इनके पिता जो स्वयं वेदों के विद्वान थे । उन्होंने मूलशंकर को वैदिक वाङ्मय, न्याय दर्शन इत्यादि पढ़ाया। दयानंद की जिज्ञासा ने उन्हें योगाभ्यास इत्यादि करने पर बाध्य किया लेकिन जब उनके पिता ने इनके विवाह का प्रबन्ध किया तो 1845 में 27 वर्ष की उम्र में उन्होंने गृह त्याग दिया। वे 15 से अधिक वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहे आखिरकार 1860 में वे मथुरा पहुंचे और दण्डी स्वामी विरजानन्द जी से वेदों के शुद्ध अर्थ और वैदिक धर्म की गूढ़ शिक्षा ग्रहण की। दण्डी स्वामी विरजानन्द ने दयानंद सरस्वती को हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और अन्धविश्वासों का हटाकर देश में वैदिक धर्म-संस्कृति की पुनः स्थापना करने का आदेश दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती आजीवन अपने गुरु के इस आदेश का पालन करते रहे। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने झूठे धर्मों का खण्डन करने के लिए 1863 में पाखण्ड खण्डिनी पताका लहराई और 1875 में चैत्र नवरात्र के दिन बम्बई के गिरगांव में आर्य समाज की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य वैदिक धर्म की फिर से स्थापना करना था। उन्होंने बाल विवाह, विधवा विवाह और समाज में व्याप्त अन्य बुराइयों पर कुठाराघात किया। वे भारतीय इतिहास के पहले सुधारक थे जिन्होंने शूद्र तथा स्त्री को वेद पढ़ने, उच्च शिक्षा प्राप्त करने, यज्ञोपवीत धारण करने के लिए आन्दोलन किया। भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए आर्य समाज की शाखाएं स्थापित कर रहे थे, उस समय राजस्थान अविद्या, अन्धविश्वास, पौराणिक कर्मकाण्डों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ था। ऐसे स्थिति में वे राजस्थान को उसका प्राचीन गौरव याद दिलाने का निश्चय किया। इसके लिए वे तीन बार राजस्थान आए। पहली बार 1865 में करौली के शासक मदनपाल के आग्रह पर आए, इस दौरान उन्होंने जयपुर में कई पंडितों से शास्त्रार्थ किया और वैदिक धर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने से पीछे नहीं हटे। उनके विचारों से प्रभावित होकर अचरौल के ठाकुर रणजीत सिंह ने मूर्तिपूजा के अलावा मदिरापान का भी त्याग किया। वे दूसरी बार मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह के आग्रह पर 11 अगस्त 1882 को राजस्थान आए। उदयपुर में गुलाब बाग स्थित नौलखा महल में ठहरे। उनके सानिध्य में उदयपुर में 27 फरवरी 1883 ई. को परोपकारी सभा की स्थापना की गई। इस सभा का मुख्य उद्देश्य सोई हुई राजपूत जाति को जागृत करना और मानव जाति का धार्मिक तथा सामाजिक उद्धार करना था। इसके बाद जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह और महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के विशेष आग्रह पर वे तीसरी बार राजस्थान की भूमि पर आए। वे महाराजा के आग्रह पर मार्च 1883 में जोधपुर पहुंचे लेकिन यह उनके जीवन का आखिर दौरा साबित हुआ। क्योंकि जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह का नन्ही जान नाम की एक वेश्या से बड़ा गहरा संबंध था। वे निश्चित समय पर दरबार में पहुंचे, संयोगवश उसी समय नन्ही जान महाराजा के पास आई हुई थी। स्वामी के दरबार में पधारने का समय जानकर महाराजा उसे रवाना ही कर रहे थे, उसी समय अपने सम्मुख स्वामी दयानन्द सरस्वती को देखकर महाराजा एकदम से घबरा गए और उन्होंने नन्ही जान की पालकी को स्वयं ही कन्धा देकर उठवा दिया। इस दौरान इस स्वामी दयानन्द सरस्वती बहुत ही दुखी हुए और क्रोधित हो गए । उस दिन उन्होंने दरबार में राजधर्म का वर्णन करते हुए न केवल वेश्यागमन की निन्दा की बल्कि वेश्याएं रखने की बुराइयों का भी खुलकर विवेचन किया। इस घटना के बाद महाराजा जसवन्त सिंह जब कई दिनों तक उनसे मिलने नहीं आए तब दयानंद ने महाराजा को एक पत्र लिखा। इस पत्र में महाराजा के अवगुणों का खुलकर वर्णन किया। उन्होंने अपने दूसरे पत्र में लिखा कि एक वेश्या, जो नन्ही कहलाती है, उससे प्रेम, उससे अधिक संग और पत्नियों से न्यून प्रेम रखना आप जैसे महाराजा के लिए सर्वथा अशोभनीय है। जोधपुर महाराजा जसवन्त सिंह 17 दिन बाद से उनसे मिलने आए, जिसका कारण उन्होंने अपनी अस्वस्थता बताया। इस दौरान उनके और महाराजा जसवन्त सिंह के बीच तकरीबन 2 घण्टे तक वार्ता चली। स्वामी जी के विचारों से प्रभावित होकर जोधपुर के प्रधानमंत्री कर्नल प्रताप सिंह व रावराजा तेजसिंह आर्य समाजी बन गए। जोधपुर महाराजा ने भी उनके विचारों से प्रभावित होकर ‘नन्ही जान’ वेश्या से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए।





