
जयपुर, दिव्यराष्ट्र*: कोकून हॉस्पिटल में प्रेग्नेंसी से जुड़ी एक बेहद नाज़ुक इमरजेंसी के दौरान डॉक्टरों ने तेज़ी और समझदारी से काम करते हुए सिर्फ़ 7 मिनट में प्रेग्नेंट महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जान बचा ली। हालात बहुत गंभीर थे, लेकिन सही समय पर लिए गए फ़ैसले और बेहतरीन टीमवर्क से दोनों को सुरक्षित नया जीवन मिला। इस सफल प्रयास ने कोकून हॉस्पिटल की इमरजेंसी सेवाओं पर भरोसे को और मज़बूत किया।
यह महिला प्रेग्नेंसी के आखिरी दौर में थी और उसे अचानक प्लेसेंटा एब्रप्शन की समस्या हो गई, जिससे गर्भ में बच्चे की हालत बिगड़ने लगी। इस स्थिति में मां को तेज़ खून बह सकता है और बच्चे तक ऑक्सीजन पहुंचना कम हो जाता है, जिससे दोनों की जान को खतरा होता है। हालात गंभीर होने पर महिला को तुरंत जयपुर के कोकून हॉस्पिटल लाया गया, जहां पहले से तैयार मेडिकल टीम ने बिना देर किए इलाज शुरू कर दिया। हॉस्पिटल पहुंचते ही मरीज को सीधे इमरजेंसी में एडमिट किया गया। उसी समय डॉक्टरों, नर्सों, एनआईसीयू और ब्लड बैंक की टीम तुरंत एक्टिव हो गई, जिससे इलाज में कोई देरी नहीं हुई।
कोकून हॉस्पिटल, जयपुर की क्लिनिकल हेड एंड सीनियर कंसल्टेंट, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी, डॉ. हिमानी शर्मा ने बताया कि,“फीटल डिस्ट्रेस के साथ होने वाला प्लेसेंटा एब्रप्शन गंभीर प्रेग्नेंसी से जुड़ी इमरजेंसी स्थितियों में से एक होता है, जहां हर सेकंड बेहद अहम होता है। इस केस में हमें अंदरूनी खून बहने के साथ गंभीर कंसील्ड एब्रप्शन (छिपा हुआ प्लेसेंटल एब्रप्शन) मिला, जिसके बाद तुरंत इमरजेंसी सर्जरी का फैसला लिया गया। तय समय के भीतर बच्चे की सुरक्षित डिलीवरी की गई। जन्म के समय बच्चे की हालत नाज़ुक थी, लेकिन समय पर एडवांस नियोनेटल रेससिटेशन और हमारी एनआईसीयू टीम के बेहतर सपोर्ट से बच्चे को स्थिर किया गया। यह केस दिखाता है कि तेज़ क्लिनिकल निर्णय, स्पष्ट इमरजेंसी प्रोटोकॉल और मजबूत टीमवर्क से हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में भी सकारात्मक नतीजे संभव हैं।”
कोकून हॉस्पिटल, जयपुर के यूनिट हेड डॉ. दिलशाद ने बताया कि, “यह मामला इस बात का उदाहरण है कि बेहद गंभीर प्रेग्नेंसी से जुड़ी इमरजेंसी स्थितियों में समय पर समस्या की पहचान कितनी अहम होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में एक पल की देरी भी मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा बढ़ा सकती है। सही समय पर लिया गया चिकित्सकीय फैसला, डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, एनआईसीयू और अन्य विभागों के बीच बेहतर तालमेल के साथ मिलकर ही जान बचाने में मदद करता है। खासकर तब, जब मां और बच्चे दोनों की हालत अचानक बिगड़ जाए, इस तरह की टीमवर्क ही सकारात्मक परिणाम देने में अहम भूमिका निभाती है।




