सकारात्मक सोच भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है
पत्रकार और साहित्यकार वस्तुतः जनता के प्रतिनिधि होते हैं। वे जनता के सुख-दुख के साथ जन संवेदनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त कर समाज को सही राह दिखाते हैं। ऐसे ही एक साहित्यकार, पत्रकार और जनसम्पर्क कर्मी गोपाल शर्मा है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के सेवानिवृत अतिरिक्त निदेशक गोपाल शर्मा को साहित्य और पत्रकारिता अपने पिता और मशहूर लेखक और कवि रामनाथ कमलाकर से विरासत में मिली है। उन्होंने पत्रकारिता से अपनी जीवन यात्रा शुरू कर जनसम्पर्क से होते हुए वर्तमान में गोपाल प्रभाकर के नाम से लेखन कार्य से सक्रीय रूप से जुड़े है। माह सितम्बर में मेरे लंदन प्रवास से लौटने पर उन्होंने अपनी पुस्तक ‘बून्द बूंद सागर है’ बड़े स्नेहपूर्वक भेंट की। सकारात्मक सोच भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है, इसे आगे बढ़ाते हुए लेखक ने अपने लगभग 105 प्रेरणास्पद आलेखों के माध्यम से जीवन में सकारात्मक सोच के महत्व को उजागर किया है। भगवान श्रीराम, श्री कृष्ण, सम्राट अशोक, स्वामी विवेकानंद, विनोबा भावे, मुंशी प्रेमचंद, जय शंकर प्रसाद, महात्मा गाँधी, चाणक्य, दार्शनिक अफलातून, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुकरात, डॉ राधाकृष्णन, संत कबीर, रहीम, महात्मा बुद्ध, लोकमान्य तिलक, तीर्थंकर महावीर, रामकृष्ण परमहंस, आदि महापुरुषों और विद्वानों के आदर्शों और विचारों को उद्धृत करते हुए यह याद दिलाया है कि सकारात्मक दृष्टिकोण से हर कठिनाई अवसर में बदल सकती है और जीवन अधिक खुशहाल और संतुलित बन सकता है। हमारी पहचान सिर्फ उसके कामों से नहीं, बल्कि अच्छी सोच से भी होती है। अच्छी सोच और विचार किसी भी व्यक्ति के जीवन को सफल, सुखद और शांतिपूर्ण बना सकते हैं। पुस्तक का मूल सन्देश है अगर हम अपनी जिंदगी में सकारात्मक बने रहना सीख लें, तो बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ भी हमें हरा नहीं सकतीं। जब हम कुछ अच्छा देखने की कोशिश करेंगे, तो हमारी सोच सकारात्मक बनेगी। यह पुस्तक कोई कहानी या उपन्यास नहीं बल्कि प्रेरणास्पद आलेखों का एक ऐसा संग्रह है जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में थके हारे मन को नई और सकारात्मक ऊर्जा देता है।
पुस्तक के आलेख काल्पनिक नहीं है वरन हमारे आसपास के जीवन पर आधारित है। लेखक ने अपने आलेखों में मन और भावनाओं को सुंदर शब्दों में आकार दिया है। रचनाओं में विविध विषयों को सरल शब्दों के माध्यम से संप्रेषित कर एक अनूठा प्रयोग किया है। जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपनी रचनाओं के माध्यम से सजीव रूप में परोसा गया है। प्रत्येक आलेख हमें एक सीख देता है। लेखक कहते है, बूंद छोटी है मगर लगातार गिरने से पत्थर में भी छेद कर देती है। यह केवल एक पुस्तक नहीं है अपितु जीवन जीने की एक कार्यशाला है। बालक से बुजुर्ग तक हर उम्र के वयक्ति के लिए यह उपयोगी और पठनीय है। गोपल प्रभाकर ने अपनी पुस्तक के माध्यम से यह सन्देश देने का सार्थक प्रयास किया है कि प्रेरणा कहीं बाहर से नहीं वरन हमारी छोटी छोटी अभिव्यक्ति और सोच रूपी बूंदों में छिपी है। बस उन्हें सागर बनना आना चाहिए।
समीक्षक कृति : बून्द बून्द सागर है ।
लेखक : गोपाल प्रभाकर* ।
*प्रकाशक : बोधि प्रकाशन ।
पृष्ठ : 188 , मूल्य 299 रूपये ।
समीक्षक – बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक और पत्रकार**