
गुरुओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का महत्वपूर्ण पर्व गुरू पूर्णिमा
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ.लोकेष कुमार चन्देल)
जयपुर। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। यह दोहा प्रसिद्ध निरंकार संत कबीर दासजी का है। यह हमें बताता है कि गुरु का महत्व भगवान के समकक्ष है। इस दोहे का अर्थ यह है कि यदि गुरु और ईश्वर (गोविंद) दोनों एक साथ खड़े हों, तो पहले गुरु के चरण छूने चाहिए क्योंकि गुरु ने ही हमें ईश्वर तक पहुंचने का सही मार्ग दिखाया है। इसलिए गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे महत्वपूर्ण दिन गुरू पूर्णिमा होती है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व ‘गुरु पूर्णिमा’ है। यह पर्व हमें आध्यात्मिक और व्यक्तिगत जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ उसे मिटाने वाला होता है, अर्थात् गुरु वह है जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का काम करता है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत ऊर्जावान माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति मन को शांत करने और ध्यान (मंत्र साधना) के माध्यम से आंतरिक बदलाव लाने में सहायक होती है। ऐतिहासिक रूप से सनातन धर्म में साधु और संन्यासी वर्षा ऋतु के चार महीनों (चातुर्मास) के दौरान एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान, साधना और ध्यान करते हैं, जिसकी शुरुआत गुरु पूर्णिमा से ही होती है। गुरु पूर्णिमा भारत में अपने आध्यात्मिक या फिर अकादमिक गुरुओं के सम्मान में, उनके वंदन और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाने वाला पर्व है। मनुष्यों के जीवन के चरित निर्माण में गुरुओं की अहम भूमिका होती है। ऐसे में माना जाता है कि जिन गुरुओं ने हमें गढ़ने में अपना योगदान दिया है, उनके प्रति हमें कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए और उसे जाहिर करने के दिन के तौर पर ही गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। भारत में प्राचीन काल से ही गुरुओं की भूमिका काफी अहम रही है। चाहे प्राचीन कालीन सभ्यता हो या आधुनिक दौर ही क्यों नहीं हो, समाज के निर्माण में गुरुओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती भी होती है इसलिए इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है क्योंकि इसी दिन चारों वेदों और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उनको सनातन धर्म का आदि गुरु भी माना जाता है। योग परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने आदिगुरु (प्रथम योगी) के रूप में सप्तऋषियों को योग का ज्ञान प्रदान किया था। ऐसा माना जाता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की कृपा और आध्यात्मिक ऊर्जा अन्य दिनों की तुलना में हजारों गुना अधिक सक्रिय होती है। इसलिए साधक इस दिन ध्यान, साधना और अपने गुरु की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन शिष्य अपने आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुओं को उपहार, फूल और दक्षिणा अर्पित कर उनको सम्मान प्रदान करते हैं।
बौद्ध धर्म में भी इसका महत्व:-बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा को ‘आषाढ़ी पूर्णिमा’ के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इसका बहुत बड़ा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व यह है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद उत्तर प्रदेश के सारनाथ में अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश (धम्मचक्र प्रवर्तन सुत्त) इसी दिन दिया था। इसमें उन्होंने ‘चार आर्य सत्य’ और ‘अष्टांगिक मार्ग’ का दर्षन प्रदान किया था। बौद्ध संघ का प्रारंभ इसी ऐतिहासिक उपदेश के साथ बौद्ध धर्म के पहले संघ (भिक्षुओं का समुदाय) की स्थापना हुई थी। गुरु पूर्णिमा से ही बौद्ध भिक्षु तीन महीने के ‘वर्षावास’ की शुरुआत करते हैं। इस दौरान भिक्षु एक ही स्थान पर रहकर गहन साधना, ध्यान और अध्ययन करते हैं।
जैन धर्म में भी गुरु-शिष्य परंपराः- जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा को ‘ज्ञान पंचमी’ अर्थात गुरु-शिष्य परंपरा के प्रतीक के रूप में बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन उस ऐतिहासिक घटना का स्मरण किया जाता है, जब 24 वें तीर्थंकर, भगवान महावीर ने अपने प्रमुख शिष्य गौतम गणधर (गौतम स्वामी) को दीक्षा दी थी। भगवान महावीर ने गौतम स्वामी को अपना पहला शिष्य बनाने के बाद जैन संघ की स्थापना की थी । इस घटना ने जैन धर्म के आध्यात्मिक ज्ञान और शिक्षाओं के औपचारिक प्रसारण की शुरुआत की थी। गुरु को जैन धर्म में अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर मोक्ष का मार्ग दिखाने वाला सर्वोच्च पथप्रदर्शक माना जाता है। इसी दिन जैन अनुयायी अपने आचार्यों, उपाध्याय और साधुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते है। मंदिरों में विशेष धार्मिक प्रवचन, शास्त्र पठन और ध्यान के कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। गुरूपूर्णिमा के दिन आत्म-अनुशासन, अहिंसा और स्वाध्याय का विशेष संकल्प भी लिया जाता है। बहरहाल यही कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में भगवान के समकक्ष ही गुरूओं को सम्मान दिया गया है। क्योंकि गुरू ही अंधकार दूर कर प्रकाश फैलाने का काम करता है। गुरु पूर्णिमा इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिक जागृति की ओर ले जाने वाले गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देती है। यह पर्व गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखता है और हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करता है। यह दिन हमें अपने जीवन को आकार देने वाले शिक्षकों, आचार्यों और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने की प्रेरणा प्रदान करता है।





