
(स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में)
दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. मंजुलता गुप्ता
तुम्हारे लिए संसार को त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आंतरिक स्तर पर तुमने पहले ही इसके प्रत्येक कर्म-बंधन को तोड़ दिया है। इस संसार के न होते हुए भी तुम्हें उसी में रहना है… मुक्ति बाह्य त्याग पर नहीं बल्कि आंतरिक वैराग्य पर निर्भर करती है।”
महान् मृत्युंजय गुरु महावतार बाबाजी अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को रानीखेत के निकट द्रोणागिरि पर्वत के शिखर पर यह अमूल्य उपदेश देते हैं। यह शिक्षा केवल लाहिड़ी महाशय के लिए ही नहीं, बल्कि हम सभी के आध्यात्मिक जीवन के लिए भी एक स्थायी आधार प्रस्तुत करती है। बाबाजी सृष्टा के समान विनम्र गुमनामी में अपना कार्य करते हैं। वे जनसाधारण के सामने प्रकट नहीं होते, किंतु अपनी कृपा की दिव्य तरंगें निरंतर इस जगत् में प्रवाहित करते रहते हैं।
विशेष दिव्य कार्यों के लिए इस जगत् में आने वाले महापुरुषों का मार्गदर्शन करना और उनके कार्य में सहायता देना भी बाबाजी के कार्यों में सम्मिलित है। उनके ये शब्द इसका प्रमाण हैं—“कुछ वर्षों बाद मैं आपके पास एक शिष्य भेजूँगा, जिसे आप पश्चिम में योग का ज्ञान प्रसारित करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं। मैं अमेरिका और यूरोप में संत बनने योग्य अनेक लोगों को देख रहा हूँ, जिन्हें जगाए जाने भर की देर है।” इसी दिव्य योजना के अंतर्गत वे ईश्वर-प्राप्त गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी को मुकुन्द नामक एक बालक को प्रशिक्षित करने का निर्देश देते हैं। वही मुकुन्द आगे चलकर परमहंस योगानन्द बनते हैं।
महावतार बाबाजी के अस्तित्व की जानकारी 1946 में पहली बार ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ के माध्यम से जनसाधारण को मिली। परमहंस योगानंदजी द्वारा लिखी यह विश्वविख्यात पुस्तक यह आठ दशकों से भी अधिक समय से असंख्य साधकों को ईश्वर की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती आ रही है। अनेक समर्पित अध्यायों में उन्होंने महावतार बाबाजी के जीवन और कार्य का सजीव वर्णन किया है, जिसके लिए हम उनके अत्यंत आभारी हैं।
सन् 1920 में परमहंस योगानन्दजी को अमेरिका में आयोजित धार्मिक उदारतावादियों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में बोलने का निमंत्रण मिला। पश्चिम के भौतिकतावाद के बीच अपने आध्यात्मिक आदर्शों की रक्षा को लेकर वे ईश्वर से मार्गदर्शन पाने के लिए गहन प्रार्थना में लीन हो गए। उसी समय महावतार बाबाजी उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा—“…डरो मत; तुम्हारा संरक्षण किया जाएगा।” यह पावन दिवस 25 जुलाई था, जिसे आज स्मृति दिवस के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने के इच्छुक पाठकगण www.yssi.org पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
इसी दिव्य भेंट के दौरान बाबाजी ने योगानन्दजी से कहा—“तुम ही वह हो जिसे मैंने पाश्चात्य जगत् में क्रियायोग का प्रसार करने के लिए चुना है।” उन्होंने आगे कहा—“ईश्वर-साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रणाली, क्रियायोग का अंततः सभी देशों में प्रसार हो जाएगा…” बाबाजी की इसी दिव्य आज्ञा का पालन करते हुए परमहंस योगानन्दजी ने पूर्व में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया तथा पश्चिम में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की। यहाँ ईश्वर-प्रेमी साधक पाठमाला के माध्यम से ध्यान की उत्कृष्ट प्रविधि क्रियायोग सीखते हैं और अपने जीवन को ईश्वर-साक्षात्कार की दिशा में आगे बढ़ाते हैं।
महावतार बाबाजी की अनेकों अमूल्य शिक्षाओं में से एक है—“अनेकों के दोषों के कारण सभी को दोषी मत मानो। इस जगत् में हर चीज़ मिश्रित रूप में है, शक्कर और रेत के मिश्रण की तरह। चींटी की भाँति बुद्धिमान बनो, जो केवल शक्कर के कणों को चुन लेती है और रेत-कणों को स्पर्श किए बिना छोड़ देती है।”
स्मृति दिवस के इस पावन अवसर पर आइए, हम इस दिव्य शिक्षा को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। यदि हम प्रत्येक परिस्थिति में शुभ, सत्य और ईश्वर की ओर ले जाने वाले तत्त्वों को ग्रहण करना सीख लें, तो हमारा जीवन परमात्मा के दिव्य आनंद और शांति से भर सकता है। यही महावतार बाबाजी की शिक्षाओं के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.


