(दिव्यराष्ट्र के लिए वरिष्ठ पत्रकार सुरेश पारीक)
पत्रकार को लिखे हुए को बेचना भी आना चाहिए-सुरेश पारीक
मैं अपनी बात राजस्थान के उपमुख्यमंत्री रहे हरिशंकर भाभडा से शुरू कर रहा हूँ ।एक दिन मैं भाजपा कार्यालय में था तब भाभडा जी एक कार्यकर्ता को डाँट रहे थे कि तुम्हारे पास मंहगी गाड़ी कहाँ से आ गई ।
उन्होंने मुझे बताया कि मैं जानता हूँ इसके पास कमाई का कोई ज़रिया नही है फिर भी मंहगी गाड़ी में घूम रहा है ।भाभडा जी को लगा कि उनकी पार्टी का कार्यकर्ता किस अनैतिक कमाई में लग गया ।
भाभडा जी के निधन के बाद मैंने लिखा था कि कार्यकर्ताओं पर नज़र रखने वाले अब ऐसे नेता कहाँ ?
भाइयों प्रभाष जी भी ऐसे पत्रकार थे जो पत्रकारों पर नज़र रखते थे कि कहीं अनैतिक कार्यों से वह पैसे तो नही कमा रहा है ।
जनसत्ता के अलावा भी अन्य पत्रकारों पर उनका नैतिक प्रभाव था कि कहीं जोशी जी की नज़र में गिर नहीं जाये ।एक बार तब के गोदी मिडिया ने मेरे बारे में उन्हें ग़लत जानकारी दे दी ।जब वह जयपुर आए तो मुझे कहा कि तुम भी मकान वकान के चक्कर में पड़ गए मैंने मना किया और किसी बहाने उन्हें अपने घर ले गया और तब मेरा किराए का मकान देखकर संतोष हुआ ।
उनके मन में यही था कि पत्रकारिता में आये हैं तो उसके काम में इतना लग जाओ कि मेहनत और प्रतिभा का ज़्
यादा से ज़्यादा प्रभाव नज़र आए ।
मैंने सिददराज ढडढा जी से भी सुना था कि पत्रकारिता एक साधना हैं जिसके तप में निखरने पर ही कोई अपना महत्वपूर्ण सर्वस्व समाज को दे सकता है ।
आपने एक मौलवी का क़िस्सा सुना होगा जिसमें उनके घरवालों ने पड़ौसी की मुर्गी को हलाल कर लिया था ।मौलाना के मना करने पर उनकी पत्नी ने कहा कि चलो शोरबा तो ले लो और जब वह थाली में डालने लगीं तो एक बोटी उसमें गिर गई ।जब पत्नी बेटी को उठाने लगी तो मौलाना ने कहा कि जो अपने आप आती है तो उसे आने दो ।जो आपकी ईमानदारी और परिश्रम से आता है तो उसका कोई दोष नही है लेकिन आज आपाधापी में आप जो कर रहे है उससे स्वार्थ सिद्धी तो हो रही हैं लेकिन वह सम्मान नहीं मिलता जिसके लिए आप लालायित रहते हैं ।बहुत से लोगों को सम्मान चाहिए भी नहीं इसलिए सब तरफ़ गिरावट नज़र आ रही हैं ।पत्रकारिता ही नहीं किसी भी पेशे का सम्मान तभी होगा जिसमें तपस्वी ईमानदार लोगों काँ वर्चस्व बढ़ेगा ।जोशी जी को भी हम आज इसलिए याद कर रहें है क्योंकि उन्होंने अपनी ईमानदारी त्याग तपस्या से पत्रकारिता को ऊंचाइयों पर लाने में सफल रहे ।मैं इतने उच्च आदर्श की बात नहीं करूँ तो अपनी गिरेबान में झाँकने की बात तो कर ही सकता हूँ ।सरकार राजनीतिक दल न्याय व्यवस्था चिकित्सा ,पत्रकारिता या नौकरशाही सब छेत्र में ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो अपनी कमियाँ बता सके और उसे ठीक करने का प्रयास करें ।गलती होने पर अपनी पीठ पर कोड़े मार करउसका पश्चाताप कर सके ।लेकिन यह साहस कोई करता है तो उसकी बिरादरी में ही सबसे पहले खिलाफत शुरू होती है ।यह भी समाज में गिरावट का प्रतीक है ।
आज बहुत से लोग गोदी मीडिया की बात करते है मैं इससे इंकार नहीं कर रहा लेकिन सरकार की आलोचना के अलावा भी बहुत से काम हैं जिनसे मीडिया अपनी ताक़त बढ़ा सकता हैं ।हम सोचते है कि सरकार की वजह से मीडिया में गड़बड़ है लेकिन मेरा मानना है कि सत्ता किसी भी दल की हो वह अपने सामने कोई भी ताक़त खड़ी होते नहीं देखना चाहती ।
पहले यह कहा जाता था कि मीडिया पूँजीपतियों के हाथ में है और काग़ज़ स्याही मशीन पर लगने वाली पूंजी अधिक होने के कारण बहुत कम पत्रकार ही अख़बार निकालने का साहस दिखाते थे लेकिन आज स्याही काग़ज़ मशीन के बिना भी डिजिटल मीडिया खड़ा हो सकता हैं । पहले की तरह दिमाग़ आपका ही इस्तेमाल हो रहा है लेकिन स्थिति में कोई बदलाव नही आया ।यदि अच्छे पत्रकारों के समूह खड़े हो जाए तो पत्रकारिता मज़बूत हो सकती हैं लेकिन कुछ पत्रकारों का मानना है कि वह लिख सकते है लेकिन बेचने का काम नहीं कर सकते लेकिन मेरा मानना है कि तस्वीर बदलनी है तो उसके लिए हर उपाय करने होंगे जो उसकी ज़रूरत है ।आज रोज़गार की पत्रिकारिता का बोलबाला है इसमें रोज़गार दिलाने वाले संस्थान खड़े हो रहे जो रोजमर्रा की पत्रकारिता सिखा रहे हैं लेकिन जो गहराई चाहिए उस तक पहुँच नहीं हैं ।यही कारण हैं कि आज प्रेस क्लब और संगठनों में ऊँची सोच के लोगों का अभाव है जो कुछ पाने के लिये गरिमा का भी त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं ।मैं मानता हूँ कि पत्रकार की भूमिका एक शिक्षक की होगी तब ही समाज को उसकी बुराइयों से दूर किया जा सकता है लेकिन सिखाने वाले की सोच और दृष्टि भी उसी तरह की हों तब ही समाज आपसे सीखने के लिये तैयार होगा अन्यथा आप पर हँसने वालों की कमी नही रहेगी ।




