
मेजर जनरल डॉ राजेश चोपड़ा, एवीएसएम (सेवानिवृत्त) महानिदेशक, इंडियन माल्ट व्हिस्की एसोसिएशन
नई दिल्ली, दिव्यराष्ट्र:/ भारत में सिंगल माल्ट व्हिस्की की बढ़ती लोकप्रियता को अक्सर विश्वस्तरीय पुरस्कारों, प्रीमियमीकरण एवं निर्यात की महत्वाकांक्षाओं के नज़रिए से देखा जाता है। लेकिन इसकी असली कहानी टेस्टिंग रूम और डिस्टलरी टूर से कहीं दूर खेतों से शुरू होती है, जहां उगने वाला जौ (जिसे आमतौर पर सर्दियों की फसल माना जाता है) उच्च मूल्य के विश्वस्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योग की नींव रख रहा है।
इस बदलाव का केन्द्र है इंडियन माल्ट व्हिस्की एसोसिएशन-उद्योग जगत का एक संगठन जो भारतीय सिंगल माल्ट को प्रमोट करने से कहीं ज़्यादा काम कर रहा है। यह उन्हें परिभाषित करता है। मानकों के निर्धारण, 100 फीसदी माल्टेड जौ के इस्तेमाल, एक ही डिस्टीलरी में उत्पादन और डिस्टीलेशन के पारम्परिक तरीकों के साथ- एसोसिएशन ने प्रमाणिकता का ऐसा ढांचा तैयार किया है जो भारत की विशेष पहचान बनाए रखते हुए इसे विश्वस्तरीय मानकों के साथ जोड़ता है। यह कदम, जो देखने में तकनीकी लग सकता है, कृषि, आपूर्ति श्रृंखलाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल रहा है।
कोमोडिटी फसल से लेकर प्रीमियम इनपुट तक*
दशकों से, भारत में जौ एक कम मुनाफे वाली, बड़े पैमाने पर बेची जाने वाली फसल रही है, जिसकी खेती राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में की जाती है। इसकी कीमत इसकी मात्रा के आधार पर तय होती थी, न कि इसकी गुणवत्ता के आधार पर। सिंगल माल्ट व्हिस्की इस समीकरण को बदल रही है। पशुओं के चारे या बड़े पैमाने पर बनने वाली शराब के लिए इस्तेमाल होने वाले अनाज के विपरीत, व्हिस्की-ग्रेड जौ के लिए सख्त जैव-रासायनिक एकरूपता, प्रोटीन के नियंत्रित स्तर, स्टार्च की उच्च मात्रा और अनाज के एक समान आकार की जरूरत होती है। इन मानकों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये सीधे तौर पर माल्ट बनाने की दक्षता, चीनी के निष्कर्षण और अंततः, व्हिस्की के फ्लेवर को प्रभावित करते हैं।
इससे जौ की खेती और उसके व्यापार के तरीके में बदलाव आया है। डिस्टिलरी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और डायरेक्ट प्रोक्योरमेन्ट मॉडल की ओर बढ़ रही हैं, तथा गुणवत्ता एवं ट्रेसिबिलिटी को सुनिश्चित करने के लिए किसानों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। तो आज इस कमोडिटी को विशेष पहचान मिल गई है। किसानों के लिए भी यह फायदेमंद है, जिन्हें उच्च गुणवत्ता के प्रोडक्ट के लिए बेहतर कीमतें मिलती हैं, मांग बढ़ जाती है और वे अस्थिर खुले बाजारों के जोखिम से अधिक सुरक्षित हो जाते हैं।



