
बाल विवाह के खिलाफ राजस्थान का शांत लेकिन असरदार बदलाव
(दिव्य राष्ट्र के लिए नानूलाल प्रजापति, उपनिदेशक, राजस्थान महिला कल्याण मंडल, अजमेर)
अक्षय तृतीया पर देश के कई हिस्सों में एक जाना-पहचाना सा उत्साह फिर से दस्तक देने लगता है। शादी के लिए शुभ दिन के रूप में मशहूर यह त्योहार, सालों से राजस्थान जैसे राज्यों में एक अलग ही अंधेरे पहलू को भी अपने साथ लेकर आता है जहां अक्सर इस दौरान बाल विवाह की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है। लेकिन पिछले कुछ सालों में कई बदलाव भी हुए हैं। इसी क्रम में अक्षय तृतीया 2024 से ठीक पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया जिसने राज्य में बाल विवाह से निपटने का तरीका ही बदल दिया। बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए काम कर रहे नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने गांव के मुखियाओं, सरपंचों और पंचायत सदस्यों की जवाबदेही तय की और कहा कि अगर उनके इलाके में कोई बाल विवाह होता है तो उसके लिए वे जिम्मेदार माने जाएंगे। यह एक छोटा सा लेकिन असरदार बदलाव था। क्योंकि जिम्मेदारी अब कोई दूर की या किताबों वाली बात नहीं रही, बल्कि अब प्रभावकारी रूप में थी।
इसका असर तुरंत और साफ दिखा। पिछले सालों के उलट, 2024 में अक्षय तृतीया के दौरान बाल विवाह के एक भी मामले की शिकायत प्रशासन के पास नहीं आई और अगले साल भी यही हुआ। जिस राज्य में लंबे समय से बाल विवाह की दर 25 फीसदी से ऊपर बनी हुई थी, उसके लिए यह सामान्य बात नहीं थी। यह एक संकेत था कि बदलाव मुमकिन है, बशर्ते उसके पीछे इरादा हो और जवाबदेही का संबल हो। ऐसे में इस साल एक बार फिर अक्षय तृतीया पर परीक्षा की घड़ी है। कोई यह नहीं मानता कि खतरा टल गया है। बल्कि अंदेशा यह है कि यह सब अब और छुपकर हो रहा है नजरों से बचाकर, चुपचाप। लेकिन इस बार जवाब भी अलग है। प्रशासन सतर्क है, पुलिस तैयार है। और शायद सबसे अहम बात समाज अब खामोश नहीं है।
पिछले एक साल में राजस्थान ने सिर्फ एक बड़े अदालत के फैसले तक सीमित न रहकर, इस समस्या से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम शुरू किया है। तब से काफी कुछ बदल चुका है। अब पहले से कहीं ज्यादा बच्चों को बाल विवाह के खतरे से बचाया गया है। समाज को जागरूक करने के लिए बाल विवाह मुक्ति रथ अभियान में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जहां यह संदेश लेकर चलने वाला रथ दूर-दराज के जिलों और गांवों तक पहुंचा और उन मुद्दों पर बातचीत शुरू हुई जिन पर पहले ध्यान नहीं दिया जाता था। राजस्थान में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन नेटवर्क के सहयोगियों ने स्थानीय प्रशासन और गांव के प्रमुखों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि यह रथ न सिर्फ आखिरी गांव तक पहुंचे, बल्कि राज्य के सबसे कमजोर समुदायों तक भी अपनी बात पहुंचाए।
फिर भी, बहुत कुछ अब भी पहले जैसा ही बना हुआ है। अब इसी पारंपरिक जड़ता को तोड़ने और नए सिरे से बनाने की जरूरत है क्योंकि आज राजस्थान में जो हो रहा है, वह सिर्फ थोड़ा-थोड़ा बदलाव नहीं, बल्कि इतिहास बन रहा है। हर साल राज्य बाल विवाह खत्म करने की दिशा में और मजबूत कदम उठा रहा है और धीरे-धीरे अक्षय तृतीया के असली मायने वापस ला रहा है। एक ऐसा दिन जो उम्मीद का हो, न कि चुपचाप होने वाले गलत कामों की छाया में बीते। राज्य स्तर पर भी पिछले साल एक खास कदम उठाया गया। प्रिंटिंग प्रेस को निर्देश दिया गया कि शादी के कार्ड छापने से पहले दूल्हा-दुल्हन की उम्र का प्रमाण लें और उनकी जन्म तिथि कार्ड पर ही छापें। कागज पर यह एक छोटा सा प्रशासनिक कदम लगता है, लेकिन यह बाल विवाह छिपाने की गुंजाइश को कम कर देता है। जो शादी का कार्ड पहले सिर्फ एक निजी सूचना भर होता था, अब वह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जिसे कोई भी देख और परख सकता है।
साथ ही, जमीन पर काम भी लगातार और मजबूत होता जा रहा है। सामाजिक संगठन लगातार गांवों और छोटे कस्बों में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। बाल विवाह के खिलाफ संदेश अब मंदिरों, मस्जिदों, स्कूलों और अलग-अलग सामुदायिक जगहों तक पहुंच रहे हैं। बच्चे खुद भी अब ज्यादा समझदार हो रहे हैं और कई बार इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए आगे आ रहे हैं। इस साल राज्य के शिक्षा विभाग ने भी मिलकर काम करने पर जोर दिया है। जिले और ब्लॉक स्तर पर ऐसे समूह बनाए गए हैं, जिनमें महिला समूह, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और स्थानीय स्वयंसेवक साथ आकर काम कर रहे हैं। यहां तक कि जो लोग शादी से सीधे जुड़े नहीं होते जैसे पुजारी, बैंड वाले, टेंट हाउस के मालिक और गाड़ी चलाने वाले उन्हें भी साफ तौर पर अपनी जिम्मेदारी समझने और बाल विवाह के खिलाफ खड़े होने के लिए कहा जा रहा है। क्योंकि सच्चाई यह है कि बाल विवाह अकेले संपन्न नहीं होता। यह लोगों की चुप्पी, साथ देने और उस गलत चीज को धीरे-धीरे सामान्य मान लेने से बढ़ता है, जिसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
पिछले एक साल में राजस्थान ने दिखाया है कि बदलाव किसी एक कदम से नहीं आता। इसके लिए कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक यानी हर स्तर पर दबाव बनाना पड़ता है। जब जिम्मेदारी से बचना मुश्किल हो जाए और गलत में साथ देना असहज लगने लगे, तभी असली बदलाव आता है। फिर भी, यह ढिलाई बरतने का समय नहीं है क्योंकि अक्षय तृतीया पर अभी भी बाल विवाह की संभावना है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि पिछले साल जो बदलाव दिखा, वह बस एक बार की बात थी या सच में लंबे समय तक चलने वाली शुरुआत। असली सफलता सिर्फ सामने होने वाले बाल विवाह को रोकने में नहीं है, बल्कि इस सोच को खत्म करने में है, ताकि समाज इसे गलत मानने लगे। फिलहाल, राजस्थान एक ऐसी मिसाल दे रहा है जो लंबे समय से नजर नहीं आ रहा था। अब इरादा भी है और उस पर काम भी हो रहा है। जैसे-जैसे देश बाल विवाह खत्म करने के अपने बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, यह समय बहुत मायने रखता है। इसलिए नहीं कि लड़ाई खत्म हो गई है, बल्कि इसलिए कि अब इसे एक नए तरीके से लड़ा जा रहा है।



