
पांच साल की उम्र से टाइप-1 डायबिटीज़ के साथ जी रहीं पद्मजा ने अपने 40 साल के अनुभव के आधार पर कहा कि अब समय आ गया है कि डायबिटीज़ को देखने का नजरिया बदला जाए। उन्होंने कहा, “40 साल बाद अब हमें इस भेदभाव से आज़ादी मिलनी ही चाहिए, इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं।”
‘खम्मा घणी’ के साथ अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि सम्मान वह ताकत है जो संघर्ष को उद्देश्य में बदल देती है। उन्होंने साफ कहा कि डायबिटीज़ सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई है, जो लोगों की सोच, चुप्पी और गलतफहमियों से प्रभावित होती है। उन्होंने लोगों और संस्थाओं से अपील की कि सिर्फ जागरूकता नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाए जाएं।
हाल ही में ‘ब्रेकथ्रू T1D’ से मैरी टायलर मूर अवॉर्ड मिलने के बाद उनका संबोधन और भी भावुक हो गया। उन्होंने अपने पिता के निधन को याद करते हुए कहा कि यह सम्मान उनके जीवन का एक भावनात्मक पड़ाव है। “सम्मान कोई हमें देता नहीं, यह हम खुद अपने भीतर रखते हैं,” कहते हुए उन्होंने अपनी इस मुहिम को अपने पिता और हर डायबिटीज़ से जूझ रहे व्यक्ति को समर्पित किया।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। “भेदभाव सिर्फ नीतियों से खत्म नहीं होता, यह तब खत्म होता है जब लोग अपनी सोच बदलते हैं—जब संवेदनशीलता, निर्णय की जगह लेती है और जानकारी, डर को खत्म करती है।” उन्होंने खुले संवाद, गलत धारणाओं को चुनौती देने और अनसुनी आवाज़ों को सामने लाने पर जोर दिया।
पद्मजा ने अपनी संस्था ‘द फ्रेंड्स ऑफ मेवाड़ के काम का भी जिक्र किया, जो राजस्थान सहित अन्य क्षेत्रों में डायबिटीज़, टीबी और अन्य स्वास्थ्य मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। इस वैश्विक समिट के सह-आयोजक के रूप में संस्था ने दुनिया भर के विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई है।
इस अवसर पर मौजूद राजस्थान सरकार के स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी सुनील कुमार ने कहा, “पद्मजा जी लगातार राजस्थान में डायबिटीज़ को लेकर जागरूकता बढ़ाने में योगदान दे रही हैं। उनके प्रयास सराहनीय और प्रभावी हैं।”
जयपुर मैरियट होटल में आयोजित इस दो दिवसीय समिट में 30 से अधिक देशों के 300 से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए हैं, जिनमें डॉक्टर, शोधकर्ता, नीति निर्माता और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल हैं। सभी का उद्देश्य डायबिटीज़ से जुड़े भेदभाव को खत्म करने के लिए एक वैश्विक रणनीति तैयार करना है।
समिट में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, डायबिटीज़ से पीड़ित हर 5 में से 4 लोग किसी न किसी रूप में भेदभाव का सामना करते हैं, जबकि हर 3 में से 1 व्यक्ति के साथ खुला भेदभाव होता है। यह स्थिति इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाती है।
ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर बिहेवियरल रिसर्च इन डायबिटीज़ के नेतृत्व में आयोजित इस समिट को ‘ब्रेकथ्रू T1D’ और इंटरनेशनल डायबिटीज़ फेडरेशन जैसे वैश्विक संगठनों का समर्थन प्राप्त है। यह दुनिया का पहला ऐसा प्रयास है जो केवल डायबिटीज़ से जुड़े स्टिग्मा को खत्म करने पर केंद्रित है।
अपने संबोधन के अंत में पद्मजा ने कहा, “हम यह संकल्प लें कि अब कोई भी व्यक्ति डायबिटीज़ के कारण खुद को कमतर महसूस न करे।”
जयपुर में आयोजित यह अनूठा वैश्विक आयोजन एक ऐसा मंच बनकर उभरा है, जहां विज्ञान, सामाजिक जागरूकता और मानवीय अनुभव एक साथ आए हैं—और यह शहर अब वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है।




