
सुनील चाष्टा सुरुप अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला सलूम्बर
(दिव्यराष्ट्र)
राजनीति खेल प्रशासन विज्ञान प्रौद्योगिकी व व्यावसायिक जगत में कुछेक महिलाओं की कामयाबी पर बजने वाली तालियों की गूंज पर अपनी पीठ थपथपाने वाला यह देश उन कराहों एवं सिसकियों को नहीं सुन पा रहा है जो देश के भीतरी अंचलो से आ रही हैं अखबारों की सुर्खियों में अत्याचारों के नित नए दंश झेलती यह आधी आबादी आजादी के इतने वर्षों बाद भी लैंगिक न्याय से महरूम है। अपने हितों के अनुरूप पुरुषवादी समाज ने महिला को कभी देवी तो कभी दासी का दर्जा दिया हैं परन्तु बराबरी का दर्जा नहीं नहीं दिया हैं। दुर्भाग्य की बात्त तो यह है कि सभ्यता के विकास की कहानी आज अपने पन्ने पलट कर वहीं खड़ी दिखाई दे रही है जहाँ से इसकी उड़ान हुई थी। प्रगति की ऊंचाइयों को एक पख द्वारा उड़कर छूने की पुरुषवादी मानसिकता से न केवल महिला अपितु सम्पूर्ण मानवीय समाज जीवन व राष्ट्र की प्रगति को प्रतिगामी पटरी पर ला खड़ा कर दिया हैं।सशक्तीकरण की योजनाएँ परम्परागत पुरुष प्रधान सामाजिक दाँचे के चलते सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गई। आखिर क्यों है महिलाएँ अशक्त ?कौन हैं इस स्थिति के लिए जिम्मेदार समाज धर्म या महिलाएँ स्वयं ? क्या हों महिला सशक्तिकरण के प्रयास? आखिर क्यों हो रहें हैं ये प्रयास नाकाम ?आदि अनेक प्रश्न हमारे मन मस्तिष्क में निरंतर प्रकाशमान हो रहें हैं जिनमें जवाब अपेक्षित हैं?
भारतीय नारी न्याय बलिदान साहस शांति सेवा की सजीवन मूर्ति हैं। जीवन के सुख दुख में छाया की भांति पुरुष को साथ देने के कारण वह अर्द्धांगिनी घर की व्यवस्थापिका होने के कारण वह लक्ष्मी श्लाघनीय गुणों में कारण वह देवी कही जाती हैं।
स्वार्थ और भोगलिप्सा को तिलांजली देकर भारतीय नारी नें आत्म बलिदान द्वारा समय समय पर ऐसी ज्योति प्रज्वलित की हैं कि उसके पुनीत प्रकाश से पुरुष ने अपना मार्ग दूढ़ा हैं। उसकी शक्ति के सामने यमराज को हारना पड़ा है। सती सावित्री वीरागंना लक्ष्मीबाई तपस्विनी उर्मिला की दिव्य झांकिंया प्रेरणा के स्त्रोत हैं और पुरुष को चेतना और जागरण का संदेश देती हैं।नारी का सम्मान करके ही पुरुष का जीवन कुसुम सुवसित होता हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार यत्र नार्यन्तु पूजन्ते रमन्ते तत्र देवता अर्थात् जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं परन्तु ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति सृष्टि का उद्गम स्त्रोत जीवन रुपी द्विपाद चक्र वाहिनी का एक मजबूत पहिया ममता एवं करुणा की प्रतिमूर्ति त्याग व वलिदान की अधिष्ठात्री प्रेम एवं समर्पण का पर्याय ये महिला सदियों से वर्तमान तकनीकी युग तक हमारे उपेक्षापूर्ण व भेदभाव मूलक दृष्टिकोण के कारण परिवार,समाज एवं देश प्रत्येक स्तर पर अन्याय पीड़ा और शोषण के दंश भुगत रही है।
किसी भी कानून का असर उसको व्यापकता व सामाजिक सरोकार पर निर्भर करता है। महिला सशक्तीकरण के लिए बने अनेक कानूनों का असर कम होंने के कारण उन्हें सामाजिक मान्यता नहीं मिल पाना ही हैं। सामाजिक ढांचे में परिवर्तन के बिना मौजूदा कानून के सहारे उनकी सामाजिक हैसियन में परिवर्तन की उम्मीद करना पत्थरों पर दूब उगानें में समान हैं। विडम्बना यह है कि सरकारी संस्थागत व नीतिगत प्रयासों के बावजूद स्वयं महिलाएं अपने हितों के प्रति जागरूक नहीं है’ तथा न ही इस हेतु कोई सकारात्मक पहल की हैं। उनको यह खामोशी आने वाली पीढ़ीयों के लिए. अभिशाप नहीं बन जायें इसलिए जरूरत इस बात की है कि जब तक महिलाएं स्वयं इस वैसाखियों को त्यागकर स्वयं चुनौती को स्वीकार करके महिला सशक्तीकरण को आगे नहीं आयेगी तब तक कानून अधिक कारगर साबित नहीं होंगें। यह शाश्वन सत्य हैं कि जिस तरह मानव में आदिम सभ्यता से वर्तमान तकनीकी युग तक का सफर अपनी जिजीविषा से तय किया हैं उसी तरह यह बात अंगद के पांव की नह अटल है कि इस समस्या का समाधान भी कर लिया जायेगा परन्तु हमें अपने अतिरिक्त प्रयासों के द्वारा उस समय सीमा को कम करना होगा और यह सत्य होगा कि लोहे के पेड़ हरें होंगें।कवि जयशंकर प्रसाद ने भी कहा हैं नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में यूं पीयूष स्त्रोत सी बहा करों जीवन के इस सुन्दर समतल में। विभिन्न बाधाओं के बावजूद भी उसे अभी मीलों लंबा सफर तय करना हैं जो कंटकेनपूर्ण एवं दुर्गम हैं लेकिन वह मानती हैं कि वह पथ क्या कुशलता क्या ? जिसमें बिखरे शूल ना हों नाविक की धैर्य परीक्षा क्या?यदि धाराएं प्रतिकूल ना हो।






